ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली १ ] कठोपनिषद् ८७
तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा
वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भवितायमग्निः
सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥
प्रीयमाणः=(उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर) प्रसन्न हुए; महात्मा=महात्मा यमराज; तम्=उस नचिकेतासे; अब्रवीत्=बोले; अद्य=अब मैं; तव=तुमको; इह=यहाँ; भूयः वरम्=पुनः यह (अतिरिक्त) वर; ददामि=देता हूँ कि; अयम् अग्निः=यह अग्निविद्या; तव एव नाम्ना=तुम्हारे ही नामसे; भविता=प्रसिद्ध होगी; च इमाम्=तथा इस; अनेकरूपाम् सृङ्काम्=अनेक रूपोंवाली रत्नोंकी मालाको भी; गृहाण=तुम स्वीकार करो॥ १६॥
**व्याख्या—**महात्मा यमराजने प्रसन्न होकर नचिकेतासे कहा—‘तुम्हारी अप्रतिम योग्यता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, इससे अब मैं तुम्हें एक वर और तुम्हारे बिना माँगे ही देता हूँ। वह यह कि यह अग्नि, जिसका मैंने तुमको उपदेश किया है, तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। और साथ ही यह लो, मैं तुम्हें तुम्हारे देवत्वकी सिद्धिके लिये यह अनेक रूपोंवाली विविध यज्ञ-विज्ञानरूपी रत्नोंकी माला देता हूँ। इसे स्वीकार करो॥ १६॥
**सम्बन्ध—**उस अग्निविद्याका फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं—
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं
त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा
निचाय्येमाःशान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥
त्रिणाचिकेतः=इस (अग्निका शास्त्रोक्त रीतिसे) तीन बार अनुष्ठान करनेवाला; त्रिभिः संधिम् एत्य=तीनों (ऋक्, साम, यजुर्वेद)-के साथ सम्बन्ध जोड़कर; त्रिकर्मकृत्=यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको निष्काम-भावसे करता रहनेवाला मनुष्य; जन्ममृत्यू तरति=जन्म-मृत्युसे तर जाता है; ब्रह्मजज्ञम्=(वह) ब्रह्मासे उत्पन्न