ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८३
सम्बन्ध— तपोमूर्ति अतिथि ब्राह्मण-बालकके अनशनसे भयभीत होकर धर्मज्ञ यमराजने जब इस प्रकार कहा, तब पिताको सुख पहुँचानेकी इच्छासे नचिकेता बोला—
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥
मृत्यो = हे मृत्युदेव; यथा = जिस प्रकार; गौतमः = (मेरे पिता) गौतमवंशीय उद्दालक; मा अभि = मेरे प्रति; शान्तसंकल्पः = शान्त संकल्पवाले; सुमनाः = प्रसन्नचित्त (और); वीतमन्युः = क्रोध एवं खेदसे रहित; स्यात् = हो जायँ (तथा); त्वत्प्रसृष्टम् = आपके द्वारा वापस भेजा जानेपर जब मैं उनके पास जाऊँ तो; मा प्रतीतः = वे मुझपर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर); अभिवदेत् = मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें; एतत् = यह; (मैं) त्रयाणाम् = अपने तीनों वरोंमेंसे; प्रथमम् वरम् = पहला वर; वृणे = माँगता हूँ ॥ १० ॥
व्याख्या— मृत्युदेव! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे गौतमवंशीय पिता उद्दालक, जो क्रोधके आवेशमें मुझे आपके पास भेजकर अब अशान्त और दुःखी हो रहे हैं, मेरे प्रति क्रोधरहित, शान्तचित्त और सर्वथा संतुष्ट हो जायँ तथा आपके द्वारा अनुमति पाकर जब मैं घर जाऊँ, तब वे मुझे अपने पुत्र नचिकेताके रूपमें पहचानकर मेरे साथ पूर्ववत् बड़े स्नेहसे बातचीत करें ॥ १० ॥
सम्बन्ध— यमराजने कहा—
यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्यु-
स्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥
त्वाम् = तुमको; मृत्युमुखात् = मृत्युके मुखसे; प्रमुक्तम् = छूटा हुआ; ददृशिवान् = देखकर; मत्प्रसृष्टः = मुझसे प्रेरित; आरुणिः = (तुम्हारे पिता) अरुण-पुत्र; औद्दालकिः = उद्दालक; यथा पुरस्तात् = पहलेकी भाँति ही; प्रतीतः = यह मेरा
८४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके; वीतमन्युः=दुःख और क्रोधसे रहित; भविता=हो जायँगे; रात्रीः=(और वे अपनी आयुकी शेष) रात्रियोंमें; सुखम्=सुखपूर्वक; शयिता=शयन करेंगे॥ ११॥
व्याख्या—तुमको मृत्युके मुखसे छूटकर घर लौटा हुआ देखकर मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पिता अरुण-पुत्र उद्दालक बड़े प्रसन्न होंगे, तुमको अपने पुत्ररूपमें पहचानकर तुमसे पूर्ववत् प्रेम करेंगे तथा उनका दुःख और क्रोध सर्वथा शान्त हो जायगा। तुम्हें पाकर अब वे जीवनभर सुखकी नींद सोयेंगे॥ ११॥
सम्बन्ध—इस वरदानको पाकर नचिकेता बोला, हे यमराज!
स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति। उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
स्वर्गे लोके=स्वर्गलोकमें; किंचन भयम्=किंचित्मात्र भी भय; न अस्ति=नहीं है; तत्र त्वम् न=वहाँ मृत्युरूप स्वयं आप भी नहीं हैं; जरया न बिभेति=वहाँ कोई बुढ़ापेसे भी भय नहीं करता; स्वर्गलोके=स्वर्गलोकके निवासी; अशनायापिपासे=भूख और प्यास; उभे तीर्त्वा=इन दोनोंसे पार होकर; शोकातिगः=दुःखोंसे दूर रहकर; मोदते=आनन्द भोगते हैं॥ १२॥
स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम्। स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥
मृत्यो=हे मृत्युदेव; सः त्वम्=वे आप; स्वर्ग्यम् अग्निम्=उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको; अध्येषि=जानते हैं (अतः); त्वम्=आप; मह्यम्=मुझ; श्रद्दधानाय=श्रद्धालुको (वह अग्निविद्या); प्रब्रूहि=भलीभाँति समझाकर कहिये; स्वर्गलोकाः=स्वर्गलोकके निवासी; अमृतत्वम्=अमरत्वको; भजन्ते=
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८५
प्राप्त होते हैं (इसलिये); एतत्= यह (मैं); द्वितीयेन वरेण= दूसरे वरके रूपमें; वृणे= माँगता हूँ ॥ १३ ॥
व्याख्या— मैं जानता हूँ कि स्वर्गलोक बड़ा सुखकर है, वहाँ किसी प्रकारका भी भय नहीं है। स्वर्गमें न तो कोई वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है और न जैसे मर्त्यलोकमें आप (मृत्यु)-के द्वारा लोग मारे जाते हैं वैसे कोई मारा ही जाता है। वहाँ मृत्युकालीन संकट नहीं है। यहाँ जैसे प्रत्येक प्राणी भूख और प्यास दोनोंकी ज्वालासे जलते हैं; वैसे वहाँ नहीं जलना पड़ता। वहाँके निवासी शोकसे तरकर सदा आनन्द भोगते हैं; परंतु वह स्वर्ग अग्निविज्ञानको जाने बिना नहीं मिलता। हे मृत्युदेव ! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मेरी उस अग्निविद्यामें और आपमें श्रद्धा है, श्रद्धावान् तत्त्वका अधिकारी होता है; अतः आप कृपया मुझको उस अग्निविद्याका उपदेश कीजिये, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोकमें रहकर अमृतत्वको—देवत्वको प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर माँगता हूँ ॥ १२-१३ ॥
सम्बन्ध— तब यमराज बोले—
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥
नचिकेतः= हे नचिकेता; स्वर्ग्यम् अग्निम्= स्वर्गदायिनी अग्निविद्याको; प्रजानन्= अच्छी तरह जाननेवाला मैं; ते प्रब्रवीमि= तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ; तत् उ मे निबोध= (तुम) उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो; त्वम् एतम्= तुम इस विद्याको; अनन्तलोकाप्तिम्= अविनाशी लोककी प्राप्ति करानेवाली, प्रतिष्ठाम्= उसकी आधारस्वरूपा; अथो= और; गुहायाम् निहितम्= बुद्धिरूप गुफामें छिपी हुई; विद्धि= समझो ॥ १४ ॥
व्याख्या— नचिकेता ! मैं उस स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याको भलीभाँति
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जानता हूँ और तुमको यथार्थरूपसे बतलाता हूँ। तुम इसको अच्छी तरहसे सुनो। यह अग्निविद्या अनन्त—विनाशरहित लोककी प्राप्ति करानेवाली है और उसकी आधारस्वरूपा है। पर तुम ऐसा समझो कि यह है अत्यन्त गुप्त। विद्वानोंकी बुद्धिरूप गुफामें छिपी रहती है॥ १४॥
सम्बन्ध— इतना कहकर यमराजने—
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त-
मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः॥ १५॥
