ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ४ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४८५
सम्पूर्ण जगत्के अधिपति और समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे छिपे हुए हैं। उन्हींमें वेदके रहस्यको समझनेवाले महर्षिगण और समस्त देवतालोग भी ध्यानके द्वारा संलग्न रहते हैं। सब उन्हींका स्मरण और चिन्तन करके उन्हींमें जुड़े रहते हैं। इस प्रकार उन परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य यमराजके समस्त पाशोंको अर्थात् जन्म-मृत्युके कारणभूत समस्त बन्धनोंको काट डालता है। फिर वह कभी प्रकृतिके बन्धनमें नहीं आता, सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥
घृतात् परं मण्डभिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गृह्णम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १६ ॥
शिवम्=कल्याणस्वरूप; एकम् देवम्=एक (अद्वितीय) परमदेवको; घृतात् परम्=मक्खनके ऊपर रहनेवाले; मण्डम् इव=सारभागकी भाँति; अतिसूक्ष्मम्=अत्यन्त सूक्ष्म; (और) सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; गृह्णम्=छिपा हुआ; ज्ञात्वा=जानकर; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर स्थित हुआ; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे, मुच्यते=छूट जाता है ॥ १६ ॥
व्याख्या—जो मक्खनके ऊपर रहनेवाले सारभागकी भाँति सबके सार एवं अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन कल्याणस्वरूप एकमात्र परमदेव परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ तथा समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर उसे व्याप्त करनेवाला जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सदाके लिये सर्वथा छूट जाता है ॥ १६ ॥
एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । हृदा मनीषा मनसाभिकल्पो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १७ ॥
एषः=यह; विश्वकर्मा=जगत्कर्ता; महात्मा=महात्मा; देवः=परमदेव परमेश्वर;
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ४ ]
सदा=सर्वदा; जनानाम्=सब मनुष्योंके; हृदये=हृदयमें; संनिविष्टः=सम्यक् प्रकारसे स्थित है; (तथा) हृदा=हृदयसे; मनीषा=बुद्धिसे; (और) मनसा=मनसे; अभिक्लृप्तः=ध्यानमें लाया हुआ; [ आविर्भवति= ] प्रत्यक्ष होता है; ये=जो साधक; एतत्=इस रहस्यको; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमृतस्वरूप; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १७ ॥
व्याख्या —ये जगत्को उत्पन्न करनेवाले महात्मा अर्थात् सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमदेव परमेश्वर सदा ही सभी मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं। उनके गुण-प्रभावको सुनकर द्रवित और विशुद्ध हुए निर्मल हृदयसे, निश्चययुक्त बुद्धिसे तथा एकाग्र मनके द्वारा निरन्तर ध्यान करनेपर वे परमात्मा प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इस रहस्यको जान लेते हैं, वे उन्हें प्राप्त करके अमृतस्वरूप हो जाते हैं, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ १७ ॥
यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि- न सन्न चासञ्चिष्व एव केवलः।
तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं
प्रज्ञा च तस्मात् प्रसूता पुराणी ॥ १८ ॥
यदा=जब; अतमः [ स्यात् ]=अज्ञानमय अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है; तत्*=उस समय (अनुभवमें आनेवाला तत्त्व); न=न; दिवा=दिन है; न=न; रात्रिः=रात है; न=न; सन्=सत् है; च=और; न=न; असन्=असत् है; केवलः=एकमात्र, विशुद्ध; शिवः एव=कल्याणमय शिव ही है; तत्=वह; अक्षरम्=सर्वथा अविनाशी है; तत्=वह; सवितुः=सूर्याभिमानी देवताका भी; वरेण्यम्=उपास्य है; च=तथा; तस्मात्=उसीसे; पुराणी=(यह) पुराना; प्रज्ञा=ज्ञान; प्रसूता=फैला है ॥ १८ ॥
व्याख्या —जिस समय अज्ञानरूप अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय प्रत्यक्ष होनेवाला तत्त्व न दिन है, न रात है। अर्थात् उसे न तो दिनकी भाँति प्रकाशमय कहा जा सकता है और न रातकी भाँति
- 'तत्' अव्यय पद है, यहाँ 'तदा'के अर्थमें इसका प्रयोग हुआ है।
अध्याय ४ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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अन्धकारमय ही; क्योंकि वह इन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है, वहाँ ज्ञान-अज्ञानके भेदकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। वह न सत् है और न असत् है—उसे न तो 'सत्' कहना बनता है न 'असत्' ही; क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' नामसे समझे जानेवाले पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। एकमात्र कल्याणस्वरूप शिव ही वह तत्त्व हैं। वे सर्वथा अविनाशी हैं। सूर्य आदि समस्त देवताओंके उपास्यदेव हैं। उन्हींसे यह सदासे चला आता हुआ अनादि ज्ञान विस्तारित हुआ है अर्थात् परमात्माको जानने और पानेका साधन अधिकारियोंको परम्परासे प्राप्त होता चला आ रहा है॥ १८ ॥
नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्नभत्।
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः॥ १९ ॥
एनम्=इस परमात्माको; (कोई भी) न=न तो; ऊर्ध्वम्=ऊपरसे; न=न; तिर्यञ्चम्=इधर-उधरसे; (और) न=न; मध्ये=बीचमेंसे ही; परिजग्नभत्=भलीभाँति पकड़ सकता है; यस्य=जिसका; महद्यशः=महान् यश; नाम=नाम है; तस्य=उसकी; प्रतिमा=कोई उपमा; न=नहीं; अस्ति=है॥ १९ ॥
व्याख्या —जिसका पहले कई मन्त्रोंमें वर्णन किया गया है, उन परम प्राप्य परब्रह्मको कोई भी मनुष्य न तो ऊपरसे पकड़ सकता है, न नीचेसे पकड़ सकता है और न बीचमें इधर-उधरसे ही पकड़ सकता है; क्योंकि ये सर्वथा अग्राह्य हैं—ग्रहण करनेमें नहीं आते। इन्हें जानने और ग्रहण करनेकी बात जो शास्त्रोंमें पायी जाती है, उसका रहस्य वही समझ सकता है, जो उन्हें पा लेता है। वह भी वाणीद्वारा व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि मन और वाणीकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे समझने और समझानेमें आनेवाले समस्त पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण हैं। जिनका नाम 'महान् यश' है, जिनका महान् यश सर्वत्र प्रसिद्ध है, उन परात्पर ब्रह्मकी कोई भी उपमा नहीं है, जिसके द्वारा उनको समझा अथवा समझाया जा सके। उनके अतिरिक्त कोई दूसरा उनके समान हो तो उसकी उपमा दी जाय। अतः मनुष्यको उस परम प्राप्य तत्त्वको जानने और
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ४ ]
पानेका अभिलाषी बनना चाहिये; क्योंकि जब वह मनुष्यको प्राप्त होता है, तब हमें क्यों नहीं होगा ॥ १९ ॥
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हदा हृदिस्थं मनसा य एन- मेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २० ॥
अस्य=इस परब्रह्म परमात्माका; रूपम्=स्वरूप; संदृशे=दृष्टिके सामने; न=नहीं; तिष्ठति=ठहरता; एनम्=इस परमात्माको; कश्चन=कोई भी; चक्षुषा=आँखोंसे; न=नहीं; पश्यति=देख सकता; ये=जो साधकजन; एनम्=इस; हृदिस्थम्=हृदयमें स्थित अन्तर््यामी परमेश्वरको; हदा=भक्तियुक्त हृदयसे; (तथा) मनसा=निर्मल मनके द्वारा; एवम्=इस प्रकार; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमृतस्वरूप (अमर); भवन्ति=हो जाते हैं ॥ २० ॥
व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, उन परम प्राप्य परमात्माका स्वरूप दृष्टिके सामने नहीं ठहरता। जब साधक मनके द्वारा उनका चिन्तन करता है, तब विशुद्ध अन्तःकरणमें किसी-किसी समय उन आनन्दमय परमेश्वरके स्वरूपकी झलक-सी आती है; परंतु वह निश्चल नहीं होती। इन परब्रह्म परमात्माको कोई भी प्राकृत नेत्रोंद्वारा नहीं देख सकता। जिसको वे परमात्मा स्वयं कृपा करके दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं, वही उन्हें दिव्य नेत्रोंसे देख सकता है। जो साधक इस प्रकार इस रहस्यको समझकर अपने हृदयमें स्थित इन अन्तर््यामी परमात्माको उनके गुण, प्रभावका श्रवण करके भक्तिभावसे द्रवित हृदयके द्वारा तथा निर्मल मनके द्वारा निरन्तर उनका चिन्तन करके उन्हें जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं—सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ २० ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका और उनकी प्राप्तिके फलका वर्णन करके अब दो मन्त्रोंमें पहले मुक्तिके लिये और पीछे सांसारिक भयसे रक्षाके लिये उन परमात्मासे प्रार्थना करनेका प्रकार बताया जाता है—
अध्याय ४ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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अजात इत्येवं कश्चिद् भीरुः प्रपद्यते। रुद्र यते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥ २१ ॥
रुद्र=हे रुद्र (संहार करनेवाले देव) !; अजात=तू अजन्मा है; इति एवम्=यों समझकर; कश्चित्=कोई; भीरुः=जन्म-मरणके भयसे डरा हुआ मनुष्य; प्रपद्यते=तेरी शरण लेता है; (मैं भी वैसा ही हूँ, अतः) ते=तेरा; यत्=जो; दक्षिणम्=दाहिना (कल्याणमय); मुखम्=मुख है; तेन=उसके द्वारा; (तू) नित्यम्=सर्वदा; माम् पाहि=मेरी जन्म-मृत्युरूप भयसे रक्षा कर ॥ २१ ॥
व्याख्या—हे रुद्र! अर्थात् सबका संहार करनेवाले परमेश्वर! आप स्वयं अजन्मा हैं, अतः दूसरोंको भी जन्म-मृत्युसे मुक्त कर देना आपका स्वभाव है। यह समझकर कोई जन्म-मरणके भयसे डरा हुआ साधक इस संसारचक्रसे छुटकारा पानेके लिये आपकी शरण लेता है। मैं भी इस संसारचक्रसे छुटकारा पानेके लिये ही आपकी शरणमें आया हूँ; अतः जो आपका दाहिना मुख है, अर्थात् जो आपका परम शान्त कल्याणमय स्वरूप है, उसके द्वारा आप मेरा इस जन्म-मरणरूप महान् भयसे सदाके लिये रक्षा करें। मुझे सदाके लिये इस भयसे मुक्त कर दें ॥ २१ ॥
मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्पन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥ २२ ॥*
रुद्र=हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव !; [ वयम् ]=हमलोग; हविष्पन्तः=नाना प्रकारकी भेंट लेकर; सदम्=सदा; इत्=ही; त्वा=तुझे; (रक्षाके लिये) हवामहे=बुलाते रहते हैं; (अतः तू) भामितः=कुपित होकर; मा=न तो; नः=हमारे; तोके=पुत्रोंमें; (और) तनये=पौत्रोंमें; मा=न; नः=हमारी; आयुषि=आयुमें; मा=न; नः=हमारी; गोषु=गौओंमें; (और) मा=न; नः=हमारे; अश्वेषु=घोड़ोंमें ही; रीरिषः=किसी
