ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 515, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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जानेयोग्य सबके कारणरूप परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जो उन्हें जान लेता है और प्राप्त कर लेता है, वह कभी किसी भी कारणसे जन्म-मरणके बन्धनमें नहीं पड़ता। अतः मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको प्राप्त करनेके लिये अपनी योग्यता और रुचिके अनुसार ज्ञानयोग या कर्मयोग—किसी एक साधनमें तत्परतापूर्वक लग जाना चाहिये ॥ १३ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १४ ॥*
तत्र=वहाँ; न=न तो; सूर्यः=सूर्य; भाति=प्रकाश फैला सकता है; न=न; चन्द्रतारकम्=चन्द्रमा और तारागणका समुदाय ही; (और) न=न; इमाः=ये; विद्युतः=बिजलियाँ ही; भान्ति=वहाँ प्रकाशित हो सकती हैं; अयम्=(फिर) यह; अग्निः=लौकिक अग्नि तो; कुतः=कैसे प्रकाशित हो सकता है; (क्योंकि) तम् भान्तम् एव=उसके प्रकाशित होनेपर ही (उसोके प्रकाशसे); सर्वम्=बतलाये हुए सूर्य आदि सब; अनुभाति=उसके पीछे प्रकाशित होते हैं; तस्य=उसके; भासा=प्रकाशसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १४ ॥
व्याख्या —उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य अपना प्रकाश नहीं फैला सकता, जिस प्रकार सूर्यके प्रकाशित होनेपर जुगनूका प्रकाश लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार सूर्यका भी तेज वहाँ लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ अपना प्रकाश नहीं फैला सकते, फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है; क्योंकि इस जगत्में जो कोई भी प्रकाशशील तत्त्व है, वे उन परम प्रकाशस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी
- यह मन्त्र कठ० २।२।१५ और मुण्डक० २।२।१० में भी है।