ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
आत्मस्थम्=हृदयस्थित परमेश्वरको; ये=जो; धीराः=धीर पुरुष; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वतम्=सदा रहनेवाला; सुखम्=परमानन्द प्राप्त होता है; इतरेषाम्=दूसरोंको; न=नहीं ॥ १२ ॥
व्याख्या —जो विशुद्ध चेतनस्वरूप परमेश्वरके ही अंश होनेके कारण वास्तवमें निष्क्रिय हैं, ऐसे अनन्त जीवात्माओंके जो अकेले ही नियन्ता—कर्मफल देनेवाले हैं, जो एक प्रकृतिरूप बीजको बहुत प्रकारसे रचना करके इस विचित्र जगत्के रूपमें बनाते हैं उन हृदयस्थित सर्वशक्तिमान् परम सुहृद् परमेश्वरको जो धीर पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, निरन्तर उन्हींमें तन्मय हुए रहते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला परम आनन्द प्राप्त होता है; दूसरोंको अर्थात् जो इस प्रकार उनका निरन्तर चिन्तन नहीं करते उनको वह परमानन्द नहीं मिलता—वे उससे वञ्चित रह जाते हैं ॥ १२ ॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्र्वेतानाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत् कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १३ ॥
यः=जो; एकः=एक; नित्यः=नित्य; चेतनः=चेतन (परमात्मा); बहूनाम्=बहुत-से; नित्यानाम्=नित्य; चेतनानाम्=चेतन आत्माओंके; कामान् विदधाति=कर्मफलभोगोंका विधान करता है; तत्=उस; सांख्ययोगाधिगम्यम्=ज्ञानयोगसे और कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य; कारणम्=सबके कारणरूप; देवम्=परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥
व्याख्या —जो नित्य चेतन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा अकेले ही बहुत-से नित्य चेतन जीवात्माओंके कर्मफलभोगोंका विधान करते हैं, जिन्होंने इस विचित्र जगत्की रचना करके समस्त जीवसमुदायके लिये उनके कर्मानुसार फलभोगकी व्यवस्था कर रखी है, उनको प्राप्त करनेके दो साधन हैं—एक ज्ञानयोग, दूसरा कर्मयोग; भक्ति दोनोंमें ही अनुस्यूत है, इस कारण उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। उन ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये
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जानेयोग्य सबके कारणरूप परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जो उन्हें जान लेता है और प्राप्त कर लेता है, वह कभी किसी भी कारणसे जन्म-मरणके बन्धनमें नहीं पड़ता। अतः मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको प्राप्त करनेके लिये अपनी योग्यता और रुचिके अनुसार ज्ञानयोग या कर्मयोग—किसी एक साधनमें तत्परतापूर्वक लग जाना चाहिये ॥ १३ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १४ ॥*
तत्र=वहाँ; न=न तो; सूर्यः=सूर्य; भाति=प्रकाश फैला सकता है; न=न; चन्द्रतारकम्=चन्द्रमा और तारागणका समुदाय ही; (और) न=न; इमाः=ये; विद्युतः=बिजलियाँ ही; भान्ति=वहाँ प्रकाशित हो सकती हैं; अयम्=(फिर) यह; अग्निः=लौकिक अग्नि तो; कुतः=कैसे प्रकाशित हो सकता है; (क्योंकि) तम् भान्तम् एव=उसके प्रकाशित होनेपर ही (उसोके प्रकाशसे); सर्वम्=बतलाये हुए सूर्य आदि सब; अनुभाति=उसके पीछे प्रकाशित होते हैं; तस्य=उसके; भासा=प्रकाशसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १४ ॥
व्याख्या —उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य अपना प्रकाश नहीं फैला सकता, जिस प्रकार सूर्यके प्रकाशित होनेपर जुगनूका प्रकाश लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार सूर्यका भी तेज वहाँ लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ अपना प्रकाश नहीं फैला सकते, फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है; क्योंकि इस जगत्में जो कोई भी प्रकाशशील तत्त्व है, वे उन परम प्रकाशस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी
- यह मन्त्र कठ० २।२।१५ और मुण्डक० २।२।१० में भी है।
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[ अध्याय ६ ]
प्रकाशशक्तिके किसी अंशको पाकर ही प्रकाशित होते हैं। फिर वे अपने प्रकाशकके समीप कैसे अपना प्रकाश फैला सकते हैं? अतः यही समझना चाहिये कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे ही प्रकाशित हो रहा है ॥ १४ ॥
एको ह०सो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ १५ ॥
अस्य=इस; भुवनस्य=ब्रह्माण्डके; मध्ये=बीचमें; (जो) एकः=एक; हंसः=प्रकाशस्वरूप परमात्मा (परिपूर्ण है); सः एव=वही; सलिले=जलमें; संनिविष्टः=स्थित; अग्निः=अग्नि है; तम्=उसे; विदित्वा=जानकर; एव=ही; (मनुष्य) मृत्युम् अत्येति=मृत्युरूप संसार-समुद्रसे सर्वथा पार हो जाता है; अयनाय=दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये; अन्यः=दूसरा; पन्थाः=मार्ग; न=नहीं; विद्यते=है ॥ १५ ॥
व्याख्या—इस ब्रह्माण्डमें जो एक प्रकाशस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सर्वत्र परिपूर्ण है, वे ही जलमें प्रविष्ट अग्नि हैं। यद्यपि शीतल स्वभावयुक्त जलमें उष्णस्वभाव अग्निका होना साधारण दृष्टिसे समझमें नहीं आता; क्योंकि दोनोंका स्वभाव परस्पर विरुद्ध है, तथापि उसके रहस्यको जाननेवाले वैज्ञानिकोंको यह प्रत्यक्ष दीखता है, अतः वे उसी जलमेंसे बिजलीके रूपमें उस अग्नि तत्त्वको निकालकर नाना प्रकारके कार्योंका साधन करते हैं। शास्त्रोंमें भी जगह-जगह यह बात कही गयी है कि समुद्रमें बड़वानल अग्नि है। अपने कार्यमें कारण व्याप्त रहता है—इस न्यायसे भी जलतत्त्वका कारण होनेसे तेजस्तत्त्वका जलमें व्याप्त होना उचित ही है। किंतु इस रहस्यको न जाननेवाला जलमें स्थित अग्निको नहीं देख पाता। इसी प्रकार परमात्मा इस जड़ जगत्से स्वभावतः सर्वथा विलक्षण हैं; क्योंकि वे चेतन, ज्ञानस्वरूप और सर्वज्ञ हैं तथा यह जगत् जड़ और ज्ञेय है। इस प्रकार जगत्से विरुद्ध दीखनेके कारण साधारण