- यह यजुर्वेद अध्याय १६ का सोलहवाँ मन्त्र है। ऋग्वेद मण्डल १०, सूक्त ११४ का आठवाँ मन्त्र है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
प्रकारकी कमी कर; (तथा) नः=हमारे; वीरान् मा वधीः=वीर पुरुषोंका भी नाश न करें ॥ २२ ॥
व्याख्या —हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव ! हमलोग नाना प्रकारकी भेंट समर्पण करते हुए सदा ही आपको बुलाते रहते हैं। आप ही हमारी रक्षा करनेमें सर्वथा समर्थ हैं; अतः हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमपर कभी कुपित न हों तथा कुपित होकर हमारे पुत्र और पौत्रोंको, हमारी आयुको—जीवनको तथा हमारे गौ, घोड़े आदि पशुओंको कभी किसी प्रकारकी क्षति न पहुँचायें। हमारे जो वीर—साहसी पुरुष हैं, उनका भी नाश न करें; अर्थात् सब प्रकारसे हमारी और हमारे धन-जनकी रक्षा करें ॥ २२ ॥
॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥
पञ्चम अध्याय
द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे। क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥
यत्र =जिस, ब्रह्मपरे =ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ; गूढे =छिपे हुए; अनन्ते =असीम; तु =और; अक्षरे =परम अक्षर परमात्मामें; विद्याविद्ये =विद्या और अविद्या; द्वे =दोनों; निहिते =स्थित हैं (वही ब्रह्म है); क्षरम् =(यहाँ) विनाशशील जडवर्ग; तु =तो; अविद्या =अविद्या नामसे कहा गया है; तु =और; अमृतम् =अविनाशी वर्ग (जीवसमुदाय); हि =ही; विद्या =विद्या नामसे कहा गया है; तु =तथा; यः =जो; विद्याविद्ये ईशते =उपर्युक्त विद्या और अविद्यापर शासन करता है; सः =वह; अन्यः =इन दोनोंसे भिन्न—सर्वथा विलक्षण है ॥ १ ॥
व्याख्या —जो परमेश्वर ब्रह्मासे भी अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, अपनी मायाके पर्देमें छिपे हुए हैं, सीमारहित और अविनाशी हैं अर्थात् जो देश-कालसे सर्वथा अतीत हैं तथा जिनका कभी किसी प्रकारसे भी विनाश नहीं हो सकता तथा जिन
अध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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परमात्मामें अविद्या और विद्या—दोनों विद्यमान हैं, अर्थात् दोनों ही जिनके आधारपर टिकी हुई हैं, वे पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम हैं। इस मन्त्रमें परिवर्तनशील, घटने-बढ़नेवाले और उत्पत्ति-विनाशशील क्षरतत्त्वको तो अविद्या नामसे कहा गया है; क्योंकि वह जड़ है, उनमें विद्याका—ज्ञानका सर्वथा अभाव है। उससे भिन्न जो जन्म-मृत्युसे रहित है, जो घटता-बढ़ता नहीं, वह अविनाशी कूटस्थ तत्त्व (जीव-समुदाय) विद्याके नामसे कहा गया है; क्योंकि वह चेतन है, विज्ञानमय है। उपनिषदोंमें जगह-जगह उसका विज्ञानात्माके नामसे वर्णन आया है। यहाँ श्रुतिने स्वयं ही विद्या और अविद्याकी परिभाषा कर दी है, अतः अर्थान्तरकी कल्पना अनावश्यक है। जो इन विद्या और अविद्या नामसे कहे जानेवाले क्षर और अक्षर दोनोंपर शासन करते हैं, दोनोंके स्वामी हैं, दोनों जिनकी शक्तियाँ अथवा प्रकृतियाँ हैं, वे परमेश्वर इन दोनोंसे अन्य—सर्वथा विलक्षण हैं। श्रीगीताजीमें भी कहा है—‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः’ इत्यादि (१५।१७) ॥ १ ॥
यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः। ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्विभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥
यः=जो; एकः=अकेला ही; योनिम् योनिम्=प्रत्येक योनिपर; विश्वानि रूपाणि=समस्त रूपोंपर; च=और; सर्वाः योनीः=समस्त कारणोंपर; अधितिष्ठति=आधिपत्य रखता है; यः=जो; अग्रे=पहले; प्रसूतम्=उत्पन्न हुए; कपिलम् ऋषिम्=कपिल ऋषि (हिरण्यगर्भ) को; ज्ञानैः=सब प्रकारके ज्ञानोंसे; विभर्ति=पुष्ट करता है; च=तथा; (जिसने) तम्=उस कपिल (ब्रह्म) को; जायमानम्=(सबसे पहले) उत्पन्न होते; पश्येत्=देखा था (वे ही परमात्मा हैं) ॥ २ ॥
व्याख्या—इस जगत्में देव, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि जितनी भी योनियाँ हैं तथा प्रत्येक योनिमें जो भिन्न-भिन्न रूप—आकृतियाँ हैं, उन सबके और उनके कारणरूप पञ्च सूक्ष्म महाभूत आदि समस्त तत्त्वोंके जो
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
एकमात्र अधिपति हैं, अर्थात् वे सब-के-सब जिनके अधीन हैं, जो सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल ऋषिको* अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माको प्रत्येक सर्गके आदिमें सब प्रकारके ज्ञानोंसे पुष्ट करते हैं—सब प्रकारके ज्ञानोंसे सम्पन्न करके उन्नत करते हैं तथा जिन्होंने सबसे पहले उत्पन्न होते हुए उन हिरण्यगर्भको देखा था, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वाधार सबके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं ॥ २ ॥
एकैकं जालं बहुधा विकूर्व- त्रस्मिन् क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सूष्टा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥
