सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 513

अध्याय ६ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

५११

कारण संसारी जीव उन्हें देख नहीं पाते, वे सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा हमलोगोंको सबके परम आश्रयभूत अपने परब्रह्मस्वरूपमें स्थापित करें ॥ १० ॥

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।

कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ११ ॥

एकः=(वह) एक; देवः=देव ही; सर्वभूतेषु=सब प्राणियोंमें; गूढः=छिपा हुआ; सर्वव्यापी=सर्वव्यापी; (और) सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है; कर्माध्यक्षः=(वही) सबके कर्मोंका अधिष्ठाता; सर्वभूताधिवासः=सम्पूर्ण भूतोंका निवासस्थान; साक्षी=सबका साक्षी; चेता=चेतनस्वरूप [और सबको चेतना प्रदान करनेवाला]; केवलः=सर्वथा विशुद्ध; (और) निर्गुणः=च=गुणातीत भी है ॥ ११ ॥

व्याख्या—वे एक ही परमदेव परमेश्वर समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुहामें छिपे हुए हैं, वे सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमात्मा हैं। वे ही सबके कर्मोंके अधिष्ठाता—उनको कर्मानुसार फल देनेवाले और समस्त प्राणियोंके निवासस्थान—आश्रय हैं; तथा वे ही सबके साक्षी—शुभाशुभ कर्मको देखनेवाले, परम चेतनस्वरूप तथा सबको चेतना प्रदान करनेवाले, सर्वथा विशुद्ध अर्थात् निर्लैप और प्रकृतिके गुणोंसे अतीत भी हैं ॥ ११ ॥

एको वशी निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥

यः=जो; एकः=अकेला ही; बहूनाम्=बहुत-से; निष्क्रियाणाम्=वास्तवमें अक्रिय जीवोंका; वशी=शासक है; (और) एकम्=एक; बीजम्=प्रकृतिरूप बीजको; बहुधा=अनेक रूपोंमें परिणत; करोति=कर देता है; तम्=उस;