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दृष्टिसे यह बात समझमें नहीं आती कि वे इसमें किस प्रकार व्याप्त हैं और किस प्रकार इसके कारण हैं। परंतु जो उस परब्रह्मकी अचिन्त्य अद्भुत शक्तिके रहस्यको समझते हैं, उनको ये प्रत्यक्षवत् सर्वत्र परिपूर्ण और सबके एकमात्र कारण प्रतीत होते हैं। उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको जानकर ही मनुष्य इस मृत्युरूप संसार-समुद्रसे पार हो सकता है—सदाके लिये जन्म-मरणसे सर्वथा छूट सकता है। उनके दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। अतः हमें उन परमात्माका जिज्ञासु होकर उन्हें जाननेकी चेष्टामें लग जाना चाहिये ॥ १५ ॥
सम्बन्ध— जिनको जाननेसे जन्म-मरणसे छूटनेकी बात कही गयी है, वे परमेश्वर कैसे हैं—इस जिज्ञासापर उनके स्वरूपका वर्णन किया जाता है—
स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनि-
र्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद् यः।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः
सः सारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः
॥ १६ ॥
सः=वह; ज्ञः=ज्ञानस्वरूप परमात्मा; विश्वकृद्=सर्वस्रष्टा; विश्वविद्=सर्वज्ञ; आत्मयोनिः= स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु; कालकालः= कालका भी महाकाल; गुणी= सम्पूर्ण दिव्यगुणोंसे सम्पन्न; (और) सर्वविद्= सबको जाननेवाला है; यः= जो; प्रधानक्षेत्रज्ञपतिः= प्रकृति और जीवात्माका स्वामी; गुणेशः= समस्त गुणोंका शासक; (तथा) संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः= जन्म-मृत्युरूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है ॥ १६ ॥
व्याख्या— जिनका प्रकरण चल रहा है, वे ज्ञानस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, सर्वज्ञ और स्वयं ही अपनेको प्रकट करनेमें हेतु हैं। उन्हें प्रकट करनेवाला कोई दूसरा कारण नहीं है। वे कालके भी महाकाल हैं, कालकी भी उनतक पहुँच नहीं है। वे कालातीत हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है कि सबका संहार करनेवाला मृत्यु उन महाकालरूप परमात्माका
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[ अध्याय ६ ]
उपसेचन—खाद्य है (१।२।२४)। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सौहार्द्र, प्रेम, दया आदि समस्त कल्याणमय दिव्य गुणोंसे सम्पन्न हैं, संसारमें जितने भी शुभ गुण देखनेमें आते हैं, वे उन दिव्य गुणोंके किसी एक अंशकी झलक हैं। वे समस्त जीवोंको, उनके कर्मोंको और अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तीनों कालोंमें घटित होनेवाली छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी घटनाको भलीभाँति जानते हैं। वे प्रकृति और जीव-समुदायके (अपनी अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके) स्वामी हैं तथा कार्य-कारणरूपमें स्थित सत्त्व आदि तीनों गुणोंका यथायोग्य नियन्त्रण करते हैं। वे ही इस जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें जीवोंको उनके कर्मानुसार बाँधकर रखते, उनका पालन-पोषण करते और इस बन्धनसे जीवोंको मुक्त भी करते हैं। उनकी कृपासे ही जीव मुक्तिके साधनमें लगकर साधनके परिपक्व होनेपर मुक्त होते हैं ॥१६॥
स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो
ऋः सर्वगो भुवनस्यास्य गोसा।
य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव
नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥
सः हि=वही; तन्मयः=तन्मय; अमृतः=अमृतस्वरूप; ईशसंस्थः=ईशवरों (लोकपालों) में भी आत्मरूपसे स्थित; ऋः=सर्वज्ञ; सर्वगः=सर्वत्र परिपूर्ण; (और) अस्य=इस; भुवनस्य=ब्रह्माण्डका; गोसा=रक्षक है; यः=जो; अस्य=इस; जगतः=सम्पूर्ण जगत्का; नित्यम्=सदा; एव=ही; ईशे=शासन करता है; (क्योंकि) ईशनाय=इस जगत्पर शासन करनेके लिये; अन्यः=दूसरा कोई भी; हेतुः=हेतु; न=नहीं; विद्यते=है ॥१७॥
व्याख्या —जिनके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन हुआ है, वे परब्रह्म परमेश्वर ही इस जगत्के—स्वरूपमें स्थित, अमृतस्वरूप—एकरस हैं; इस जगत्के उत्पत्ति-विनाशरूप परिवर्तनसे उनका परिवर्तन नहीं होता। वे समस्त ईश्वरोंमें—समस्त लोकोंका पालन करनेके लिये नियुक्त किये हुए लोकपालोंमें भी
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अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे सर्वज्ञ, सर्वत्र परिपूर्ण परमेश्वर ही इस समस्त ब्रह्माण्डकी रक्षा करते हैं; वे ही इस सम्पूर्ण जगत्का सदा यथायोग्य नियन्त्रण और संचालन करते हैं। दूसरा कोई भी इस जगत्पर शासन करनेके लिये उपयुक्त हेतु नहीं प्रतीत होता; क्योंकि दूसरा कोई भी सबपर शासन करनेमें समर्थ नहीं है॥ १७॥
सम्बन्ध— उपयुक्त परमेश्वरको जानने और पानेके लिये साधनके रूपमें उन्हींकी शरण लेनेका प्रकार बताया जाता है—
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तः ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥ १८॥