एषः=यह; देवः=परमदेव (परमेश्वर); अस्मिन् क्षेत्रे=इस जगत्-क्षेत्रमें; (सृष्टिके समय) एकैकम्=एक-एक; जालम्=जालको (बुद्धि आदि और आकाशादि तत्त्वोंको); बहुधा=बहुत प्रकारसे; विकूर्वन्=विभक्त करके; (उसका) संहरति=(प्रलयकालमें) संहार कर देता है; महात्मा=(वह) महामना; ईशः=ईश्वर; भूयः=पुनः (सृष्टिकालमें); तथा=पहलेकी भाँति; पतयः सूष्टा=समस्त लोकपालोंकी रचना करके; सर्वाधिपत्यम् कुरुते=(स्वयं) सबपर आधिपत्य करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परमदेव परमेश्वर इस जगत्-रूप क्षेत्रमें सृष्टिके समय एक-एक जालको अर्थात् बुद्धि आदि और आकाश आदि अपनी प्रकृतियोंको बहुत प्रकारसे विभक्त करके—प्रत्येक प्रकृतिको भिन्न-भिन्न रूप, नाम और शक्तियोंसे युक्त करके उनका विस्तार करते हैं और स्वयं ही प्रलयकालमें उन सबका संहार कर लेते हैं। वे महामना परमेश्वर पुनः सृष्टिकालमें पहलेकी भाँति ही समस्त लोकोंकी और उनके अधिपतियोंकी रचना करके स्वयं उन सबके अधिष्ठाता बनकर उन सबपर शासन करते हैं। उनकी
- कुछ विद्वानोंने 'कपिल' शब्दको सांख्यशास्त्रके आदि वक्ता एवं प्रवर्तक भगवान् कपिलमुनिका वाचक माना है और इस प्रकार उनके द्वारा उपदिष्ट मतकी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता सिद्ध की है।
अध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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लीला अतर्क्य है, तर्कसे उसका रहस्य समझमें नहीं आ सकता। उनके सेवक ही उनकी लीलाके रहस्यको कुछ समझते हैं ॥ ३ ॥
सर्वां दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक् प्रकाशयन् भ्राजते यद्वनड्वान् । एवं स देवो भगवान् वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४ ॥
यत् उ=जिस प्रकार; अनड्वान्=सूर्य; (अकेला ही) सर्वाः=समस्त; दिशः=दिशाओंको; ऊर्ध्वम् अधः=ऊपर-नीचे; च=और; तिर्यक्=इधर-उधर—सब ओरसे; प्रकाशयन्=प्रकाशित करता हुआ; भ्राजते=देदीप्यमान होता है; एवम्=उसी प्रकार; सः=वह; भगवान्=भगवान्; वरेण्यः देवः=स्वामी बननेके योग्य (सर्वश्रेष्ठ) परमदेव परमेश्वर; एकः=अकेला ही; योनिस्वभावान् अधितिष्ठति=समस्त कारणरूप अपनी शक्तियोंपर आधिपत्य करता है ॥ ४ ॥
व्याख्या—जिस प्रकार यह सूर्य समस्त दिशाओंको ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर—सब ओरसे प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार वे भगवान्—सर्वविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सबके द्वारा भजनेयोग्य परमदेव परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप अपनी भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता होकर उन सबका संचालन करते हैं, सबको अपना-अपना कार्य करनेकी सामर्थ्य देकर यथायोग्य कार्यमें प्रवृत्त करते हैं ॥ ४ ॥
सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातका इस मन्त्रमें स्पष्टीकरण किया जाता है—
यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान् परिणामयेद् यः । सर्वमेतद् विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान् विनियोजयेद् यः ॥ ५ ॥
यत्=जो; विश्वयोनिः=सबका परम कारण है; च=और; स्वभावम्=समस्त
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको; पचति=(अपने संकल्परूप तपसे) पकाता है; च=तथा; य=:जो; सर्वान्=समस्त; पाच्यान्=पकाये जानेवाले पदार्थोंको; परिणामयेत्=नाना रूपोंमें परिवर्तित करता है; (और) य=:जो; एकः=अकेला ही; सर्वान्=समस्त; गुणान् विनियोजयेत्=गुणोंका जीवोंके साथ यथायोग्य संयोग कराता है; च=तथा; एतत्=इस; सर्वम्=समस्त; विश्वम् अधितिष्ठति=विश्वका शासन करता है (वह परमात्मा है) ॥ ५ ॥
व्याख्या —जो इस सम्पूर्ण विश्वके परम कारण हैं, अर्थात् जिनका और कोई कारण नहीं है, जगत्के कारणरूपसे कहे जानेवाले समस्त तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको जो अपने संकल्परूप तपसे पकाते हैं—अर्थात् उन आकाशादि तत्त्वोंकी जो भिन्न-भिन्न शक्तियाँ प्रलयकालमें लुप्त हो गयी थीं, उन्हें अपने संकल्पद्वारा पुनः प्रकट करते हैं और उन प्रकट की हुई शक्तियोंका नाना रूपोंमें परिवर्तन कर इस विचित्र जगत्की रचना करते हैं तथा सत्त्व आदि तीनों गुणोंका तथा उनसे उत्पन्न हुए पदार्थोंका जीवोंके साथ उनके कर्मानुसार यथायोग्य सम्बन्ध स्थापित करते हैं—इस प्रकार जो अकेले ही इस सम्पूर्ण जगत्की सारी व्यवस्था करके इसपर शासन करते हैं, वे ही पूर्वमन्त्रमें कहे हुए सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ ५ ॥
तद् वेदगुह्योपनिषत्सु गृहं तद् ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् । ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदु- स्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥
तत्=वह; वेदगुह्योपनिषत्सु=वेदोंके रहस्यभूत उपनिषदोंमें; गृहम्=छिपा हुआ है; ब्रह्मयोनिम्=वेदोंके प्राकट्य-स्थान; तत्=उस परमात्माको; ब्रह्मा=ब्रह्मा; वेदते=जानता है; ये=जो; पूर्वदेवाः=पुरातन देवता; च=और; ऋषयः=ऋषिलोग; तत्=उसको; विदुः=जानते थे; ते=वे; वै=अवश्य ही; तन्मयाः=(उसमें) तन्मय होकर; अमृताः=अमृतरूप; बभूवुः=हो गये ॥ ६ ॥
