भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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८८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

सृष्टिके जाननेवाले; ईड्यम् देवम्= स्तवनीय इस अग्निदेवको; विदित्वा= जानकर तथा; निचाय्य= इसका निष्कामभावसे चयन करके; इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति= इस अनन्त शान्तिको पा जाता है (जो मुझको प्राप्त है) ॥ १७॥

व्याख्या— इस अग्निका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला पुरुष ऋक्, यजुः, साम—तीनों वेदोंसे सम्बन्ध जोड़कर तीनों वेदोंके तत्त्व-रहस्यमें निष्णात होकर, निष्कामभावसे यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको करता हुआ जन्म-मृत्युसे तर जाता है। वह ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिको जाननेवाले स्तवनीय इस अग्निदेवको भलीभाँति जानकर इसका निष्कामभावसे चयन करके उस अनन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है, जो मुझको प्राप्त है॥ १७॥

त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम्। स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥

एतत् त्रयम्= ईंटोंके स्वरूप, संख्या और अग्नि-चयन-विधि—इन तीनों बातोंको; विदित्वा= जानकर; त्रिणाचिकेतः= तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्याका अनुष्ठान करनेवाला तथा; यः एवम्= जो कोई भी इस प्रकार; विद्वान्= जाननेवाला पुरुष; नाचिकेतम्= इस नाचिकेत अग्निका; चिनुते= चयन करता है; सः मृत्युपाशान्= वह मृत्युके पाशको; पुरतः प्रणोद्य= अपने सामने ही (मनुष्य-शरीरमें ही) काटकर; शोकातिगः= शोकसे पार होकर; स्वर्गलोके मोदते= स्वर्गलोकमें आनन्दका अनुभव करता है॥ १८॥

व्याख्या— किस आकारकी कैसी ईंटें हों और कितनी संख्यामें हों एवं किस प्रकारसे अग्निका चयन किया जाय—इन तीनों बातोंको जानकर जो विद्वान् तीन बार नाचिकेत अग्निविद्याका निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है—अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पहले ही (जन्म) मृत्युके पाशको तोड़कर शोकरहित होकर अन्तमें स्वर्गलोकके (अविनाशी ऊर्ध्वलोकके) आनन्दका अनुभव करता है॥ १८॥