यः =जो परमेश्वर; वै =निश्चय ही; पूर्वम् =सबसे पहले; ब्रह्माणम् =ब्रह्माको; विदधाति =उत्पन्न करता है; च =और; यः =जो; वै =निश्चय ही; तस्मै =उस ब्रह्माको; वेदान् =समस्त वेदोंका ज्ञान; प्रहिणोति =प्रदान करता है; तम् आत्मबुद्धिप्रकाशम् =उस परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले; ह देवम् =प्रसिद्ध देव परमेश्वरको; अहम् =मैं; मुमुक्षुः =मोक्षकी इच्छावाला साधक; शरणम् =आश्रयरूपमें; प्रपद्ये =ग्रहण करता हूँ॥ १८॥
व्याख्या— उन परमेश्वरको प्राप्त करनेका सार्वभौम एवं सुगम उपाय सर्वतोभावेसे उन्हींपर निर्भर होकर उन्हींकी शरणमें चले जाना है। अतः साधकको मनके द्वारा नीचे लिखे भावका चिन्तन करते हुए परमात्माकी शरणमें जाना चाहिये। जो परमेश्वर निश्चय ही सबसे पहले अपने नाभिकमलमेंसे ब्रह्माको उत्पन्न करते हैं, उत्पन्न करके उन्हें निःसंदेह समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करते हैं तथा जो अपने स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपने भक्तोंके हृदयमें तदनुरूप विशुद्ध बुद्धिको प्रकट करते हैं (गीता १०।१०), उन पूर्व-मन्त्रोंमें वर्णित सर्वशक्तिमान् प्रसिद्ध देव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी मैं मोक्षकी
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[ अध्याय ६ ]
अभिलाषासे युक्त होकर शरण ग्रहण करता हूँ—वे ही मुझे इस संसार-बन्धनसे छुड़ायें ॥ १८ ॥
निष्कलं निष्क्रियः शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ।
अमृतस्य परः सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥ १९ ॥
निष्कलम्=कलाओंसे रहित; निष्क्रियम्=क्रियारहित; शान्तम्=सर्वथा शान्त; निरवद्यम्=निर्दीप्य; निरञ्जनम्=निर्मल; अमृतस्य=अमृतके; परम्=परम; सेतुम्=सेतुरूप; (तथा) दग्धेन्धनम्=जले हुए ईंधनसे युक्त; अनलम् इव=अग्निकी भाँति (निर्मल ज्योतिःस्वरूप उन परमात्माका मैं चिन्तन करता हूँ) ॥ १९ ॥
व्याख्या—निर्गुण-निराकार परमात्माकी उपासना करनेवाले साधकको इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये कि जो (पहले बतलायी हुई) सोलह कलाओंसे अर्थात् संसारके सम्बन्धसे रहित, सर्वथा क्रिया-शून्य, परम शान्त और सब प्रकारके दोषोंसे रहित हैं, जो अमृतस्वरूप मोक्षके परम सेतु हैं अर्थात् जिनका आश्रय लेकर मनुष्य अत्यन्त सुगमतापूर्वक इस संसारसमुद्रसे पार हो सकता है, जो लकड़ीका पार्थिव अंश जल जानेके बाद धधकते हुए अंगारोंवाली अग्निकी भाँति सर्वथा निर्विकार, निर्मल प्रकाशस्वरूप, ज्ञानस्वरूप परम चेतन हैं, उन निर्विशेष निर्गुण-निराकार परमात्माको तत्त्वसे जाननेके लिये उन्हींको लक्ष्य बनाकर उनका चिन्तन करता हूँ ॥ १९ ॥
सम्बन्ध—पहले जो यह बात कही गयी थी कि इस संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये उन परमात्माको जान लेनेके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है, उसीको दृढ़ किया जाता है—
यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः ।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥ २० ॥
यदा=जब; मानवाः=मनुष्यगण; आकाशम्=आकाशको; चर्मवत्=चमड़ेकी भाँति; वेष्टयिष्यन्ति=लपेट सकेंगे; तदा=तब; देवम्=उन परमदेव परमात्माको;
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अविज्ञाय=बिना जाने भी; दुःखस्य=दुःख-समुदायका; अन्तः=अन्त; भविष्यति=हो सकेगा ॥ २० ॥
व्याख्या —भाव यह है कि जिस प्रकार आकाशको चमड़ेकी भाँति लेपटना मनुष्यके लिये सर्वथा असम्भव है, सारे मनुष्य मिलकर भी इस कार्यको नहीं कर सकते, उसी प्रकार परमात्माको बिना जाने कोई भी जीव इस दुःखसमुद्रसे पार नहीं हो सकता। अतः मनुष्यको दुःखोंसे सर्वथा छूटने और निश्चल परमानन्दकी प्राप्तिके लिये अन्य सब ओरसे मनको हटाकर एकमात्र उन्हींको जाननेके साधनमें तीव्र इच्छासे लग जाना चाहिये ॥ २० ॥
तपःप्रभावाद् देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान् ।
अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं
प्रोवाच सम्यग्पुणिसङ्गजुष्टम् ॥ २१ ॥
ह=यह प्रसिद्ध है कि; श्वेताश्वतरः=श्वेताश्वतर नामक ऋषि; तपः-प्रभावात्=तपके प्रभावसे; च=और; देवप्रसादात्=परमदेव परमेश्वरकी कृपासे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विद्वान्=जान सका; अथ=तथा; (उसने) ऋषिसङ्गजुष्टम्=ऋषि-समुदायसे सेवित; परमम्=परम; पवित्रम्=पवित्र (इस ब्रह्मतत्त्वका); अत्याश्रमिभ्यः=आश्रमके अभिमानसे अतीत अधिकारियोंको; सम्यक्=पूर्णरूपसे; प्रोवाच=उपदेश किया था ॥ २१ ॥
व्याख्या —यह बात प्रसिद्ध है कि श्वेताश्वतर ऋषिने तपके प्रभावसे अर्थात् समस्त विषय-सुखका त्याग करके संयममय जीवन बिताते हुए निरन्तर परमात्माके ही चिन्तनमें लगे रहकर उन परमदेव परमेश्वरकी अहैतुकी दयासे उन्हें जान लिया था। फिर उन्होंने ऋषि-समुदायसे सेवित—उनके परम लक्ष्य इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका आश्रमके अभिमानसे सर्वथा अतीत हुए देहाभिमानशून्य अधिकारियोंको भलीभाँति उपदेश किया था। इससे इस मन्त्रमें यह बात भी दिखला दी गयी कि देहाभिमानशून्य साधक ही ब्रह्मतत्त्वका उपदेश सुननेके वास्तविक अधिकारी हैं ॥ २१ ॥
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[ अध्याय ६ ]
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्ये प्रचोदितम्।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥ २२ ॥