अध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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व्याख्या —वे परब्रह्म परमात्मा वेदोंकी रहस्यविद्यारूप उपनिषदोंमें छिपे हुए हैं अर्थात् उनके स्वरूपका वर्णन उपनिषदोंमें गुस्रूपसे किया गया है। वेद निकले भी उन्हींसे हैं—उन्हींके निःश्वासरूप हैं—‘यस्य निःश्वसितं वेदाः ’। इस प्रकार वेदोंमें छिपे हुए और वेदोंके प्राकट्य-स्थान उन परमात्माको ब्रह्माजी जानते हैं। उनके सिवा और भी जिन पूर्ववर्ती देवताओं और ऋषियोंने उनको जाना था, वे सब-के-सब उन्हींमें तन्मय होकर आनन्दस्वरूप हो गये। अतः मनुष्यको चाहिये कि उन सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सबके अधीश्वर परमात्माको उक्त प्रकारसे मानकर उन्हें जानने और पानेके लिये तत्पर हो जाय ॥ ६ ॥
सम्बन्ध — पाँचवें मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि परमेश्वर सब जीवोंका उनके कर्मानुसार गुणोंके साथ संयोग कराते हैं; अतः जीवात्माका स्वरूप और नाना योनियोंमें विचरनेका कारण आदि बतानेके लिये अलग प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता। स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्ता प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥
यः गुणान्वयः =जो गुणोंसे बँधा हुआ है; सः =वह; फलकर्मकर्ता =फलके उद्देश्यसे कर्म करनेवाला जीवात्मा; एव =ही; तस्य =उस; कृतस्य =अपने किये हुए कर्मके फलका; उपभोक्ता =उपभोग करनेवाला; विश्वरूपः =विभिन्न रूपोंमें प्रकट होनेवाला; त्रिगुणः =तीन गुणोंसे युक्त; च =और त्रिवर्त्ता =कर्मानुसार तीन मार्गोंसे गमन करनेवाला है; सः =वह; प्राणाधिपः =प्राणोंका अधिपति (जीवात्मा); स्वकर्मभिः =अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर; संचरति =नाना योनियोंमें विचरता है ॥ ७ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें प्रकरण आरम्भ करते ही जीवात्माके लिये ‘गुणान्वयः ’ विशेषण देकर यह भाव दिखाया गया है कि जो जीव गुणोंसे सम्बद्ध अर्थात् प्रकृतिमें स्थित है, वही इस जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें घूमता
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
ही है (गीता १३।२१); जो गुणातीत हो गया है, वह नहीं घूमता। मन्त्रका सारांश यह है कि जो जीवात्मा सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे बँधा हुआ है (गीता १४।५), वह नाना प्रकारके कर्मफलरूप भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नाना प्रकारके कर्म करता है और अपने किये हुए उन कर्मोंका फल भोगनेके लिये नाना योनियोंमें जन्म लेकर विभिन्न रूपोंमें प्रकट होता है और जहाँ भी जाता है, तीनों गुणोंसे युक्त रहता है। मृत्युके अनन्तर उसकी कर्मानुसार तीन गतियाँ होती हैं अर्थात् शरीर छोड़नेपर वह तीन मार्गोंसे जाता है। वे तीन मार्ग हैं—देवयान, पितृयान और तीसरा निरन्तर जन्म-मृत्युके चक्रमें घूमना।* वह प्राणोंका अधिपति जीवात्मा जबतक मुक्त नहीं हो जाता, तबतक अपने किये हुए कर्मोंसे प्रेरित होकर नाना लोकोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारकी योनियोंको ग्रहण करके इस संसारचक्रमें घूमता रहता है ॥७॥
सम्बन्ध—जीवात्माका स्वरूप कैसा है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
अङ्गुष्ठमात्रो
रवितुल्यरूपः
संकल्पाहङ्कारसमन्वितो
यः।
बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन
चैव
आराग्रमात्रो
ह्यपरोऽपि
दृष्टः ॥८॥
यः=जो; अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; रवितुल्यरूपः=सूर्यके समान प्रकाशस्वरूप; (तथा) संकल्पाहङ्कारसमन्वितः=संकल्प और अहङ्कारसे युक्त है; बुद्धेः=बुद्धिके; गुणेन=गुणके कारण; च=और; आत्मगुणेन=अपने गुणके कारण; एव=ही; आराग्रमात्रः=सूजेकी नोकके जैसे सूक्ष्म आकारवाला है; अपरः=ऐसा
- छान्दोग्य-उपनिषद्में ५।१०।२ से ८ तक और बृहदारण्यक० ६।२।१५-१६ में इन तीन मार्गोंका वर्णन आया है। देवयान-मार्गसे जानेवाले ब्रह्मलोकतक जाकर वहाँसे लौटते नहीं, ब्रह्माके साथ ही मुक्त हो जाते हैं; पितृयानसे जानेवाले स्वर्गमें जाकर चिरकालतक वहाँके दिव्य सुखोंका उपभोग करते हैं और पुण्य क्षीण हो जानेपर पुनः मृत्युलोकमें ढकेल दिये जाते हैं; और तीसरे मार्गसे जानेवाले कीट-पतङ्गादि शुद्ध योनियोंमें भटकते रहते हैं।
अध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४९७
अपर (अर्थात् परमात्मासे भिन्न जीवात्मा); अपि=भी; हि=निःसंदेह; दृष्टः= (ज्ञानियोंद्वारा) देखा गया है ॥ ८ ॥
