ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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(परमात्माने ही) तत्=उस (जडतत्त्वोंकी रचनारूप); कर्म=कर्मको; कृत्वा=करके; विनिवर्त्य=उसका निरीक्षण कर; भूयः=फिर; तत्त्वस्य=चेतनतत्त्वका; तत्त्वेन=जड-तत्त्वसे; योगम्=संयोग; समेत्य=कराके; वा=अथवा यों समझिये कि; एकेन=एक (अविद्या) से; द्वाभ्याम्=दो (पुण्य और पापरूप कर्मों) से; त्रिभिः=तीन गुणोंसे; च=और; अष्टभिः=आठ प्रकृतियोंके साथ; कालेन=कालके साथ; च=तथा; सूक्ष्मैः आत्मगुणैः=आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंके साथ; एव=भी; [ योगम् समेत्य ]=इस जीवका सम्बन्ध कराके (इस जगत्की रचना की है) ॥ ३ ॥
व्याख्या —परमेश्वरने ही अपनी शक्तिभूता मूलप्रकृतिसे पाँचों स्थूल महाभूत आदिकी रचनारूप कर्म करके उसका निरीक्षण किया, फिर जडतत्त्वके साथ चेतन तत्त्वका संयोग कराके नाना रूपोंमें अनुभव होनेवाले विचित्र जगत्की रचना की।* अथवा इस प्रकार समझना चाहिये कि एक अविद्या, दो पुण्य और पापरूप संचित कर्म-संस्कार, सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण और एक काल तथा मन, बुद्धि, अहंकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृतिभेद, इन सबसे तथा अहंता, ममता, आसक्ति आदि आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंसे जीवात्माका सम्बन्ध कराके इस जगत्की रचना की। इन दोनों प्रकारके वर्णनोंका तात्पर्य एक ही है ॥ ३ ॥
सम्बन्ध —इस रहस्यको समझकर साधकको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान् विनियोजयेद् यः। तेषामभावे कृतकर्मान्नाशः कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥ ४ ॥
- इसका वर्णन तैत्तिरीय-उपनिषद् (ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक १ और ६) में, ऐतरेयोपनिषद् (अध्याय १ के तीनों खण्डों)में, छान्दोग्योपनिषद् (अध्याय ६, खण्ड २-३)में और बृहदारण्यकोपनिषद् (अध्याय १, ब्राह्मण २) में विस्तारपूर्वक आया है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
यः=जो साधक; गुणान्वितानि=सत्त्वादि गुणोंसे व्यास; कर्माणि=कर्मोंको; आरभ्य=आरम्भ करके; (उनको) च=तथा; सर्वात्=समस्त; भावान्=भावोंको; विनियोजयेत्=परमात्मामें लगा देता है—उसके समर्पण कर देता है; (उसके इस समर्पणसे) तेषाम्=उन कर्मोंका; अभावे=अभाव हो जानेपर; (उस साधकके) कृतकर्मानाशः=पूर्वसंचित कर्म-समुदायका भी सर्वथा नाश हो जाता है; कर्मक्षये=(इस प्रकार) कर्मोंका नाश हो जानेपर; सः=वह साधक; याति=परमात्माको प्राप्त हो जाता है; (क्योंकि वह जीवात्मा) तत्त्वतः=वास्तवमें; अन्यः=समस्त जड़-समुदायसे भिन्न (चेतन) है ॥ ४ ॥
व्याख्या—जो कर्मयोगी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे व्यास अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुकूल कर्तव्यकर्मोंका आरम्भ करके उनको और अपने सब प्रकारके अहंता, ममता, आसक्ति आदि भावोंको उन परब्रह्म परमेश्वरमें लगा देता है, उनके समर्पण कर देता है, उस समर्पणसे उन कर्मोंके साथ साधकका सम्बन्ध न रहनेके कारण वे उसे फल नहीं देते। इस प्रकार उनका अभाव हो जानेसे पहले किये हुए संचित कर्म-संस्कारोंका भी सर्वथा नाश हो जाता है। इस प्रकार कर्मोंका नाश हो जानेसे वह तुरंत परमात्माको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि यह जीवात्मा वास्तवमें जड़ तत्त्वसमुदायसे सर्वथा भिन्न एवं अत्यन्त विलक्षण है। उनके साथ इसका सम्बन्ध अहंता-ममता आदिके कारण ही है, स्वाभाविक नहीं है ॥ ४ ॥
सम्बन्ध—कर्मयोगका वर्णन करके अब उपासनारूप दूसरा साधन बताया जाता है—
आदिः | स | संयोगनिमित्तहेतुः | ---|---|---|--- | परस्त्रिकालादकलौऽपि | | दृष्टः। तं | विश्वरूपं | भवभूतमीड्यं | | देवं | स्वचित्तस्थमुपास्य | पूर्वम् ॥ ५ ॥
सः=वह; आदिः=आदि कारण (परमात्मा); त्रिकालात् परः=तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत; (एवं) अकलः=कलारहित (होनेपर); अपि=भी; संयोगनिमित्त-
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श्वेताश्वतरोपनिषद्
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हेतुः=प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेमें कारणोंका भी कारण; दृष्टः=देखा गया है; स्वचित्तस्थम्=अपने अन्तःकरणमें स्थित; तम्=उस; विश्वरूपम्=सर्वरूप; (एवं) भवभूतम्=जगत्-रूपमें प्रकट; ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य; पूर्वम्=पुराणपुरुष; देवम् उपास्य=परम देव (परमेश्वर) की उपासना करके (उसे प्राप्त करना चाहिये) ॥५॥