[ इदम् ]=यह; परमम्=परम; गुह्यम्=रहस्यमय ज्ञान; पुराकल्ये=पूर्वकल्पमें; वेदान्ते=वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में; प्रचोदितम्=भलीभाँति वर्णित हुआ था; अप्रशान्ताय=जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको; न दातव्यम्=इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; पुनः=तथा; अपुत्राय=जो अपना पुत्र न हो; वा=अथवा; अशिष्याय=जो शिष्य न हो, उसे; न (दातव्यम्)=नहीं देना चाहिये ॥ २२ ॥
व्याख्या—यह परम रहस्यमय ज्ञान पूर्वकल्पमें भी वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में भलीभाँति वर्णित हुआ था। भाव यह कि इस ज्ञानकी परम्परा कल्प-कल्पान्तरसे चली आती है, यह कोई नयी बात नहीं है। इसका उपदेश किसे दिया जाय और किसे नहीं, ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—‘जिसका अन्तःकरण विषय-वासनासे शून्य होकर सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको इस रहस्यका उपदेश नहीं देना चाहिये; तथा जो अपना पुत्र न हो अथवा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना चाहिये।’ भाव यह है कि या तो जो सर्वथा शान्तचित्त हो, ऐसे अधिकारीको देना चाहिये अथवा जो अपना पुत्र या शिष्य हो, उसे देना चाहिये; क्योंकि पुत्र और शिष्यको अधिकारी बनाना पिता और गुरुका ही काम है; अतः वह पहलेसे ही अधिकारी हो, यह नियम नहीं है ॥ २२ ॥
यस्य देवे परा भक्तियथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।
प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ २३ ॥
यस्य=जिसकी; देवे=परमदेव परमेश्वरमें; परा=परम; भक्तिः=भक्ति है; (तथा) यथा=जिस प्रकार; देवे=परमेश्वरमें है; तथा=उसी प्रकार; गुरौ=गुरुमें भी है; तस्य महात्मनः=उस महात्मा पुरुषके हृदयमें; हि=ही; एते=ये; कथिताः=बताये
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हुए; अर्थाः=रहस्यमय अर्थ; प्रकाशन्ते=प्रकाशित होते हैं; प्रकाशन्ते महात्मनः=उसी महात्माके हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ २३ ॥
व्याख्या —जिस साधककी परमदेव परमेश्वरमें परम भक्ति होती है तथा जिस प्रकार परमेश्वरमें होती है, उसी प्रकार अपने गुरुमें भी होती है, उस महात्मा—मनस्वी पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं। अतः जिज्ञासुको पूर्ण श्रद्धालु और भक्त बनना चाहिये। जिसमें पूर्ण श्रद्धा और भक्ति है, उसी महात्माके हृदयमें ये गूढ़ अर्थ प्रकाशित होते हैं। इस मन्त्रमें अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २३ ॥
॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
॥ कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ आरम्भमें दिया जा चुका है।
॥ श्रीहरिः ॥
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| असुर्या नाम ते लोकाः | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | २९ |
| अन्धं तमः प्रविशन्ति | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ३४ |
| अन्यदेवाहुर्विद्यया | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ३५ |
| अन्धं तमः प्रविशन्ति | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ३८ |
| अन्यदेवाहुः सम्भवात् | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ३९ |
| अग्ने नय सुपथा राये | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ४४ |
| अनेजदेकं मनसो जवीयः | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ३० |
| अथ वायुमब्रुवन् | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ७ | ६३ |
| अथाध्यात्मं यदेतत् | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ५ | ७० |
| अथेन्द्रमब्रुवन् | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ११ | ६५ |
| अग्निर्यथैको भुवनम् | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ९ | १५२ |
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १२ | १४३ |
| ,, ,, | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १३ | १४४ |
| ,, ,, | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १७ | १६८ |
| अजीर्यताममृतानाम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २८ | ९७ |
| अणोरणीयान्महतः | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २० | ११५ |
| अनुपश्य यथा पूर्वे | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ६ | ८० |
| अन्यच्छ्रेयोऽन्यत् | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १ | ९८ |
| अन्यत्र धर्मादन्यत्र० | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १४ | १११ |
| अरण्योर्निहितः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ८ | १४१ |
| अविद्यायामन्तरे | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ५ | १०२ |
( ५२३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अव्यक्तात्तु परः | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ८ | १६२ |
| अशब्दमस्पर्शम् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १५ | १३३ |
| अशरीरँशरीरेषु | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २२ | ११७ |
| अस्तीत्येवोपलब्धव्यः | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १३ | १६६ |
| अस्य विस्रंसमानस्य | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ४ | १४९ |
