ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 512, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
न=नहीं; अस्ति=है; ईशिता=उसका शासक; च=भी; न=नहीं है; च=और; तस्य=उसका; लिङ्गम्=चिह्नविशेष भी; न एव=नहीं है; सः=वह; कारणम्=सबका परम कारण; (तथा) करणाधिपाधिपः=समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है; कश्चित्=कोई भी; न=न; च=तो; अस्य=इसका; जनिता=जनक है; च=और; न=न; अधिपः=स्वामी ही है ॥ ९ ॥
व्याख्या —जगत्में कोई भी उन परमात्माका स्वामी नहीं है। सभी उनके दास और सेवक हैं। उनका शासक—उनपर आज्ञा चलानेवाला भी कोई नहीं है। सब उन्हींकी आज्ञा और प्रेरणाका अनुसरण करते और उनके नियन्त्रणमें रहते हैं। उनका कोई चिह्नविशेष भी नहीं है; क्योंकि वे सर्वत्र परिपूर्ण, निराकार हैं तथा वे सबके परम कारण—कारणोंके भी कारण और समस्त अन्तःकरण और इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके भी अधिपति—शासक हैं। इन परब्रह्म परमात्माका न तो कोई जनक—अर्थात् इन्हें उत्पन्न करनेवाला पिता है और न कोई इनका अधिपति ही है। ये अजन्मा, सनातन, सर्वथा स्वतन्त्र और सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ९ ॥
यस्तनुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतो देव एकः स्वमावृणोत्। स नो दधाद्ब्रह्माप्ययम् ॥ १० ॥
तन्तुभिः=तन्तुओंद्वारा; तन्तुनाभः इव=मकड़ीकी भाँति; यः एकः देवः=जिस एक देव (परमात्मा) ने; प्रधानजैः=अपनी स्वरूपभूत मुख्य शक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योद्धार; स्वभावतः=स्वभावसे ही; स्वम्=अपनेको; आवृणोत्=आच्छादित कर रखा है; सः=वह परमेश्वर; नः=हमलोगोंको; ब्रह्माप्ययम्=अपने परब्रह्म रूपमें आश्रय; दधात्=दे ॥ १० ॥
व्याख्या —जिस प्रकार मकड़ी अपनेसे प्रकट किये हुए तन्तुजालसे स्वयं आच्छादित हो जाती है—उसमें अपनेको छिपा लेती है, उसी प्रकार जिन एक देव परमपुरुष परमेश्वरने अपनी स्वरूपभूत मुख्य एवं दिव्य अचिन्त्यशक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योद्धार स्वभावसे ही अपनेको आच्छादित कर रखा है, जिसके