ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८६ | ईशादि नौ उपनिषद् | [ अध्याय १ |
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जानता हूँ और तुमको यथार्थरूपसे बतलाता हूँ। तुम इसको अच्छी तरहसे सुनो। यह अग्निविद्या अनन्त—विनाशरहित लोककी प्राप्ति करानेवाली है और उसकी आधारस्वरूपा है। पर तुम ऐसा समझो कि यह है अत्यन्त गुप्त। विद्वानोंकी बुद्धिरूप गुफामें छिपी रहती है॥ १४॥
सम्बन्ध— इतना कहकर यमराजने—
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त-
मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः॥ १५॥
तम् लोकादिम्=उस स्वर्गलोककी कारणरूपा; अग्निम्=अग्निविद्याका; तस्मै उवाच=उस नचिकेताको उपदेश दिया; याः वा यावतीः=उसमें कुण्ड-निर्माण आदिके लिये जो-जो और जितनी; इष्टकाः=ईंटें आदि आवश्यक होती हैं; वा यथा=तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है (वे सब बातें भी बतायीं); च सः अपि=तथा उस नचिकेताने भी; तत् यथोक्तम्=वह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर; प्रत्यवदत्=यमराजको पुनः सुना दिया; अथ=उसके बाद; मृत्युः अस्य तुष्टः=यमराज उसपर संतुष्ट होकर; पुनः एव आह=फिर बोले—॥ १५॥
व्याख्या— उपर्युक्त प्रकारसे अग्निविद्याकी महत्ता और गोपनीयता बतलाकर यमराजने स्वर्गलोककी कारणरूपा अग्निविद्याका रहस्य नचिकेताको समझाया। अग्निके लिये कुण्ड-निर्माणादिमें किस आकारकी, कैसी और कितनी ईंटें चाहिये एवं अग्निका चयन किस प्रकार किया जाना चाहिये—यह सब भलीभाँति समझाया। तदनन्तर नचिकेताकी बुद्धि तथा स्मृतिकी परीक्षाके लिये यमराजने नचिकेतासे पूछा कि तुमने जो कुछ समझा हो, वह मुझे सुनाओ। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने सुनकर जैसा यथार्थ समझा था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यमराज उसकी विलक्षण स्मृति और प्रतिभाको देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले॥ १५॥