| अत्रैष देवः स्वप्ने | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ५ | २०७ |
| अथ कबन्धी कात्यायनः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ३ | १७४ |
| अथ यदि द्विमात्रेण | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ४ | २१६ |
| अथ हैनं कौसल्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | १ | १९४ |
| अथ हैनं भार्गवः | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १ | १८६ |
| अथ हैनं शैब्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | १ | २१३ |
| अथ हैनं सुकेशा | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | १ | २२० |
| अथ हैनं सौर्यायणी | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | १ | २०३ |
| अथादित्य उदयन् | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ६ | १७६ |
| अथैकयोर्ध्व उदानः | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ७ | १९८ |
| अथोत्तरेण तपसा | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १० | १८० |
| अन्नं वै प्रजापतिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १४ | १८४ |
| अरा इव रथनाभौ | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ६ | १८९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ६ | २२५ |
| अहोरात्रो वै प्रजापतिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १३ | १८३ |
| अग्निर्मूर्धा चक्षुषी | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ४ | २५० |
| अतः समुद्रा गिरयश्च | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ९ | २५५ |
| अथर्वणे यां प्रवदेत | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | २ | २३० |
| अरा इव रथनाभौ | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ६ | २६० |
| अविद्यायामन्तरे | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ८ | २४३ |
( ५२४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अविद्यायां बहुधा | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ९ | २४४ |
| अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | २९६ |
| अग्निर्वाग्भूत्वा मुखम् | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | ३०६ |
| अथ यदि ते | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ११ | ३ | ३६६ |
| अथाधिज्यौतिषम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | २ | ३३७ |
| अथाधिविद्यम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ३ | ३३८ |
| अथाधिप्रजम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ४ | ३३८ |
| अथाध्यात्मम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ५ | ३३९ |
| अथातोऽनुप्रश्नाः | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | ३ | ३८७ |
| अन्तरेण तालुके | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | २ | ३५१ |
| अन्नं न निन्द्यात् | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ७ | १ | ४१५ |
| अन्नं न परिचक्षीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ८ | १ | ४१७ |
| अन्नं बहु कुर्वीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ९ | १ | ४१९ |
| अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | २ | १ | ४०६ |
| अन्नाद् वै प्रजाः प्रजायन्ते | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | २ | १ | ३७४ |
| असद् वा इदमग्र आसीत् | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | १ | ३९० |
| असन्नेव स भवति | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | १ | ३८६ |
| अहं वृक्षस्य रेरिवा | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | १० | १ | ३६१ |
| अजात इत्येवं कश्चित् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २१ | ४८९ |
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ४६७ |
| अपाणिपादो जवनो ग्रहीता | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १९ | ४७१ |
| अग्निर्यत्राभिमथ्यते | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४५० |
| अणोरणीयान् महतो महीयान् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | २० | ४७१ |
| अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ५०१ |
| अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम् | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४७६ |
( ५२५ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ४९६ |
| आत्मानँ रथिनम् | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ३ | १२३ |
| आशाप्रतीक्षे संगतम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ८ | ८१ |
| आसीनो दूरं व्रजति | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २१ | ११६ |
| आत्मन एष प्राणः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ३ | १९५ |
| आदित्यो ह वै प्राणः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ५ | १७५ |
| आदित्यो ह वै बाह्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ८ | १९९ |
| आविः संनिहितम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | १ | २५६ |
| आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | ६ | १ | ४१३ |
| आवहन्ती वितन्वाना | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | २ | ३४३ |