व्याख्या —मनुष्यका हृदय अँगूठेके नापका माना गया है और हृदयमें ही जीवात्माका निवास है। इसलिये उसे अङ्गुष्ठमात्र—अँगूठेके नापका कहा जाता है। उसका वास्तविक स्वरूप सूर्यकी भाँति प्रकाशमय (विज्ञानमय) है। उसे अज्ञानरूपी अन्धकार छूतक नहीं गया है। वह संकल्प और अहंकार—इन दोनोंसे युक्त हो रहा है, अतः संकल्परूप बुद्धिके गुणसे अर्थात् अन्तःकरण और इन्द्रियोंके धर्मोंसे तथा अहंकाररूप अपने गुणसे अर्थात् अहंता-ममता आदिसे सम्बद्ध होनेके कारण सृजकी नोकके समान सूक्ष्म आकारवाला है और परमात्मासे भिन्न है। जीवके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंने गुणोंसे युक्त हुए जीवात्माका स्वरूप ऐसा ही देखा है।* तात्पर्य यह कि आत्माका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त सूक्ष्म है; सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म जड़ पदार्थ उसकी तुलनामें स्थूल ही ठहरता है। उसकी सूक्ष्मता किसी भी जड़ पदार्थके परिमाणसे नहीं मापी जा सकती। केवल उसका लक्ष्य करानेके लिये उसे सम्बद्ध वस्तुके आकारका बताया जाता है। हृदय-देशमें स्थित होनेके कारण उसे अङ्गुष्ठपरिमाण कहा जाता है और बुद्धिगुण तथा आत्मगुणके सम्बन्धसे उसे सृजकी नोकके आकारका बताया जाता है। बुद्धि आदिको सूर्यकी नोकके समान कहा गया है, इसीसे जीवात्माको यहाँ सृजकी नोकके सदृश बताया गया है ॥ ८ ॥
सम्बन्ध —पूर्वमन्त्रमें जो जीवात्माका स्वरूप सृजकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है, उसे पुनः स्पष्ट करते हैं—
वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९ ॥
- गीतामें भी कहा है कि एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले, शरीरमें स्थित रहनेवाले अथवा विषयोंको भोगनेवाले इस गुणान्वित जीवात्माको मूर्ख नहीं जानते, ज्ञानरूप नेत्रोंवाले ज्ञानी जानते हैं (१५।१०)।
४९८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याध ५ ]
वालाग्रशतभागस्य=बालकी नोकके सौवें भागके; च=पुनः; शतधा=सौ भागोंमें; कल्पितस्य=कल्पना किये जानेपर; भागः=जो एक भाग होता है; सः=वही (उसोके बराबर); जीवः=जीवका स्वरूप; विज्ञेयः=समझना चाहिये; च=और; सः=वह; आनन्त्याय=असीम भाववाला होनेमें; कल्पते=समर्थ है ॥९॥
व्याख्या —पूर्वमन्त्रमें जीवात्माका स्वरूप सूजेकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है; उसे समझनेमें भ्रम हो सकता है, अतः उसे भलीभाँति समझानेके लिये पुनः इस प्रकार कहते हैं। मान लीजिये, एक बालकी नोकके हम सौ टुकड़े कर लें; फिर उनमेंसे एक टुकड़ेके पुनः सौ टुकड़े कर लें। उनमेंसे एक टुकड़ा जितना सूक्ष्म हो सकता है, अर्थात् बालकी नोकके दस हजार भाग करनेपर उनमेंसे एक भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, उसके समान जीवात्माका स्वरूप समझना चाहिये। यह कहना भी केवल उसकी सूक्ष्मताका लक्ष्य करानेके लिये ही है। वास्तवमें चेतन और सूक्ष्म वस्तुका स्वरूप जड़ और स्थूल वस्तुकी उपमासे नहीं समझाया जा सकता; क्योंकि बालकी नोकके दस हजार भागोंमेंसे एक भाग भी आकाशमें जितने देशको रोकता है, उतना भी जीवात्मा नहीं रोकता। चेतन और सूक्ष्म वस्तुका जड़ और स्थूल देशके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; वह सूक्ष्म होनेपर भी स्थूल वस्तुमें सर्वत्र व्याप्त रह सकता है। इसी भावको समझानेके लिये अन्तमें कहा गया है कि वह इतना सूक्ष्म होनेपर भी अनन्त भावसे युक्त होनेमें अर्थात् असीम होनेमें समर्थ है। भाव यह कि वह जड़ जगत्में सर्वत्र व्याप्त है। केवल बुद्धिके गुण संकल्पसे और अपने गुणरूप अहंकारसे युक्त होनेके कारण ही एकदेशीय बन रहा है ॥९॥
नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः।
यद् यच्छरीरमादते तेन तेन स युज्यते ॥१०॥
एषः=यह जीवात्मा; न=न; एव=तो; स्त्री=स्त्री है; न=न; पुमान्=पुरुष है; च=और; न=न; अयम्=यह; नपुंसकः=एव=नपुंसक ही है; सः=वह; यत् यत्=
अध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४९९
जिस-जिस; शरीरम्-शरीरको; आदत्ते=ग्रहण करता है; तेन तेन=उस-उससे; युज्यते=सम्बद्ध हो जाता है ॥ १० ॥
व्याख्या —जीवात्मा वास्तवमें न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है। यह जब जिस शरीरको ग्रहण करता है, उस समय उससे संयुक्त होकर वैसा ही बन जाता है। जो जीवात्मा आज स्त्री है, वही दूसरे जन्ममें पुरुष हो सकता है; जो पुरुष है, वह स्त्री हो सकता है। भाव यह कि ये स्त्री, पुरुष और नपुंसक आदि भेद शरीरको लेकर हैं; जीवात्मा सर्वभेदशून्य है, सारी उपाधियोंसे रहित है ॥ १० ॥
संकल्पनस्पर्शनदृष्टिभोहै-
ग्रीसाम्बुवृष्ट्या
चात्मविवृद्धिजन्म ।
कर्मानुगान्यनुक्रमेण
देही
स्थानेषु
रूपाण्यभिस्सम्प्रपद्यते ॥ ११ ॥
संकल्पनस्पर्शनदृष्टिभोहै =संकल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोहसे; च =तथा; ग्रीसाम्बुवृष्ट्या =भोजन, जलपान और वर्षाके द्वारा; चात्मविवृद्धिजन्म = (प्राणियोंके) सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं; देही =यह जीवात्मा; स्थानेषु =भिन्न-भिन्न लोकोंमें; कर्मानुगानि =कर्मानुसार मिलनेवाले; रूपाणि =भिन्न-भिन्न शरीरोंको; अनुक्रमेण =अनुक्रमसे; अभिस्सम्प्रपद्यते =बार-बार प्राप्त होता रहता है ॥ ११ ॥