व्याख्या —वे समस्त जगत्के आदि कारण सर्वशक्तिमान् परमेश्वर तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत हैं। उनमें कालका कोई भेद नहीं है, भूत और भविष्य भी उनकी दृष्टिमें वर्तमान ही हैं। वे (प्रश्नोपनिषद्में बतायी हुई) सोलह कलाओंसे रहित होनेपर भी अर्थात् संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित होते हुए भी प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेवाले कारणके भी कारण हैं। यह बात इस रहस्यको जाननेवाले ज्ञानी महापुरुषोंद्वारा देखी गयी है। वे परमेश्वर ही एकमात्र स्तुति करनेयोग्य हैं। उन्हें दृढ़नेके लिये कहीं दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है। वे हमारे हृदयमें ही स्थित हैं। इस बातपर दृढ़ विश्वास करके सब प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा जगत्-रूपमें प्रकट हुए, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्, परम देव पुराणपुरुष परमेश्वरकी उपासना करके उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥५॥
सम्बन्ध —अब ज्ञानयोगरूप तीसरा साधन बताया जाता है—
| स | वृक्षकालाकृतिभिः | परोऽन्यो |
|---|---|---|
| यस्मात् प्रपञ्चः | परिवर्ततेऽयम्। | |
| धर्मावहं | पापनुदं | भगेशं |
| ज्ञात्वात्मस्थममृतं | विश्वधाम ॥ ६ ॥ |
यस्मात्=जिससे; अयम्=यह; प्रपञ्चः=प्रपञ्च (संसार); परिवर्तते=निरन्तर चलता रहता है; सः=वह (परमात्मा); वृक्षकालाकृतिभिः=इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे; परः=सर्वथा अतीत; (एवं) अन्यः=भिन्न है; (उस) धर्मावहम्=धर्मकी वृद्धि करनेवाले; पापनुदम्=पापका नाश करनेवाले; भगेशम्=सम्पूर्ण ऐश्वर्यके अधिपति; (तथा) विश्वधाम=समस्त जगत्के आधारभूत परमात्माको;
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[ अध्याय ६ ]
आत्मस्थम्—अपने हृदयमें स्थित; ज्ञात्वा=जानकर; (साधक) अमृतम् [ एति ]=अमृतस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
व्याख्या —जिनकी अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे यह प्रपञ्चरूप संसार निरन्तर घूम रहा है—प्रवाहरूपसे सदा चलता रहता है, वे परमात्मा इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे सर्वथा अतीत और भिन्न हैं अर्थात् वे संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित, कालका भी ग्रास कर जानेवाले एवं आकाररहित हैं; तथापि वे धर्मकी वृद्धि एवं पापका नाश करनेवाले, समस्त ऐश्वर्यके अधिपति और समस्त जगत्के आधार हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींके आश्रित है, उन्हींकी सत्तासे टिका हुआ है। अन्तर्मीरूपसे वे हमारे हृदयमें भी हैं। इस प्रकार उन्हें जानकर ज्ञानयोगी उन अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
सम्बन्ध —पहले अध्यायमें जिनका वर्णन आया है, वे ध्यानके द्वारा परमात्माका प्रत्यक्ष करनेवाले महात्मा कहते हैं—
| तमीश्वराणां | परमं | महेश्वरं |
|---|---|---|
| तं | देवतानां | परमं च दैवतम्। |
| पतिं | पतीनां | परमं परस्ताद् |
| विदाम | देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥ |
तम्=उस; ईश्वराणाम्=ईश्वरोंके भी; परमम्=परम; महेश्वरम्=महेश्वर; देवतानाम्=सम्पूर्ण देवताओंके; च=भी; परमम्=परम; दैवतम्=देवता; पतीनाम्=पतियोंके भी; परमम्=परम; पतिम्=पति; (तथा) भुवनेशम्=समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी; (एवं) ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य; तम्=उस; देवम्=प्रकाशस्वरूप परमात्माको; (हमलोग) परस्तात्=सबसे परे; विदाम=जानते हैं ॥ ७ ॥
व्याख्या —वे परब्रह्म पुरुषोत्तम समस्त ईश्वरोंके—लोकपालोंके भी महान् शासक हैं, अर्थात् वे सब भी उन महेश्वरके अधीन रहकर जगत्का शासन करते हैं। समस्त देवताओंके भी वे परम आराध्य हैं, समस्त पतियों—रक्षकोंके भी परम पति हैं तथा समस्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी हैं। उन स्तुति करनेयोग्य
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प्रकाशस्वरूप परम देव परमात्माको हमलोग सबसे पर जानते हैं। उनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ और कोई नहीं है। वे ही इस जगत्के सर्वश्रेष्ठ कारण हैं और वे सर्वरूप होकर भी सबसे सर्वथा पृथक् हैं ॥७॥
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥८॥
तस्य=उसके; कार्यम्=(शरीररूप) कार्य; च=और; करणम्=अन्तःकरण तथा इन्द्रिरूप करण; न=नहीं; विद्यते=है; अभ्यधिकः=उससे बड़ा; च=और; तत्समः=उसके समान; च=भी; (दूसरा) न=नहीं; दृश्यते=दीखता; च=तथा; अस्य=इस परमेश्वरकी; ज्ञानबलक्रिया=ज्ञान, बल और क्रियारूप; स्वाभाविकी=स्वाभाविक; परा=दिव्य; शक्तिः=शक्ति; विविधा=नाना प्रकारकी; एव=ही; श्रूयते=सुनी जाती है ॥८॥
व्याख्या—उन परब्रह्म परमात्माके जीवोंकी भाँति कार्य और करण—शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं; अर्थात् उनमें देह, इन्द्रिय आदिका भेद नहीं है। तीसरे अध्यायमें यह बात विस्तारपूर्वक बतायी गयी है कि वे इन्द्रियोंके बिना ही समस्त इन्द्रियोंका व्यापार करते हैं। उनसे बड़ा तो दूर रहा, उनके समान भी दूसरा कोई नहीं दीखता; वास्तवमें उनसे भिन्न कोई है ही नहीं। उन परमेश्वरकी ज्ञान, बल, और क्रियारूप स्वरूपभूत दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी सुनी जाती है ॥८॥
