ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली १ ] कठोपनिषद् ८१
**वैवस्वत=**हे सूर्यपुत्र; **वैश्वानरः=**स्वयं अग्निदेवता (ही); **ब्राह्मणः अतिथिः=**ब्राह्मण अतिथिके रूपमें; गृहान्=(गृहस्थके) घरोंमें; **प्रविशति=**प्रवेश करते हैं; **तस्य=**उनकी; (साधु पुरुष) **एताम्=**ऐसी (अर्थात् अर्घ्य-पाद्य-आसन आदिके द्वारा); **शान्तिम्=**शान्ति; **कुर्वन्ति=**किया करते हैं; (अतः आप) उदकम् हर=(उनके पाद-प्रक्षालनादिके लिये) जल ले जाइये॥ ७॥
**व्याख्या—**साक्षात् अग्नि ही मानो तेजसे प्रज्वलित होकर ब्राह्मण अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरपर पधारते हैं। साधुहृदय गृहस्थ अपने कल्याणके लिये उस अतिथिरूप अग्निको शान्त करनेके लिये उसे जल (पाद्य-अर्घ्य आदि) दिया करते हैं; अतएव हे सूर्यपुत्र! आप उस ब्राह्मण-बालकके पैर धोनेके लिये तुरंत जल ले जाइये। भाव यह कि वह अतिथि लगातार तीन दिनोंसे आपकी प्रतीक्षामें अनशन किये बैठा है; आप स्वयं उसकी सेवा करेंगे, तभी वह शान्त होगा॥ ७॥
आशाप्रतीक्षे संगतꣳ सूनृतां च
इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान्।
एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे॥ ८॥
**यस्य=**जिसके; **गृहे=**घरमें; **ब्राह्मणः=**ब्राह्मण अतिथि; **अनश्नन्=**बिना भोजन किये; **वसति=**निवास करता है; [**तस्य=**उस;] **अल्पमेधसः=**मन्दबुद्धि; **पुरुषस्य=**मनुष्यकी; **आशाप्रतीक्षे=**नाना प्रकारकी आशा और प्रतीक्षा; **संगतम्=**उनकी पूर्तिसे होनेवाले सब प्रकारके सुख; **सूनृताम् च=**सुन्दर भाषणके फल एवं; **इष्टापूर्ते च=**यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मोंके और कुआँ, बगीचा, तालाब आदि निर्माण करानेके फल तथा; **सर्वान् पुत्रपशून्=**समस्त पुत्र और पशु; **एतद् वृङ्क्ते=**इन सबको (वह) नष्ट कर देता है॥ ८॥
**व्याख्या—**जिसके घरपर अतिथि ब्राह्मण भूखा बैठा रहता है, उस मन्दबुद्धि मनुष्यको न तो वे इच्छित पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेकी उसे पूरी आशा थी; न वे ही पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेका निश्चय था और