व्याख्या —संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टि— इन सबसे सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं। इसका एक भाव तो यह है कि स्त्री-पुरुषके परस्पर मोहपूर्वक संकल्प, स्पर्श और दृष्टिपातके द्वारा सहवास होनेपर जीवात्मा गर्भमें आता है; फिर माताके भोजन और जलपानसे बने हुए उसके द्वारा उसकी वृद्धि होकर जन्म होता है। दूसरा भाव यह है कि भिन्न-भिन्न योनियोंमें जीवोंकी उत्पत्ति और वृद्धि भिन्न-भिन्न प्रकारसे होती है। किसी योनिमें तो संकल्पमात्रसे ही जीवोंका पोषण होता रहता है, जैसे कछुएके अंडोंका; किसी योनिमें आसक्तिपूर्वक स्पर्शसे होता है, जैसे पक्षियोंके अंडोंका;
५००
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
किसी योनिमें केवल आसक्तिपूर्वक दर्शनमात्रसे ही होता है, जैसे मछली आदिका; किसी योनिमें अन्नभक्षणसे और जलपानसे होता है, जैसे मनुष्य-पशु आदिका और किसी योनिमें वृष्टिमात्रसे ही हो जाता है, जैसे वृक्ष-लता आदिका। इस प्रकार नाना प्रकारसे सजीव शरीरोंका पालन-पोषण, तुष्टि-पुष्टिरूप वृद्धि और जन्म होते हैं। जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उनका फल भोगनेके लिये इसी प्रकार विभिन्न लोकोंमें गमन करता हुआ एकके बाद एकके क्रमसे नाना शरीरोंको बार-बार धारण करता रहता है ॥ ११ ॥
सम्बन्ध— इसका बार-बार नाना योनियोंमें आवागमन क्यों होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति । क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥ १२ ॥
देही=जीवात्मा; क्रियागुणैः=अपने कर्मोंके (संस्काररूप) गुणोंसे; च=तथा; आत्मगुणैः=शरीरके गुणोंसे (युक्त होनेके कारण); स्वगुणैः=अहंता, ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर; स्थूलानि=स्थूल; च=और; सूक्ष्माणि=सूक्ष्म; बहूनि एव=बहुत-से; रूपाणि=रूपों (आकृतियों, शरीरों)को; वृणोति=स्वीकार करता है; तेषाम्=उनके; संयोगहेतुः=संयोगका कारण; अपरः=दूसरा; अपि=भी; दृष्टः=देखा गया है ॥ १२ ॥
व्याख्या— जीवात्मा अपने किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे और बुद्धि, मन, इन्द्रिय तथा पञ्चभूत—इनके समुदायरूप शरीरके धर्मोंसे युक्त होनेके कारण अहंता-ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर अनेकानेक शरीर धारण करता है। अर्थात् शरीरके धर्मोंमें अहंता-ममता करके तद्रूप हो जानेके कारण नाना प्रकारके स्थूल और सूक्ष्म रूपोंको स्वीकार करता है—अपने कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है। परंतु इस प्रकार जन्म लेनेमें यह स्वतन्त्र नहीं है,
अध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५०१
इससे संकल्प और कर्मिक अनुसार उन-उन योनियोंसे इसका सम्बन्ध जोड़नेवाला कोई दूसरा ही है। वे हैं पूर्वोक्त परमेश्वर, जिन्हें तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंने देखा है। वे इस रहस्यको भलीभाँति जानते हैं। यहाँ कर्मिक संस्कारोंका नाम क्रिया-गुण है, समस्त तत्त्वोंके समुदायरूप शरीरको देखना, सुनना, समझना आदि शक्तियोंका नाम आत्मगुण है और इनके सम्बन्धसे जीवात्मामें जो अहंता, ममता, आसक्ति आदि आ जाते हैं, उनका नाम स्वगुण है॥ १२॥
सम्बन्ध— अनादिकालसे चले आते हुए इस जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटनेका क्या उपाय है, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ १३॥
कलिलस्य=कलिल (दुर्गम संसार) के; मध्ये=भीतर व्यास; अनाद्यनन्तम्=आदि-अन्तसे रहित; विश्वस्य स्रष्टारम्=समस्त जगत्की रचना करनेवाले; अनेकरूपम्=अनेकरूपधारी; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए; एकम्=एक (अद्वितीय); देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=सर्वथा मुक्त हो जाता है॥ १३॥
व्याख्या— पूर्वमन्त्रमें जिनको इस जीवात्माका नाना योनियोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाला बताया गया है, जो अन्तर्धामीरूपसे मनुष्यके हृदयरूप गुहामें स्थित तथा निराकाररूपसे इस समस्त जगत्में व्याप्त हैं, जिनका न तो आदि है और न अन्त ही है, अर्थात् जो उत्पत्ति, विनाश और वृद्धि-क्षय आदि सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य—सदा एकरस रहनेवाले हैं, तथापि जो समस्त जगत्की रचना करके विविध रूपोंमें प्रकट होते हैं और जिन्होंने इस समस्त जगत्को सब ओरसे घेर रखा है, उन एकमात्र सर्वाधार,
५०२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
सर्वशक्तिमान्, सबका शासन करनेवाले, सर्वेश्वर परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानकर यह जीवात्मा सदाके लिये समस्त बन्धनोंसे सर्वथा छूट जाता है॥१३॥
सम्बन्ध— अब अध्यायके उपसंहारमें ऊपर कही हुई बातको पुनः स्पष्ट करते हुए परमात्माकी प्रापिका उपाय बताया जाता है—
भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम्। कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम्॥१४॥
भावग्राह्यम्=श्रद्धा और भक्तिके भावसे प्राप्त होने योग्य; अनीडाख्यम्=आश्रयरहित कहे जानेवाले; (तथा) भावाभावकरम्=जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले; शिवम्=कल्याणस्वरूप; (तथा) कलासर्गकरम्=सोलह कलाओंकी रचना करनेवाले; देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ये=जो साधक; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; तनुम्=शरीरको; (सदाके लिये) जहुः=त्याग देते हैं—जन्म-मृत्युके चक्करसे छूट जाते हैं॥१४॥
