ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके; वीतमन्युः=दुःख और क्रोधसे रहित; भविता=हो जायँगे; रात्रीः=(और वे अपनी आयुकी शेष) रात्रियोंमें; सुखम्=सुखपूर्वक; शयिता=शयन करेंगे॥ ११॥
व्याख्या—तुमको मृत्युके मुखसे छूटकर घर लौटा हुआ देखकर मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पिता अरुण-पुत्र उद्दालक बड़े प्रसन्न होंगे, तुमको अपने पुत्ररूपमें पहचानकर तुमसे पूर्ववत् प्रेम करेंगे तथा उनका दुःख और क्रोध सर्वथा शान्त हो जायगा। तुम्हें पाकर अब वे जीवनभर सुखकी नींद सोयेंगे॥ ११॥
सम्बन्ध—इस वरदानको पाकर नचिकेता बोला, हे यमराज!
स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति। उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
स्वर्गे लोके=स्वर्गलोकमें; किंचन भयम्=किंचित्मात्र भी भय; न अस्ति=नहीं है; तत्र त्वम् न=वहाँ मृत्युरूप स्वयं आप भी नहीं हैं; जरया न बिभेति=वहाँ कोई बुढ़ापेसे भी भय नहीं करता; स्वर्गलोके=स्वर्गलोकके निवासी; अशनायापिपासे=भूख और प्यास; उभे तीर्त्वा=इन दोनोंसे पार होकर; शोकातिगः=दुःखोंसे दूर रहकर; मोदते=आनन्द भोगते हैं॥ १२॥
स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम्। स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥
मृत्यो=हे मृत्युदेव; सः त्वम्=वे आप; स्वर्ग्यम् अग्निम्=उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको; अध्येषि=जानते हैं (अतः); त्वम्=आप; मह्यम्=मुझ; श्रद्दधानाय=श्रद्धालुको (वह अग्निविद्या); प्रब्रूहि=भलीभाँति समझाकर कहिये; स्वर्गलोकाः=स्वर्गलोकके निवासी; अमृतत्वम्=अमरत्वको; भजन्ते=