तम् लोकादिम्=उस स्वर्गलोककी कारणरूपा; अग्निम्=अग्निविद्याका; तस्मै उवाच=उस नचिकेताको उपदेश दिया; याः वा यावतीः=उसमें कुण्ड-निर्माण आदिके लिये जो-जो और जितनी; इष्टकाः=ईंटें आदि आवश्यक होती हैं; वा यथा=तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है (वे सब बातें भी बतायीं); च सः अपि=तथा उस नचिकेताने भी; तत् यथोक्तम्=वह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर; प्रत्यवदत्=यमराजको पुनः सुना दिया; अथ=उसके बाद; मृत्युः अस्य तुष्टः=यमराज उसपर संतुष्ट होकर; पुनः एव आह=फिर बोले—॥ १५॥
व्याख्या— उपर्युक्त प्रकारसे अग्निविद्याकी महत्ता और गोपनीयता बतलाकर यमराजने स्वर्गलोककी कारणरूपा अग्निविद्याका रहस्य नचिकेताको समझाया। अग्निके लिये कुण्ड-निर्माणादिमें किस आकारकी, कैसी और कितनी ईंटें चाहिये एवं अग्निका चयन किस प्रकार किया जाना चाहिये—यह सब भलीभाँति समझाया। तदनन्तर नचिकेताकी बुद्धि तथा स्मृतिकी परीक्षाके लिये यमराजने नचिकेतासे पूछा कि तुमने जो कुछ समझा हो, वह मुझे सुनाओ। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने सुनकर जैसा यथार्थ समझा था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यमराज उसकी विलक्षण स्मृति और प्रतिभाको देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले॥ १५॥
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८७
तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा
वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भवितायमग्निः
सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥
प्रीयमाणः=(उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर) प्रसन्न हुए; महात्मा=महात्मा यमराज; तम्=उस नचिकेतासे; अब्रवीत्=बोले; अद्य=अब मैं; तव=तुमको; इह=यहाँ; भूयः वरम्=पुनः यह (अतिरिक्त) वर; ददामि=देता हूँ कि; अयम् अग्निः=यह अग्निविद्या; तव एव नाम्ना=तुम्हारे ही नामसे; भविता=प्रसिद्ध होगी; च इमाम्=तथा इस; अनेकरूपाम् सृङ्काम्=अनेक रूपोंवाली रत्नोंकी मालाको भी; गृहाण=तुम स्वीकार करो॥ १६॥
**व्याख्या—**महात्मा यमराजने प्रसन्न होकर नचिकेतासे कहा—‘तुम्हारी अप्रतिम योग्यता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, इससे अब मैं तुम्हें एक वर और तुम्हारे बिना माँगे ही देता हूँ। वह यह कि यह अग्नि, जिसका मैंने तुमको उपदेश किया है, तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। और साथ ही यह लो, मैं तुम्हें तुम्हारे देवत्वकी सिद्धिके लिये यह अनेक रूपोंवाली विविध यज्ञ-विज्ञानरूपी रत्नोंकी माला देता हूँ। इसे स्वीकार करो॥ १६॥
**सम्बन्ध—**उस अग्निविद्याका फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं—
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं
त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा
निचाय्येमाःशान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥
त्रिणाचिकेतः=इस (अग्निका शास्त्रोक्त रीतिसे) तीन बार अनुष्ठान करनेवाला; त्रिभिः संधिम् एत्य=तीनों (ऋक्, साम, यजुर्वेद)-के साथ सम्बन्ध जोड़कर; त्रिकर्मकृत्=यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको निष्काम-भावसे करता रहनेवाला मनुष्य; जन्ममृत्यू तरति=जन्म-मृत्युसे तर जाता है; ब्रह्मजज्ञम्=(वह) ब्रह्मासे उत्पन्न
८८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
सृष्टिके जाननेवाले; ईड्यम् देवम्= स्तवनीय इस अग्निदेवको; विदित्वा= जानकर तथा; निचाय्य= इसका निष्कामभावसे चयन करके; इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति= इस अनन्त शान्तिको पा जाता है (जो मुझको प्राप्त है) ॥ १७॥
