ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८० | ईशादि नौ उपनिषद् | [ अध्याय १ |
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यह विचारकर नचिकेता एकान्तमें पिताके पास जाकर उनकी शोकनिवृत्तिके लिये इस प्रकार आश्वासनपूर्ण वचन बोला—
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे। सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥
पूर्वे=आपके पूर्वज पितामह आदि; यथा=जिस प्रकारका आचरण करते आये हैं; अनुपश्य=उसपर विचार कीजिये (और); अपरे=(वर्तमानमें भी) दूसरे श्रेष्ठ लोग; [यथा=जैसा आचरण कर रहे हैं; ] तथा प्रतिपश्य=उसपर भी दृष्टिपात कर लीजिये (फिर आप अपने कर्तव्यका निश्चय कीजिये); मर्त्यः=(यह) मरणधर्मा मनुष्य; सस्यम् इव=अनाजकी तरह; पच्यते=पकता है अर्थात् जराजीर्ण होकर मर जाता है (तथा); सस्यम् इव=अनाजकी भाँति ही; पुनः=फिर; आजायते=उत्पन्न हो जाता है॥ ६॥
**व्याख्या—**पिताजी! अपने पितामहादि पूर्वजोंका आचरण देखिये और इस समयके दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंका आचरण देखिये। उनके चरित्रमें न कभी पहले असत्य था, न अब है। असाधु मनुष्य ही असत्यका आचरण किया करते हैं; परंतु उस असत्यसे कोई अजर-अमर नहीं हो सकता। मनुष्य मरणधर्मा है। यह अनाजकी भाँति जरा-जीर्ण होकर मर जाता है और अनाजकी भाँति ही कर्मवश पुनः जन्म ले लेता है॥ ६॥
**सम्बन्ध—**अतएव इस अनित्य जीवनके लिये मनुष्यको कभी कर्तव्यका त्याग करके मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये। आप शोकका त्याग कीजिये और अपने सत्यका पालनकर मुझे मृत्यु (यमराज)-के पास जानेकी अनुमति दीजिये। पुत्रके वचन सुनकर उद्दालकको दुःख हुआ; परंतु नचिकेताकी सत्यपरायणता देखकर उन्होंने उसे यमराजके पास भेज दिया। नचिकेताको यमसदन पहुँचनेपर पता लगा कि यमराज कहीं बाहर गये हुए हैं; अतएव नचिकेता तीन दिनोंतक अन्न-जल ग्रहण किये बिना ही यमराजकी प्रतीक्षा करता रहा। यमराजके लौटनेपर उनकी पत्नीने कहा—
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्। तस्यैताँशान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