न तस्य कश्चित् पतिरस्ति लोके न चेष्टिता नैव च तस्य लिङ्गम्। स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥९॥
लोके=जगत्में; कश्चित्=कोई भी; तस्य=उस परमात्माका; पतिः=स्वामी;
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[ अध्याय ६ ]
न=नहीं; अस्ति=है; ईशिता=उसका शासक; च=भी; न=नहीं है; च=और; तस्य=उसका; लिङ्गम्=चिह्नविशेष भी; न एव=नहीं है; सः=वह; कारणम्=सबका परम कारण; (तथा) करणाधिपाधिपः=समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है; कश्चित्=कोई भी; न=न; च=तो; अस्य=इसका; जनिता=जनक है; च=और; न=न; अधिपः=स्वामी ही है ॥ ९ ॥
व्याख्या —जगत्में कोई भी उन परमात्माका स्वामी नहीं है। सभी उनके दास और सेवक हैं। उनका शासक—उनपर आज्ञा चलानेवाला भी कोई नहीं है। सब उन्हींकी आज्ञा और प्रेरणाका अनुसरण करते और उनके नियन्त्रणमें रहते हैं। उनका कोई चिह्नविशेष भी नहीं है; क्योंकि वे सर्वत्र परिपूर्ण, निराकार हैं तथा वे सबके परम कारण—कारणोंके भी कारण और समस्त अन्तःकरण और इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके भी अधिपति—शासक हैं। इन परब्रह्म परमात्माका न तो कोई जनक—अर्थात् इन्हें उत्पन्न करनेवाला पिता है और न कोई इनका अधिपति ही है। ये अजन्मा, सनातन, सर्वथा स्वतन्त्र और सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ९ ॥
यस्तनुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतो देव एकः स्वमावृणोत्। स नो दधाद्ब्रह्माप्ययम् ॥ १० ॥
तन्तुभिः=तन्तुओंद्वारा; तन्तुनाभः इव=मकड़ीकी भाँति; यः एकः देवः=जिस एक देव (परमात्मा) ने; प्रधानजैः=अपनी स्वरूपभूत मुख्य शक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योद्धार; स्वभावतः=स्वभावसे ही; स्वम्=अपनेको; आवृणोत्=आच्छादित कर रखा है; सः=वह परमेश्वर; नः=हमलोगोंको; ब्रह्माप्ययम्=अपने परब्रह्म रूपमें आश्रय; दधात्=दे ॥ १० ॥
व्याख्या —जिस प्रकार मकड़ी अपनेसे प्रकट किये हुए तन्तुजालसे स्वयं आच्छादित हो जाती है—उसमें अपनेको छिपा लेती है, उसी प्रकार जिन एक देव परमपुरुष परमेश्वरने अपनी स्वरूपभूत मुख्य एवं दिव्य अचिन्त्यशक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योद्धार स्वभावसे ही अपनेको आच्छादित कर रखा है, जिसके
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कारण संसारी जीव उन्हें देख नहीं पाते, वे सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा हमलोगोंको सबके परम आश्रयभूत अपने परब्रह्मस्वरूपमें स्थापित करें ॥ १० ॥
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ११ ॥
एकः=(वह) एक; देवः=देव ही; सर्वभूतेषु=सब प्राणियोंमें; गूढः=छिपा हुआ; सर्वव्यापी=सर्वव्यापी; (और) सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है; कर्माध्यक्षः=(वही) सबके कर्मोंका अधिष्ठाता; सर्वभूताधिवासः=सम्पूर्ण भूतोंका निवासस्थान; साक्षी=सबका साक्षी; चेता=चेतनस्वरूप [और सबको चेतना प्रदान करनेवाला]; केवलः=सर्वथा विशुद्ध; (और) निर्गुणः=च=गुणातीत भी है ॥ ११ ॥
व्याख्या—वे एक ही परमदेव परमेश्वर समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुहामें छिपे हुए हैं, वे सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमात्मा हैं। वे ही सबके कर्मोंके अधिष्ठाता—उनको कर्मानुसार फल देनेवाले और समस्त प्राणियोंके निवासस्थान—आश्रय हैं; तथा वे ही सबके साक्षी—शुभाशुभ कर्मको देखनेवाले, परम चेतनस्वरूप तथा सबको चेतना प्रदान करनेवाले, सर्वथा विशुद्ध अर्थात् निर्लैप और प्रकृतिके गुणोंसे अतीत भी हैं ॥ ११ ॥
एको वशी निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥
यः=जो; एकः=अकेला ही; बहूनाम्=बहुत-से; निष्क्रियाणाम्=वास्तवमें अक्रिय जीवोंका; वशी=शासक है; (और) एकम्=एक; बीजम्=प्रकृतिरूप बीजको; बहुधा=अनेक रूपोंमें परिणत; करोति=कर देता है; तम्=उस;
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[ अध्याय ६ ]
आत्मस्थम्=हृदयस्थित परमेश्वरको; ये=जो; धीराः=धीर पुरुष; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वतम्=सदा रहनेवाला; सुखम्=परमानन्द प्राप्त होता है; इतरेषाम्=दूसरोंको; न=नहीं ॥ १२ ॥
व्याख्या —जो विशुद्ध चेतनस्वरूप परमेश्वरके ही अंश होनेके कारण वास्तवमें निष्क्रिय हैं, ऐसे अनन्त जीवात्माओंके जो अकेले ही नियन्ता—कर्मफल देनेवाले हैं, जो एक प्रकृतिरूप बीजको बहुत प्रकारसे रचना करके इस विचित्र जगत्के रूपमें बनाते हैं उन हृदयस्थित सर्वशक्तिमान् परम सुहृद् परमेश्वरको जो धीर पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, निरन्तर उन्हींमें तन्मय हुए रहते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला परम आनन्द प्राप्त होता है; दूसरोंको अर्थात् जो इस प्रकार उनका निरन्तर चिन्तन नहीं करते उनको वह परमानन्द नहीं मिलता—वे उससे वञ्चित रह जाते हैं ॥ १२ ॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्र्वेतानाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत् कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १३ ॥
