ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली १ ] कठोपनिषद् ८३
सम्बन्ध— तपोमूर्ति अतिथि ब्राह्मण-बालकके अनशनसे भयभीत होकर धर्मज्ञ यमराजने जब इस प्रकार कहा, तब पिताको सुख पहुँचानेकी इच्छासे नचिकेता बोला—
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥
मृत्यो = हे मृत्युदेव; यथा = जिस प्रकार; गौतमः = (मेरे पिता) गौतमवंशीय उद्दालक; मा अभि = मेरे प्रति; शान्तसंकल्पः = शान्त संकल्पवाले; सुमनाः = प्रसन्नचित्त (और); वीतमन्युः = क्रोध एवं खेदसे रहित; स्यात् = हो जायँ (तथा); त्वत्प्रसृष्टम् = आपके द्वारा वापस भेजा जानेपर जब मैं उनके पास जाऊँ तो; मा प्रतीतः = वे मुझपर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर); अभिवदेत् = मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें; एतत् = यह; (मैं) त्रयाणाम् = अपने तीनों वरोंमेंसे; प्रथमम् वरम् = पहला वर; वृणे = माँगता हूँ ॥ १० ॥
व्याख्या— मृत्युदेव! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे गौतमवंशीय पिता उद्दालक, जो क्रोधके आवेशमें मुझे आपके पास भेजकर अब अशान्त और दुःखी हो रहे हैं, मेरे प्रति क्रोधरहित, शान्तचित्त और सर्वथा संतुष्ट हो जायँ तथा आपके द्वारा अनुमति पाकर जब मैं घर जाऊँ, तब वे मुझे अपने पुत्र नचिकेताके रूपमें पहचानकर मेरे साथ पूर्ववत् बड़े स्नेहसे बातचीत करें ॥ १० ॥
सम्बन्ध— यमराजने कहा—
यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्यु-
स्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥
त्वाम् = तुमको; मृत्युमुखात् = मृत्युके मुखसे; प्रमुक्तम् = छूटा हुआ; ददृशिवान् = देखकर; मत्प्रसृष्टः = मुझसे प्रेरित; आरुणिः = (तुम्हारे पिता) अरुण-पुत्र; औद्दालकिः = उद्दालक; यथा पुरस्तात् = पहलेकी भाँति ही; प्रतीतः = यह मेरा