| आमायन्तु | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ३ | ३४३ |
| आकाशशरीरं ब्रह्म | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | ४ | ३५३ |
| आप्नोति स्वाराज्यम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | ३ | ३५३ |
| आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ५०६ |
| आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ५०५ |
| इह चेदवेदीदथ | केन० | ... | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | ५७ |
| इतीमा महासँहिताः | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ६ | ३४० |
| इन्द्रियाणां पृथग्भावम् | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ६ | १६१ |
| इन्द्रियाणि हयानाहुः | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ४ | १२३ |
| इन्द्रियेभ्यः परं मनः | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ७ | १६२ |
| इन्द्रियेभ्यः पराः | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १० | १२८ |
| इह चेदशकद् बोद्धुम् | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ४ | १६० |
| इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ९ | १९१ |
| इष्टापूर्तं मन्यमानाः | मुण्डक ० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | १० | २४४ |
( ५२६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ईशा वास्यमिदꣳसर्वम् | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १ | २८ |
| उपनिषदं भो ब्रूहि | केन० | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ७ | ७२ |
| उत्तिष्ठत जाग्रत | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १४ | १३२ |
| उत्पत्तिमायतिम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | १२ | २०२ |
| उद्गीतमेतत् परमं तु ब्रह्म | श्वे० | ... | १ | ... | ... | ... | ... | ७ | ४३९ |
| ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ३ | १४८ |
| ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १ | १५७ |
| ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १ | १२० |
| ऋग्भिरेतं यजुर्भिः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ७ | २१९ |
| ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ९ | १ | ३५९ |
| ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ४७९ |
| एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १२ | १५४ |
| एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १३ | ११० |
| एतत्तुल्यं यदि मन्यसे | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २४ | ९३ |
| एतदालम्बनꣳश्रेष्ठम् | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १७ | ११३ |
| एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १६ | ११२ |
| एष तेऽग्निर्नचिकेतः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १९ | ८९ |
| एष सर्वेषु भूतेषु | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १२ | १३१ |
| एतःह वाव | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ९ | २ | ४०३ |
| एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ९ | २११ |
| एषोऽग्निस्तपति | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ५ | १८९ |
| एतस्माज्जायते प्राणः | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ३ | २५० |
| एतेषु यश्चरते | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ५ | २४० |
| एषोऽणुरात्मा चेतसा | ,, | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ९ | २७२ |
| एह्येहीति तमाहुतयः | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ६ | २४१ |
( ५२७ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| एष सर्वेश्वरः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | २९० |
| एष ब्रह्मैष इन्द्रः | ऐत० | ३ | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ३२७ |
| एको वशी निष्क्रियाणाम् | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ५११ |
| एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्म | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ४४४ |
| एको देवः सर्वभूतेषु | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ५११ |
| एष ह देवः प्रदिशोऽनु | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ४५८ |
| एकैकं जालं बहुधा | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४९२ |
| एको हि रुद्रो न द्वितीयाय | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४६० |
| एष देवो विश्वकर्मा | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १७ | ४८५ |
| एको हंसो भुवनस्यास्य | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ५१४ |
| ओमित्येतदक्षरमिदम् | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १ | २८३ |
| ओमिति ब्रह्म | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ८ | १ | ३५७ |
| ॐ केनेषितं पतति | केन० | ... | ... | ... | १ | ... | ... | १ | ४८ |
| ॐ उशन् ह वै | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १ | ७६ |
| ॐ सुकेशा च भारद्वाजः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १ | १७२ |
| ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः | मुण्डक० | ... | १ | ... | १ | ... | ... | १ | २२९ |