यः=जो; एकः=एक; नित्यः=नित्य; चेतनः=चेतन (परमात्मा); बहूनाम्=बहुत-से; नित्यानाम्=नित्य; चेतनानाम्=चेतन आत्माओंके; कामान् विदधाति=कर्मफलभोगोंका विधान करता है; तत्=उस; सांख्ययोगाधिगम्यम्=ज्ञानयोगसे और कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य; कारणम्=सबके कारणरूप; देवम्=परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥
व्याख्या —जो नित्य चेतन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा अकेले ही बहुत-से नित्य चेतन जीवात्माओंके कर्मफलभोगोंका विधान करते हैं, जिन्होंने इस विचित्र जगत्की रचना करके समस्त जीवसमुदायके लिये उनके कर्मानुसार फलभोगकी व्यवस्था कर रखी है, उनको प्राप्त करनेके दो साधन हैं—एक ज्ञानयोग, दूसरा कर्मयोग; भक्ति दोनोंमें ही अनुस्यूत है, इस कारण उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। उन ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये
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जानेयोग्य सबके कारणरूप परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जो उन्हें जान लेता है और प्राप्त कर लेता है, वह कभी किसी भी कारणसे जन्म-मरणके बन्धनमें नहीं पड़ता। अतः मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको प्राप्त करनेके लिये अपनी योग्यता और रुचिके अनुसार ज्ञानयोग या कर्मयोग—किसी एक साधनमें तत्परतापूर्वक लग जाना चाहिये ॥ १३ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १४ ॥*
तत्र=वहाँ; न=न तो; सूर्यः=सूर्य; भाति=प्रकाश फैला सकता है; न=न; चन्द्रतारकम्=चन्द्रमा और तारागणका समुदाय ही; (और) न=न; इमाः=ये; विद्युतः=बिजलियाँ ही; भान्ति=वहाँ प्रकाशित हो सकती हैं; अयम्=(फिर) यह; अग्निः=लौकिक अग्नि तो; कुतः=कैसे प्रकाशित हो सकता है; (क्योंकि) तम् भान्तम् एव=उसके प्रकाशित होनेपर ही (उसोके प्रकाशसे); सर्वम्=बतलाये हुए सूर्य आदि सब; अनुभाति=उसके पीछे प्रकाशित होते हैं; तस्य=उसके; भासा=प्रकाशसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १४ ॥
व्याख्या —उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य अपना प्रकाश नहीं फैला सकता, जिस प्रकार सूर्यके प्रकाशित होनेपर जुगनूका प्रकाश लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार सूर्यका भी तेज वहाँ लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ अपना प्रकाश नहीं फैला सकते, फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है; क्योंकि इस जगत्में जो कोई भी प्रकाशशील तत्त्व है, वे उन परम प्रकाशस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी
- यह मन्त्र कठ० २।२।१५ और मुण्डक० २।२।१० में भी है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
प्रकाशशक्तिके किसी अंशको पाकर ही प्रकाशित होते हैं। फिर वे अपने प्रकाशकके समीप कैसे अपना प्रकाश फैला सकते हैं? अतः यही समझना चाहिये कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे ही प्रकाशित हो रहा है ॥ १४ ॥
एको ह०सो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ १५ ॥
अस्य=इस; भुवनस्य=ब्रह्माण्डके; मध्ये=बीचमें; (जो) एकः=एक; हंसः=प्रकाशस्वरूप परमात्मा (परिपूर्ण है); सः एव=वही; सलिले=जलमें; संनिविष्टः=स्थित; अग्निः=अग्नि है; तम्=उसे; विदित्वा=जानकर; एव=ही; (मनुष्य) मृत्युम् अत्येति=मृत्युरूप संसार-समुद्रसे सर्वथा पार हो जाता है; अयनाय=दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये; अन्यः=दूसरा; पन्थाः=मार्ग; न=नहीं; विद्यते=है ॥ १५ ॥
व्याख्या—इस ब्रह्माण्डमें जो एक प्रकाशस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सर्वत्र परिपूर्ण है, वे ही जलमें प्रविष्ट अग्नि हैं। यद्यपि शीतल स्वभावयुक्त जलमें उष्णस्वभाव अग्निका होना साधारण दृष्टिसे समझमें नहीं आता; क्योंकि दोनोंका स्वभाव परस्पर विरुद्ध है, तथापि उसके रहस्यको जाननेवाले वैज्ञानिकोंको यह प्रत्यक्ष दीखता है, अतः वे उसी जलमेंसे बिजलीके रूपमें उस अग्नि तत्त्वको निकालकर नाना प्रकारके कार्योंका साधन करते हैं। शास्त्रोंमें भी जगह-जगह यह बात कही गयी है कि समुद्रमें बड़वानल अग्नि है। अपने कार्यमें कारण व्याप्त रहता है—इस न्यायसे भी जलतत्त्वका कारण होनेसे तेजस्तत्त्वका जलमें व्याप्त होना उचित ही है। किंतु इस रहस्यको न जाननेवाला जलमें स्थित अग्निको नहीं देख पाता। इसी प्रकार परमात्मा इस जड़ जगत्से स्वभावतः सर्वथा विलक्षण हैं; क्योंकि वे चेतन, ज्ञानस्वरूप और सर्वज्ञ हैं तथा यह जगत् जड़ और ज्ञेय है। इस प्रकार जगत्से विरुद्ध दीखनेके कारण साधारण
अध्याय ६ ]
