ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्ये प्रचोदितम्।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥ २२ ॥
[ इदम् ]=यह; परमम्=परम; गुह्यम्=रहस्यमय ज्ञान; पुराकल्ये=पूर्वकल्पमें; वेदान्ते=वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में; प्रचोदितम्=भलीभाँति वर्णित हुआ था; अप्रशान्ताय=जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको; न दातव्यम्=इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; पुनः=तथा; अपुत्राय=जो अपना पुत्र न हो; वा=अथवा; अशिष्याय=जो शिष्य न हो, उसे; न (दातव्यम्)=नहीं देना चाहिये ॥ २२ ॥
व्याख्या—यह परम रहस्यमय ज्ञान पूर्वकल्पमें भी वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में भलीभाँति वर्णित हुआ था। भाव यह कि इस ज्ञानकी परम्परा कल्प-कल्पान्तरसे चली आती है, यह कोई नयी बात नहीं है। इसका उपदेश किसे दिया जाय और किसे नहीं, ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—‘जिसका अन्तःकरण विषय-वासनासे शून्य होकर सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको इस रहस्यका उपदेश नहीं देना चाहिये; तथा जो अपना पुत्र न हो अथवा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना चाहिये।’ भाव यह है कि या तो जो सर्वथा शान्तचित्त हो, ऐसे अधिकारीको देना चाहिये अथवा जो अपना पुत्र या शिष्य हो, उसे देना चाहिये; क्योंकि पुत्र और शिष्यको अधिकारी बनाना पिता और गुरुका ही काम है; अतः वह पहलेसे ही अधिकारी हो, यह नियम नहीं है ॥ २२ ॥
यस्य देवे परा भक्तियथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।
प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ २३ ॥
यस्य=जिसकी; देवे=परमदेव परमेश्वरमें; परा=परम; भक्तिः=भक्ति है; (तथा) यथा=जिस प्रकार; देवे=परमेश्वरमें है; तथा=उसी प्रकार; गुरौ=गुरुमें भी है; तस्य महात्मनः=उस महात्मा पुरुषके हृदयमें; हि=ही; एते=ये; कथिताः=बताये