ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली १ ] कठोपनिषद् ८५
प्राप्त होते हैं (इसलिये); एतत्= यह (मैं); द्वितीयेन वरेण= दूसरे वरके रूपमें; वृणे= माँगता हूँ ॥ १३ ॥
व्याख्या— मैं जानता हूँ कि स्वर्गलोक बड़ा सुखकर है, वहाँ किसी प्रकारका भी भय नहीं है। स्वर्गमें न तो कोई वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है और न जैसे मर्त्यलोकमें आप (मृत्यु)-के द्वारा लोग मारे जाते हैं वैसे कोई मारा ही जाता है। वहाँ मृत्युकालीन संकट नहीं है। यहाँ जैसे प्रत्येक प्राणी भूख और प्यास दोनोंकी ज्वालासे जलते हैं; वैसे वहाँ नहीं जलना पड़ता। वहाँके निवासी शोकसे तरकर सदा आनन्द भोगते हैं; परंतु वह स्वर्ग अग्निविज्ञानको जाने बिना नहीं मिलता। हे मृत्युदेव ! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मेरी उस अग्निविद्यामें और आपमें श्रद्धा है, श्रद्धावान् तत्त्वका अधिकारी होता है; अतः आप कृपया मुझको उस अग्निविद्याका उपदेश कीजिये, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोकमें रहकर अमृतत्वको—देवत्वको प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर माँगता हूँ ॥ १२-१३ ॥
सम्बन्ध— तब यमराज बोले—
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥
नचिकेतः= हे नचिकेता; स्वर्ग्यम् अग्निम्= स्वर्गदायिनी अग्निविद्याको; प्रजानन्= अच्छी तरह जाननेवाला मैं; ते प्रब्रवीमि= तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ; तत् उ मे निबोध= (तुम) उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो; त्वम् एतम्= तुम इस विद्याको; अनन्तलोकाप्तिम्= अविनाशी लोककी प्राप्ति करानेवाली, प्रतिष्ठाम्= उसकी आधारस्वरूपा; अथो= और; गुहायाम् निहितम्= बुद्धिरूप गुफामें छिपी हुई; विद्धि= समझो ॥ १४ ॥
व्याख्या— नचिकेता ! मैं उस स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याको भलीभाँति