भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८९

एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण। एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९॥

नचिकेतः=हे नचिकेता; एषः ते=यह तुम्हें बतलायी हुई; स्वर्ग्यः अग्निः=स्वर्ग प्रदान करनेवाली अग्निविद्या है; यम् द्वितीयेन वरेण अवृणीथाः=जिसको तुमने दूसरे वरसे माँगा था; एतम् अग्निम्=इस अग्निको (अबसे); जनासः=लोग; तव एव=तुम्हारे ही नामसे; प्रवक्ष्यन्ति=कहा करेंगे; नचिकेतः=हे नचिकेता; तृतीयम् वरम् वृणीष्व=(अब तुम) तीसरा वर माँगो॥ १९॥

**व्याख्या—**यमराज कहते हैं—नचिकेता! तुम्हें यह उसी स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याका उपदेश दिया गया है, जिसके लिये तुमने दूसरे वरमें याचना की थी। अबसे लोग तुम्हारे ही नामसे इस अग्निको पुकारा करेंगे। नचिकेता! अब तुम तीसरा वर माँगो॥ १९॥

**सम्बन्ध—**नचिकेता तीसरा वर माँगता है—

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥

प्रेते मनुष्ये=मरे हुए मनुष्यके विषयमें; या इयम्=जो यह; विचिकित्सा=संशय है; एके (आहुः) अयम् अस्ति इति=कोई तो यों कहते हैं कि मरनेके बाद यह आत्मा रहता है; च एके (आहुः) न अस्ति इति=और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता; त्वया अनुशिष्टः=आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ; अहम् एतत् विद्याम्=मैं इसका निर्णय भलीभाँति समझ लूँ; एषः वराणाम्=यही तीनों वरोंमेंसे; तृतीयः वरः=तीसरा वर है॥ २०॥

**व्याख्या—**इस लोकके कल्याणके लिये पिताकी संतुष्टिका वर और

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