ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 523, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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हुए; अर्थाः=रहस्यमय अर्थ; प्रकाशन्ते=प्रकाशित होते हैं; प्रकाशन्ते महात्मनः=उसी महात्माके हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ २३ ॥
व्याख्या —जिस साधककी परमदेव परमेश्वरमें परम भक्ति होती है तथा जिस प्रकार परमेश्वरमें होती है, उसी प्रकार अपने गुरुमें भी होती है, उस महात्मा—मनस्वी पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं। अतः जिज्ञासुको पूर्ण श्रद्धालु और भक्त बनना चाहिये। जिसमें पूर्ण श्रद्धा और भक्ति है, उसी महात्माके हृदयमें ये गूढ़ अर्थ प्रकाशित होते हैं। इस मन्त्रमें अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २३ ॥
॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
॥ कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ आरम्भमें दिया जा चुका है।