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दृष्टिसे यह बात समझमें नहीं आती कि वे इसमें किस प्रकार व्याप्त हैं और किस प्रकार इसके कारण हैं। परंतु जो उस परब्रह्मकी अचिन्त्य अद्भुत शक्तिके रहस्यको समझते हैं, उनको ये प्रत्यक्षवत् सर्वत्र परिपूर्ण और सबके एकमात्र कारण प्रतीत होते हैं। उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको जानकर ही मनुष्य इस मृत्युरूप संसार-समुद्रसे पार हो सकता है—सदाके लिये जन्म-मरणसे सर्वथा छूट सकता है। उनके दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। अतः हमें उन परमात्माका जिज्ञासु होकर उन्हें जाननेकी चेष्टामें लग जाना चाहिये ॥ १५ ॥
सम्बन्ध— जिनको जाननेसे जन्म-मरणसे छूटनेकी बात कही गयी है, वे परमेश्वर कैसे हैं—इस जिज्ञासापर उनके स्वरूपका वर्णन किया जाता है—
स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनि-
र्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद् यः।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः
सः सारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः
॥ १६ ॥
सः=वह; ज्ञः=ज्ञानस्वरूप परमात्मा; विश्वकृद्=सर्वस्रष्टा; विश्वविद्=सर्वज्ञ; आत्मयोनिः= स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु; कालकालः= कालका भी महाकाल; गुणी= सम्पूर्ण दिव्यगुणोंसे सम्पन्न; (और) सर्वविद्= सबको जाननेवाला है; यः= जो; प्रधानक्षेत्रज्ञपतिः= प्रकृति और जीवात्माका स्वामी; गुणेशः= समस्त गुणोंका शासक; (तथा) संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः= जन्म-मृत्युरूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है ॥ १६ ॥
व्याख्या— जिनका प्रकरण चल रहा है, वे ज्ञानस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, सर्वज्ञ और स्वयं ही अपनेको प्रकट करनेमें हेतु हैं। उन्हें प्रकट करनेवाला कोई दूसरा कारण नहीं है। वे कालके भी महाकाल हैं, कालकी भी उनतक पहुँच नहीं है। वे कालातीत हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है कि सबका संहार करनेवाला मृत्यु उन महाकालरूप परमात्माका
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
उपसेचन—खाद्य है (१।२।२४)। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सौहार्द्र, प्रेम, दया आदि समस्त कल्याणमय दिव्य गुणोंसे सम्पन्न हैं, संसारमें जितने भी शुभ गुण देखनेमें आते हैं, वे उन दिव्य गुणोंके किसी एक अंशकी झलक हैं। वे समस्त जीवोंको, उनके कर्मोंको और अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तीनों कालोंमें घटित होनेवाली छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी घटनाको भलीभाँति जानते हैं। वे प्रकृति और जीव-समुदायके (अपनी अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके) स्वामी हैं तथा कार्य-कारणरूपमें स्थित सत्त्व आदि तीनों गुणोंका यथायोग्य नियन्त्रण करते हैं। वे ही इस जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें जीवोंको उनके कर्मानुसार बाँधकर रखते, उनका पालन-पोषण करते और इस बन्धनसे जीवोंको मुक्त भी करते हैं। उनकी कृपासे ही जीव मुक्तिके साधनमें लगकर साधनके परिपक्व होनेपर मुक्त होते हैं ॥१६॥
स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो
ऋः सर्वगो भुवनस्यास्य गोसा।
य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव
नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥
सः हि=वही; तन्मयः=तन्मय; अमृतः=अमृतस्वरूप; ईशसंस्थः=ईशवरों (लोकपालों) में भी आत्मरूपसे स्थित; ऋः=सर्वज्ञ; सर्वगः=सर्वत्र परिपूर्ण; (और) अस्य=इस; भुवनस्य=ब्रह्माण्डका; गोसा=रक्षक है; यः=जो; अस्य=इस; जगतः=सम्पूर्ण जगत्का; नित्यम्=सदा; एव=ही; ईशे=शासन करता है; (क्योंकि) ईशनाय=इस जगत्पर शासन करनेके लिये; अन्यः=दूसरा कोई भी; हेतुः=हेतु; न=नहीं; विद्यते=है ॥१७॥
व्याख्या —जिनके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन हुआ है, वे परब्रह्म परमेश्वर ही इस जगत्के—स्वरूपमें स्थित, अमृतस्वरूप—एकरस हैं; इस जगत्के उत्पत्ति-विनाशरूप परिवर्तनसे उनका परिवर्तन नहीं होता। वे समस्त ईश्वरोंमें—समस्त लोकोंका पालन करनेके लिये नियुक्त किये हुए लोकपालोंमें भी
अध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५१७
अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे सर्वज्ञ, सर्वत्र परिपूर्ण परमेश्वर ही इस समस्त ब्रह्माण्डकी रक्षा करते हैं; वे ही इस सम्पूर्ण जगत्का सदा यथायोग्य नियन्त्रण और संचालन करते हैं। दूसरा कोई भी इस जगत्पर शासन करनेके लिये उपयुक्त हेतु नहीं प्रतीत होता; क्योंकि दूसरा कोई भी सबपर शासन करनेमें समर्थ नहीं है॥ १७॥
सम्बन्ध— उपयुक्त परमेश्वरको जानने और पानेके लिये साधनके रूपमें उन्हींकी शरण लेनेका प्रकार बताया जाता है—
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तः ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥ १८॥
यः =जो परमेश्वर; वै =निश्चय ही; पूर्वम् =सबसे पहले; ब्रह्माणम् =ब्रह्माको; विदधाति =उत्पन्न करता है; च =और; यः =जो; वै =निश्चय ही; तस्मै =उस ब्रह्माको; वेदान् =समस्त वेदोंका ज्ञान; प्रहिणोति =प्रदान करता है; तम् आत्मबुद्धिप्रकाशम् =उस परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले; ह देवम् =प्रसिद्ध देव परमेश्वरको; अहम् =मैं; मुमुक्षुः =मोक्षकी इच्छावाला साधक; शरणम् =आश्रयरूपमें; प्रपद्ये =ग्रहण करता हूँ॥ १८॥
