ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 514, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
आत्मस्थम्=हृदयस्थित परमेश्वरको; ये=जो; धीराः=धीर पुरुष; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वतम्=सदा रहनेवाला; सुखम्=परमानन्द प्राप्त होता है; इतरेषाम्=दूसरोंको; न=नहीं ॥ १२ ॥
व्याख्या —जो विशुद्ध चेतनस्वरूप परमेश्वरके ही अंश होनेके कारण वास्तवमें निष्क्रिय हैं, ऐसे अनन्त जीवात्माओंके जो अकेले ही नियन्ता—कर्मफल देनेवाले हैं, जो एक प्रकृतिरूप बीजको बहुत प्रकारसे रचना करके इस विचित्र जगत्के रूपमें बनाते हैं उन हृदयस्थित सर्वशक्तिमान् परम सुहृद् परमेश्वरको जो धीर पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, निरन्तर उन्हींमें तन्मय हुए रहते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला परम आनन्द प्राप्त होता है; दूसरोंको अर्थात् जो इस प्रकार उनका निरन्तर चिन्तन नहीं करते उनको वह परमानन्द नहीं मिलता—वे उससे वञ्चित रह जाते हैं ॥ १२ ॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्र्वेतानाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत् कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १३ ॥
यः=जो; एकः=एक; नित्यः=नित्य; चेतनः=चेतन (परमात्मा); बहूनाम्=बहुत-से; नित्यानाम्=नित्य; चेतनानाम्=चेतन आत्माओंके; कामान् विदधाति=कर्मफलभोगोंका विधान करता है; तत्=उस; सांख्ययोगाधिगम्यम्=ज्ञानयोगसे और कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य; कारणम्=सबके कारणरूप; देवम्=परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥
व्याख्या —जो नित्य चेतन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा अकेले ही बहुत-से नित्य चेतन जीवात्माओंके कर्मफलभोगोंका विधान करते हैं, जिन्होंने इस विचित्र जगत्की रचना करके समस्त जीवसमुदायके लिये उनके कर्मानुसार फलभोगकी व्यवस्था कर रखी है, उनको प्राप्त करनेके दो साधन हैं—एक ज्ञानयोग, दूसरा कर्मयोग; भक्ति दोनोंमें ही अनुस्यूत है, इस कारण उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। उन ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये