ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८२ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
वह बाट ही देख रहा था; कभी कोई पदार्थ मिल भी गया तो उससे सुखकी प्राप्ति नहीं होती। उसकी वाणीमेंसे सौन्दर्य, सत्य और माधुर्य निकल जाते हैं; अतः सुन्दर वाणीसे प्राप्त होनेवाला सुख भी उसे नहीं मिलता; उसके यज्ञ-दानादि इष्ट कर्म और कूप, तालाब, धर्मशाला आदिके निर्माणरूप पूर्तकर्म एवं उनके फल नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अतिथिका असत्कार उसके पूर्वपुण्यसे प्राप्त पुत्र और पशु आदि धनको नष्ट कर देता है॥ ८॥
सम्बन्ध— पत्नीके वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज तुरंत नचिकेताके पास गये और पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा विधिवत् उसकी पूजा करके कहने लगे—
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे
अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व॥ ९॥
ब्रह्मन्= हे ब्राह्मणदेवता; नमस्यः अतिथिः=आप नमस्कार करनेयोग्य अतिथि हैं; ते=आपको; नमः अस्तु=नमस्कार हो; ब्रह्मन्= हे ब्राह्मण; मे स्वस्ति= मेरा कल्याण; अस्तु=हो; यत्=(आपने) जो; तिस्रः=तीन; रात्रीः=रात्रियोंतक; मे=मेरे; गृहे=घरपर; अनश्नन्=बिना भोजन किये; अवात्सीः=निवास किया है; तस्मात्= इसलिये आप (मुझसे); प्रति=प्रत्येक रात्रिके बदले (एक-एक करके); त्रीन् वरान्=तीन वरदान; वृणीष्व=माँग लीजिये॥ ९॥
व्याख्या— ब्राह्मणदेवता! आप नमस्कारादि सत्कारके योग्य मेरे माननीय अतिथि हैं; कहाँ तो मुझे चाहिये था कि 'मैं आपका यथायोग्य पूजन-सेवन करके आपको संतुष्ट करता और कहाँ मेरे प्रमादसे आप लगातार तीन रात्रियोंसे भूखे बैठे हैं! मुझसे यह बड़ा अपराध हो गया है। आपको नमस्कार है। भगवन्! इस मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो। आप प्रत्येक रात्रिके बदले एक-एक करके मुझसे अपनी इच्छाके अनुरूप तीन वर माँग लीजिये'॥ ९॥