व्याख्या— उन परमेश्वरको प्राप्त करनेका सार्वभौम एवं सुगम उपाय सर्वतोभावेसे उन्हींपर निर्भर होकर उन्हींकी शरणमें चले जाना है। अतः साधकको मनके द्वारा नीचे लिखे भावका चिन्तन करते हुए परमात्माकी शरणमें जाना चाहिये। जो परमेश्वर निश्चय ही सबसे पहले अपने नाभिकमलमेंसे ब्रह्माको उत्पन्न करते हैं, उत्पन्न करके उन्हें निःसंदेह समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करते हैं तथा जो अपने स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपने भक्तोंके हृदयमें तदनुरूप विशुद्ध बुद्धिको प्रकट करते हैं (गीता १०।१०), उन पूर्व-मन्त्रोंमें वर्णित सर्वशक्तिमान् प्रसिद्ध देव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी मैं मोक्षकी
५१८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
अभिलाषासे युक्त होकर शरण ग्रहण करता हूँ—वे ही मुझे इस संसार-बन्धनसे छुड़ायें ॥ १८ ॥
निष्कलं निष्क्रियः शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ।
अमृतस्य परः सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥ १९ ॥
निष्कलम्=कलाओंसे रहित; निष्क्रियम्=क्रियारहित; शान्तम्=सर्वथा शान्त; निरवद्यम्=निर्दीप्य; निरञ्जनम्=निर्मल; अमृतस्य=अमृतके; परम्=परम; सेतुम्=सेतुरूप; (तथा) दग्धेन्धनम्=जले हुए ईंधनसे युक्त; अनलम् इव=अग्निकी भाँति (निर्मल ज्योतिःस्वरूप उन परमात्माका मैं चिन्तन करता हूँ) ॥ १९ ॥
व्याख्या—निर्गुण-निराकार परमात्माकी उपासना करनेवाले साधकको इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये कि जो (पहले बतलायी हुई) सोलह कलाओंसे अर्थात् संसारके सम्बन्धसे रहित, सर्वथा क्रिया-शून्य, परम शान्त और सब प्रकारके दोषोंसे रहित हैं, जो अमृतस्वरूप मोक्षके परम सेतु हैं अर्थात् जिनका आश्रय लेकर मनुष्य अत्यन्त सुगमतापूर्वक इस संसारसमुद्रसे पार हो सकता है, जो लकड़ीका पार्थिव अंश जल जानेके बाद धधकते हुए अंगारोंवाली अग्निकी भाँति सर्वथा निर्विकार, निर्मल प्रकाशस्वरूप, ज्ञानस्वरूप परम चेतन हैं, उन निर्विशेष निर्गुण-निराकार परमात्माको तत्त्वसे जाननेके लिये उन्हींको लक्ष्य बनाकर उनका चिन्तन करता हूँ ॥ १९ ॥
सम्बन्ध—पहले जो यह बात कही गयी थी कि इस संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये उन परमात्माको जान लेनेके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है, उसीको दृढ़ किया जाता है—
यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः ।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥ २० ॥
यदा=जब; मानवाः=मनुष्यगण; आकाशम्=आकाशको; चर्मवत्=चमड़ेकी भाँति; वेष्टयिष्यन्ति=लपेट सकेंगे; तदा=तब; देवम्=उन परमदेव परमात्माको;
अध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५१९
अविज्ञाय=बिना जाने भी; दुःखस्य=दुःख-समुदायका; अन्तः=अन्त; भविष्यति=हो सकेगा ॥ २० ॥
व्याख्या —भाव यह है कि जिस प्रकार आकाशको चमड़ेकी भाँति लेपटना मनुष्यके लिये सर्वथा असम्भव है, सारे मनुष्य मिलकर भी इस कार्यको नहीं कर सकते, उसी प्रकार परमात्माको बिना जाने कोई भी जीव इस दुःखसमुद्रसे पार नहीं हो सकता। अतः मनुष्यको दुःखोंसे सर्वथा छूटने और निश्चल परमानन्दकी प्राप्तिके लिये अन्य सब ओरसे मनको हटाकर एकमात्र उन्हींको जाननेके साधनमें तीव्र इच्छासे लग जाना चाहिये ॥ २० ॥
तपःप्रभावाद् देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान् ।
अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं
प्रोवाच सम्यग्पुणिसङ्गजुष्टम् ॥ २१ ॥
ह=यह प्रसिद्ध है कि; श्वेताश्वतरः=श्वेताश्वतर नामक ऋषि; तपः-प्रभावात्=तपके प्रभावसे; च=और; देवप्रसादात्=परमदेव परमेश्वरकी कृपासे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विद्वान्=जान सका; अथ=तथा; (उसने) ऋषिसङ्गजुष्टम्=ऋषि-समुदायसे सेवित; परमम्=परम; पवित्रम्=पवित्र (इस ब्रह्मतत्त्वका); अत्याश्रमिभ्यः=आश्रमके अभिमानसे अतीत अधिकारियोंको; सम्यक्=पूर्णरूपसे; प्रोवाच=उपदेश किया था ॥ २१ ॥
व्याख्या —यह बात प्रसिद्ध है कि श्वेताश्वतर ऋषिने तपके प्रभावसे अर्थात् समस्त विषय-सुखका त्याग करके संयममय जीवन बिताते हुए निरन्तर परमात्माके ही चिन्तनमें लगे रहकर उन परमदेव परमेश्वरकी अहैतुकी दयासे उन्हें जान लिया था। फिर उन्होंने ऋषि-समुदायसे सेवित—उनके परम लक्ष्य इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका आश्रमके अभिमानसे सर्वथा अतीत हुए देहाभिमानशून्य अधिकारियोंको भलीभाँति उपदेश किया था। इससे इस मन्त्रमें यह बात भी दिखला दी गयी कि देहाभिमानशून्य साधक ही ब्रह्मतत्त्वका उपदेश सुननेके वास्तविक अधिकारी हैं ॥ २१ ॥
५२०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्ये प्रचोदितम्।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥ २२ ॥