व्याख्या— इस अग्निका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला पुरुष ऋक्, यजुः, साम—तीनों वेदोंसे सम्बन्ध जोड़कर तीनों वेदोंके तत्त्व-रहस्यमें निष्णात होकर, निष्कामभावसे यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको करता हुआ जन्म-मृत्युसे तर जाता है। वह ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिको जाननेवाले स्तवनीय इस अग्निदेवको भलीभाँति जानकर इसका निष्कामभावसे चयन करके उस अनन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है, जो मुझको प्राप्त है॥ १७॥
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम्। स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥
एतत् त्रयम्= ईंटोंके स्वरूप, संख्या और अग्नि-चयन-विधि—इन तीनों बातोंको; विदित्वा= जानकर; त्रिणाचिकेतः= तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्याका अनुष्ठान करनेवाला तथा; यः एवम्= जो कोई भी इस प्रकार; विद्वान्= जाननेवाला पुरुष; नाचिकेतम्= इस नाचिकेत अग्निका; चिनुते= चयन करता है; सः मृत्युपाशान्= वह मृत्युके पाशको; पुरतः प्रणोद्य= अपने सामने ही (मनुष्य-शरीरमें ही) काटकर; शोकातिगः= शोकसे पार होकर; स्वर्गलोके मोदते= स्वर्गलोकमें आनन्दका अनुभव करता है॥ १८॥
व्याख्या— किस आकारकी कैसी ईंटें हों और कितनी संख्यामें हों एवं किस प्रकारसे अग्निका चयन किया जाय—इन तीनों बातोंको जानकर जो विद्वान् तीन बार नाचिकेत अग्निविद्याका निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है—अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पहले ही (जन्म) मृत्युके पाशको तोड़कर शोकरहित होकर अन्तमें स्वर्गलोकके (अविनाशी ऊर्ध्वलोकके) आनन्दका अनुभव करता है॥ १८॥
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८९
एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण। एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९॥
नचिकेतः=हे नचिकेता; एषः ते=यह तुम्हें बतलायी हुई; स्वर्ग्यः अग्निः=स्वर्ग प्रदान करनेवाली अग्निविद्या है; यम् द्वितीयेन वरेण अवृणीथाः=जिसको तुमने दूसरे वरसे माँगा था; एतम् अग्निम्=इस अग्निको (अबसे); जनासः=लोग; तव एव=तुम्हारे ही नामसे; प्रवक्ष्यन्ति=कहा करेंगे; नचिकेतः=हे नचिकेता; तृतीयम् वरम् वृणीष्व=(अब तुम) तीसरा वर माँगो॥ १९॥
**व्याख्या—**यमराज कहते हैं—नचिकेता! तुम्हें यह उसी स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याका उपदेश दिया गया है, जिसके लिये तुमने दूसरे वरमें याचना की थी। अबसे लोग तुम्हारे ही नामसे इस अग्निको पुकारा करेंगे। नचिकेता! अब तुम तीसरा वर माँगो॥ १९॥
**सम्बन्ध—**नचिकेता तीसरा वर माँगता है—
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥
प्रेते मनुष्ये=मरे हुए मनुष्यके विषयमें; या इयम्=जो यह; विचिकित्सा=संशय है; एके (आहुः) अयम् अस्ति इति=कोई तो यों कहते हैं कि मरनेके बाद यह आत्मा रहता है; च एके (आहुः) न अस्ति इति=और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता; त्वया अनुशिष्टः=आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ; अहम् एतत् विद्याम्=मैं इसका निर्णय भलीभाँति समझ लूँ; एषः वराणाम्=यही तीनों वरोंमेंसे; तृतीयः वरः=तीसरा वर है॥ २०॥
**व्याख्या—**इस लोकके कल्याणके लिये पिताकी संतुष्टिका वर और
९० ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