| ॐ शं नो मित्रः | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | १ | १ | ३३० |
| ॐ आत्मा वा इदम् | ऐत० | १ | ... | ... | १ | ... | ... | १ | ३०० |
| कामस्याप्तिं जगतः | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ११ | १०८ |
| कामान् यः कामयते | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | २ | २७४ |
| काली कराली च | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ४ | २४० |
| कालः स्वभावो नियतिः | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४३२ |
| क्रियावन्तः श्रोत्रियाः | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | १० | २८० |
| कुर्वन्नेवेह कर्माणि | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | २ | २८ |
| कोऽयमात्मेति वयम् | ऐत० | ३ | ... | ... | १ | ... | ... | १ | ३२५ |
(५२८)
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गताः कलाः पञ्चदश | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ७ | २७८ |
| गर्भे नु | ऐत० | २ | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | ३२२ |
| गुणान्वयो यः फलकर्म | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ४९५ |
| घृतात् परं मण्डमिव | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ४८५ |
| छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ४८० |
| जानाम्यहꣳशेवधिः | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १० | १०७ |
| जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | २८५ |
| जागरितस्थानो वैश्वानरः | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | २९२ |
| तदेजति तन्नैजति | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ३१ |
| तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ४ | ६१ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ८ | ६३ |
| तद्व तद्वनं नाम | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ६ | ७१ |
| तद्वैषां विजज्ञौ | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | २ | ६० |
| तस्माद्वा इन्द्रोऽतितराम् | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ३ | ६८ |
| तस्माद्वा एते देवाः | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | २ | ६८ |
| तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यम् | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ५ | ६१ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ९ | ६४ |
| तस्मै तृणं निदधौ | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ६ | ६२ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ६४ |
| तस्यै तपो दमः कर्मेति | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ८ | ७२ |
| तस्यैष आदेशो यदेतत् | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ४ | ६९ |
| तꣳह कुमारꣳ सन्तम् | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २ | ७६ |
| तदेतदिति मन्यन्ते | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १४ | १५६ |
| तमब्रवीत् प्रीयमाणः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १६ | ८७ |
| तद्ये ह वै तत् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १५ | १८४ |
| तस्मै स होवाच | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ४ | १७५ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | २ | १८६ |
( ५२९ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तस्मै स होवाच | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | २ | १९५ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | २ | २०३ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | २ | २१४ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | २ | २२१ |
| ,, ,, | मुण्डक० | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ४ | २३१ |
| तत्रापरा ऋग्वेदः | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ५ | २३२ |
| तदेतत्सत्यमृषिः | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ११ | २८१ |
| तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | १ | २३७ |
| तदेतत्सत्यं यथा | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | १ | २४८ |
| तपसा चीयते ब्रह्म | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ८ | २३५ |
| तपः श्रद्धे ये ह्युपवसन्ति | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ११ | २४५ |
| तस्माच्च देवा बहुधा | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ७ | २५३ |
| तस्मादग्निः समिधः | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ५ | २५१ |
| तस्मादृचः साम यजूंषि | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ६ | २५२ |
| तस्मै स विद्वानुपसन्नाय | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | १३ | २४७ |
| तच्चक्षुषाजिघृक्षत् | ऐत० | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ५ | ३११ |
| तच्छिश्नेनाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ९ | ३१३ |
| तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ६ | ३११ |
| तत्त्वचाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ७ | ३१२ |