[ इदम् ]=यह; परमम्=परम; गुह्यम्=रहस्यमय ज्ञान; पुराकल्ये=पूर्वकल्पमें; वेदान्ते=वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में; प्रचोदितम्=भलीभाँति वर्णित हुआ था; अप्रशान्ताय=जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको; न दातव्यम्=इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; पुनः=तथा; अपुत्राय=जो अपना पुत्र न हो; वा=अथवा; अशिष्याय=जो शिष्य न हो, उसे; न (दातव्यम्)=नहीं देना चाहिये ॥ २२ ॥
व्याख्या—यह परम रहस्यमय ज्ञान पूर्वकल्पमें भी वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में भलीभाँति वर्णित हुआ था। भाव यह कि इस ज्ञानकी परम्परा कल्प-कल्पान्तरसे चली आती है, यह कोई नयी बात नहीं है। इसका उपदेश किसे दिया जाय और किसे नहीं, ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—‘जिसका अन्तःकरण विषय-वासनासे शून्य होकर सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको इस रहस्यका उपदेश नहीं देना चाहिये; तथा जो अपना पुत्र न हो अथवा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना चाहिये।’ भाव यह है कि या तो जो सर्वथा शान्तचित्त हो, ऐसे अधिकारीको देना चाहिये अथवा जो अपना पुत्र या शिष्य हो, उसे देना चाहिये; क्योंकि पुत्र और शिष्यको अधिकारी बनाना पिता और गुरुका ही काम है; अतः वह पहलेसे ही अधिकारी हो, यह नियम नहीं है ॥ २२ ॥
यस्य देवे परा भक्तियथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।
प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ २३ ॥
यस्य=जिसकी; देवे=परमदेव परमेश्वरमें; परा=परम; भक्तिः=भक्ति है; (तथा) यथा=जिस प्रकार; देवे=परमेश्वरमें है; तथा=उसी प्रकार; गुरौ=गुरुमें भी है; तस्य महात्मनः=उस महात्मा पुरुषके हृदयमें; हि=ही; एते=ये; कथिताः=बताये
अध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५२१
हुए; अर्थाः=रहस्यमय अर्थ; प्रकाशन्ते=प्रकाशित होते हैं; प्रकाशन्ते महात्मनः=उसी महात्माके हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ २३ ॥
व्याख्या —जिस साधककी परमदेव परमेश्वरमें परम भक्ति होती है तथा जिस प्रकार परमेश्वरमें होती है, उसी प्रकार अपने गुरुमें भी होती है, उस महात्मा—मनस्वी पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं। अतः जिज्ञासुको पूर्ण श्रद्धालु और भक्त बनना चाहिये। जिसमें पूर्ण श्रद्धा और भक्ति है, उसी महात्माके हृदयमें ये गूढ़ अर्थ प्रकाशित होते हैं। इस मन्त्रमें अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २३ ॥
॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
॥ कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ आरम्भमें दिया जा चुका है।
॥ श्रीहरिः ॥
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| असुर्या नाम ते लोकाः | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | २९ |
| अन्धं तमः प्रविशन्ति | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ३४ |
| अन्यदेवाहुर्विद्यया | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ३५ |
| अन्धं तमः प्रविशन्ति | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ३८ |
| अन्यदेवाहुः सम्भवात् | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ३९ |
| अग्ने नय सुपथा राये | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ४४ |
| अनेजदेकं मनसो जवीयः | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ३० |
| अथ वायुमब्रुवन् | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ७ | ६३ |
| अथाध्यात्मं यदेतत् | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ५ | ७० |
| अथेन्द्रमब्रुवन् | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ११ | ६५ |
| अग्निर्यथैको भुवनम् | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ९ | १५२ |
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १२ | १४३ |
| ,, ,, | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १३ | १४४ |
| ,, ,, | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १७ | १६८ |
| अजीर्यताममृतानाम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २८ | ९७ |
| अणोरणीयान्महतः | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २० | ११५ |
| अनुपश्य यथा पूर्वे | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ६ | ८० |
| अन्यच्छ्रेयोऽन्यत् | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १ | ९८ |
| अन्यत्र धर्मादन्यत्र० | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १४ | १११ |
| अरण्योर्निहितः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ८ | १४१ |
| अविद्यायामन्तरे | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ५ | १०२ |
( ५२३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अव्यक्तात्तु परः | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ८ | १६२ |