व्याख्या— वे परब्रह्म परमेश्वर आश्रयरहित अर्थात् शरीररहित हैं; यह प्रसिद्ध है; तथा वे जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले तथा (प्रश्नोपनिषद् ६।६।४ में बताया हुई) सोलह कलाओंको भी उत्पन्न करनेवाले हैं। ऐसा होनेपर भी वे कल्याणस्वरूप आनन्दमय परमेश्वर श्रद्धा, भक्ति और प्रेमभावसे पकड़े जा सकते हैं; जो मनुष्य उन परमदेव परमेश्वरको जान लेते हैं, वे शरीरसे अपना सम्बन्ध सदाके लिये छोड़ देते हैं अर्थात् इस संसार-चक्रसे सदाके लिये छूट जाते हैं।
इस रहस्यको समझकर मनुष्यको जितना शीघ्र हो सके, उन परम सुहृद, परम दयालु, परम प्रेमी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वेश्वर परमात्माको जानने और पानेके लिये व्याकुल हो श्रद्धा और भक्तिभावसे उनकी आराधनामें लग जाना चाहिये॥१४॥
॥ पञ्चम अध्याय समाप्त॥५॥
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अध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५०३
षष्ठ अध्याय
स्वभावमेके | कवयो | वदन्ति | ---|---|---|--- | कालं | तथान्ये | परिमुह्यमानाः । देवस्यैष | महिमा | तु | लोके | येनेदं | भ्राम्यते | ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥
एके=कितने ही; कवयः=बुद्धिमान् लोग; स्वभावम्=स्वभावको; वदन्ति=जगत्का कारण बताते हैं; तथा=उसी प्रकार; अन्ये=कुछ दूसरे लोग; कालम्=कालको जगत्का कारण बतलाते हैं; [ एते ] परिमुह्यमानाः [ सन्ति ]=(वास्तवमें) ये लोग मोहग्रस्त हैं (अतः वास्तविक कारणको नहीं जानते); तु=वास्तवमें तो; एषः=यह; देवस्य=परमदेव परमेश्वरकी; लोके=समस्त जगत्में फैली हुई; महिमा=महिमा है; येन=जिसके द्वारा; इदम्=यह; ब्रह्मचक्रम्=ब्रह्मचक्र; भ्राम्यते=घुमाया जाता है ॥ १ ॥
व्याख्या —कितने ही बुद्धिमान् लोग तो कहते हैं कि इस जगत्का कारण स्वभाव है। अर्थात् पदार्थोंमें जो स्वाभाविक शक्ति हैं—जैसे अग्निमें प्रकाशन-शक्ति और दाह-शक्ति वही इस जगत्का कारण है। कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि काल ही जगत्का कारण है; क्योंकि समयपर ही वस्तुगत शक्तिका प्राकट्य होता है, जैसे वृक्षमें फल आदि उत्पन्न करनेकी शक्ति समयपर ही प्रकट होती है। इसी प्रकार स्त्रियोंमें गर्भाधान ऋतुकालमें ही होता है, असमयमें नहीं होता—यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। परंतु अपनेको पण्डित समझनेवाले ये वैज्ञानिक मोहमें पड़े हुए हैं, अतः ये इस जगत्के वास्तविक कारणको नहीं जानते। वास्तवमें तो यह परमदेव सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ही महिमा है, जगत्की विचित्र रचनाको देखने और उसपर विचार करनेपर उन्हींका महत्त्व प्रकट होता है। वे स्वभाव और काल आदि समस्त कारणोंके अधिपति हैं और उन्हींके द्वारा यह संसार-चक्र घुमाया जाता है। इस रहस्यको समझकर इस चक्रसे छुटकारा पानेके लिये उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। संसार-चक्रकी व्याख्या १।४ में की गयी है ॥ १ ॥
५०४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ऋः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथ्व्यसेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २ ॥
येन=जिस परमेश्वरसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत्; नित्यम्=सदा; आवृतम्=व्याप्त है; यः=जो; ऋः=ज्ञानस्वरूप परमेश्वर; हि=निश्चय ही; कालकालः=कालका भी महाकाल; गुणी=सर्वगुणसम्पन्न; (और) सर्ववित्=सबको जाननेवाला है; तेन=उससे; ह=ही; ईशितम्=शासित हुआ; कर्म=यह जगतरूप कर्म; विवर्तते=विभिन्न प्रकारसे यथायोग्य चल रहा है; (और ये) पृथ्व्यसेजोऽनिलखानि=पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश भी (उसीके द्वारा शासित होते हैं); [ इति ]=इस प्रकार; चिन्त्यम्=चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥
व्याख्या—जिन जगत्रियन्ता जगदाधार परमेश्वरसे यह सम्पूर्ण जगत् सदा—सभी अवस्थाओंमें सर्वथा व्याप्त है, जो कालके भी महाकाल हैं— अर्थात् जो कालकी सीमासे परे हैं, जो ज्ञानस्वरूप चिन्मय परमात्मा सुहृदता आदि समस्त दिव्य गुणोंसे नित्य सम्पन्न हैं, समस्त गुण जिसके स्वरूपभूत और चिन्मय हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डोंको भली प्रकारसे जानते हैं, उन्हींका चलाया हुआ यह जगत्-चक्र नियमपूर्वक चल रहा है। वे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंपर शासन करते हुए इनको अपना-अपना कार्य करनेकी शक्ति देकर इनसे कार्य करवाते हैं। उनकी शक्तिके बिना ये कुछ भी नहीं कर सकते, यह बात केनोपनिषद्के तीसरे खण्डमें यक्षके आख्यानद्वारा भलीभाँति समझायी गयी है। इस रहस्यको समझकर मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका उपर्युक्त भावसे चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥
तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूय- स्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम् । एकेन द्वाभ्यां त्रिभिर्दृष्टिभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूरुमैः ॥ ३ ॥