| तत्प्राणेनाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ४ | ३१० |
| तत्स्त्रिया आत्मभूतम् | ,, | २ | ... | ... | १ | ... | ... | २ | ३१९ |
| तदपानेनाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ३१३ |
| तदेनत् सृष्टम् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ३ | ३०९ |
| तन्मनसाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ८ | ३१२ |
| तमभ्यतपत् | ,, | १ | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ३०२ |
( ५३० )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तमशनायापिपासे | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | ३०७ |
| तस्मादिन्द्रो नाम | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | १४ | ३१७ |
| तस्यैष एव शारीरः | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | २ | ३८७ |
| तस्माद्वा एतस्मात् | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | १ | ३ | ३७३ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | २ | २ | ३७६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | २ | ३७८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | २ | ३८१ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | २ | ३८४ |
| तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ३ | ४२५ |
| तमीश्वराणां परमं महेश्वरम् | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ५०८ |
| तद् वेदगुह्योपनिषत्सु गूढम् | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४९४ |
| तदेवाग्निस्तदादित्यः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४७४ |
| ततो यदुत्तरतरं तदरूपम् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ४६६ |
| ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तम् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ४६४ |
| तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तम् | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४३५ |
| तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयः | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ५०४ |
| तपःप्रभावाद् देवप्रसादाच्च | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २१ | ५१९ |
| तां योगमिति मन्यन्ते | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ११ | १६५ |
| तान् वरिष्ठः प्राणः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ३ | १८७ |
| तान् ह स ऋषिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | २ | १७३ |
| तान् होवाचैतावत् | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ७ | २२५ |
| ता एता देवताः सृष्टाः | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | १ | ३०४ |
| ताभ्यः पुरुषमानयत्ताः | ,, | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | ३०५ |
| ताभ्यो गामानयत्ताः | ,, | १ | ... | ... | २ | ... | ... | २ | ३०५ |
| तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीः | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ९ | ८२ |
( ५३१ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ६ | २१८ |
| तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिः | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४४६ |
| तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेदः | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ३ | ६० |
| तेजो ह वा उदानः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ९ | २०० |
| ते तमर्चन्तः | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ८ | २२६ |
| तेषामसौ विरजः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १६ | १८५ |
| ते ये शतम् | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ३ | ३९५ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ४ | ३९६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ५ | ३९६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ६ | ३९७ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ७ | ३९८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ८ | ३९८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ९ | ३९९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १० | ३९९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ११ | ४०० |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १२ | ४०० |
| ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४३४ |
| तं दुर्दर्शं गूढम् | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १२ | १०९ |
| त्वं स्त्री त्वं पुमानसि | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४७४ |
| दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | २ | २४९ |
| दूरमेते विपरीते | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ४ | १०१ |
| देवैरत्रापि विचिकित्सितम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २१ | ९१ |
| ,, ,, | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २२ | ९१ |
| देवानामति वह्नितमः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ८ | १९० |
| द्वा सुपर्णा सयुजा | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | १ | २६५ |