| अशब्दमस्पर्शम् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १५ | १३३ |
| अशरीरँशरीरेषु | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २२ | ११७ |
| अस्तीत्येवोपलब्धव्यः | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १३ | १६६ |
| अस्य विस्रंसमानस्य | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ४ | १४९ |
| अत्रैष देवः स्वप्ने | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ५ | २०७ |
| अथ कबन्धी कात्यायनः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ३ | १७४ |
| अथ यदि द्विमात्रेण | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ४ | २१६ |
| अथ हैनं कौसल्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | १ | १९४ |
| अथ हैनं भार्गवः | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १ | १८६ |
| अथ हैनं शैब्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | १ | २१३ |
| अथ हैनं सुकेशा | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | १ | २२० |
| अथ हैनं सौर्यायणी | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | १ | २०३ |
| अथादित्य उदयन् | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ६ | १७६ |
| अथैकयोर्ध्व उदानः | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ७ | १९८ |
| अथोत्तरेण तपसा | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १० | १८० |
| अन्नं वै प्रजापतिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १४ | १८४ |
| अरा इव रथनाभौ | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ६ | १८९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ६ | २२५ |
| अहोरात्रो वै प्रजापतिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १३ | १८३ |
| अग्निर्मूर्धा चक्षुषी | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ४ | २५० |
| अतः समुद्रा गिरयश्च | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ९ | २५५ |
| अथर्वणे यां प्रवदेत | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | २ | २३० |
| अरा इव रथनाभौ | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ६ | २६० |
| अविद्यायामन्तरे | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ८ | २४३ |
( ५२४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अविद्यायां बहुधा | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ९ | २४४ |
| अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | २९६ |
| अग्निर्वाग्भूत्वा मुखम् | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | ३०६ |
| अथ यदि ते | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ११ | ३ | ३६६ |
| अथाधिज्यौतिषम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | २ | ३३७ |
| अथाधिविद्यम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ३ | ३३८ |
| अथाधिप्रजम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ४ | ३३८ |
| अथाध्यात्मम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ५ | ३३९ |
| अथातोऽनुप्रश्नाः | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | ३ | ३८७ |
| अन्तरेण तालुके | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | २ | ३५१ |
| अन्नं न निन्द्यात् | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ७ | १ | ४१५ |
| अन्नं न परिचक्षीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ८ | १ | ४१७ |
| अन्नं बहु कुर्वीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ९ | १ | ४१९ |
| अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | २ | १ | ४०६ |
| अन्नाद् वै प्रजाः प्रजायन्ते | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | २ | १ | ३७४ |
| असद् वा इदमग्र आसीत् | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | १ | ३९० |
| असन्नेव स भवति | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | १ | ३८६ |
| अहं वृक्षस्य रेरिवा | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | १० | १ | ३६१ |
| अजात इत्येवं कश्चित् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २१ | ४८९ |
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ४६७ |
| अपाणिपादो जवनो ग्रहीता | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १९ | ४७१ |
| अग्निर्यत्राभिमथ्यते | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४५० |
| अणोरणीयान् महतो महीयान् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | २० | ४७१ |
| अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ५०१ |
| अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम् | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४७६ |