परलोकके लिये स्वर्गके साधनरूप अग्निविज्ञानका वर प्राप्त करके अब नचिकेता आत्माके यथार्थस्वरूप और उसकी प्राप्तिका उपाय जाननेके लिये यमराजके सामने दूसरे लोगोंके दो मत उपस्थित करके उसपर उनका अनुभूत विचार सुनना चाहता है। इसलिये नचिकेता कहता है कि भगवन्! मृत मनुष्यके सम्बन्धमें यह एक बड़ा संदेह फैला हुआ है। कुछ लोग तो कहते हैं कि मृत्युके बाद भी आत्माका अस्तित्व रहता है और कुछ लोग कहते हैं, नहीं रहता। इस विषयमें आपका जो अनुभव हो, वह मुझे बतलाइये।* आपके द्वारा उपदेश पाकर मैं इस रहस्यको भलीभाँति समझ लूँ। बस, तीनों वरोंमेंसे यही मेरा अभीष्ट तीसरा वर है॥ २० ॥
सम्बन्ध— नचिकेताका महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर यमराजने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा की। सोचा कि ऋषिकुमार बालक होनेपर भी बड़ा प्रतिभाशाली है, कैसे गोपनीय विषयको जानना चाहता है; परंतु आत्मतत्त्व उपयुक्त अधिकारीको ही बतलाना चाहिये। अनधिकारीके प्रति आत्मतत्त्वका उपदेश करना
* मृत्युके पश्चात् आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, इस सम्बन्धमें नचिकेताको स्वयं कोई संदेह नहीं है। पिताको दक्षिणामें जरा-जीर्ण गौएँ देते देखकर नचिकेताने स्पष्ट कहा था कि ऐसी गौओंका दान करनेवाले आनन्दरहित (अनन्दाः) नरकादि लोकोंको प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार दूसरे वरमें नचिकेताने स्वर्गसुखोंका वर्णन करके स्वर्गप्राप्तिके साधनरूप अग्निविद्याके उपदेशकी प्रार्थना की थी। इससे सिद्ध है कि वह स्वर्ग और नरकमें विश्वास करता था। स्वर्ग-नरकादि लोकोंकी प्राप्ति मरनेके पश्चात् ही होती है। आत्माका अस्तित्व न हो तो ये लोक किसको प्राप्त हों। यहाँ इसीलिये नचिकेताने अपना मत न बताकर कहा है कि कुछ लोग मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व मानते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। यह प्रश्नका एक ऐसा सुन्दर प्रकार है कि जिसके उत्तरमें आत्माकी नित्य सत्ता, उसके स्वरूप, गुण और परम लक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंका विवरण अपने-आप ही आ जाता है। अतः यह प्रश्न आत्मज्ञान-विषयक है, न कि आत्माके अस्तित्वमें संदेह-व्यञ्जक। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें नचिकेताका जो इतिहास मिलता है, उसमें तो नचिकेताने तीसरे वरमें पुनर्मृत्यु (जन्म-मृत्यु) पर विजय पानेका—मुक्तिका साधन जानना चाहा है (तृतीयं वृणीष्वेति। पुनर्मृत्योर्मेऽपचितिं ब्रूहि)।
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९१
हानिकर होता है, अतएव पहले पात्रपरीक्षाकी आवश्यकता है—यों विचारकर यमराजने इस तत्त्वकी कठिनताका वर्णन करके नचिकेताको टालना चाहा और कहा—
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा
न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥ २१॥
नचिकेतः=हे नचिकेता; अत्र पुरा=इस विषयमें पहले; देवैः अपि=देवताओंने भी; विचिकित्सितम्=संदेह किया था (परंतु उनकी भी समझमें नहीं आया); हि एषः धर्मः अणुः=क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है; न सुविज्ञेयम्=सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है (इसलिये); अन्यम् वरम् वृणीष्व=तुम दूसरा वर माँग लो; मा मा उपरोत्सीः=मुझपर दबाव मत डालो; एनम् मा=इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वरको मुझे; अतिसृज=लौटा दो॥ २१॥
**व्याख्या—**नचिकेता! यह आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म विषय है। इसका समझना सहज नहीं है। पहले देवताओंको भी इस विषयमें संदेह हुआ था। उनमें भी बहुत विचार-विनिमय हुआ था; परंतु वे भी इसको जान नहीं पाये। अतएव तुम दूसरा वर माँग लो। मैं तुम्हें तीन वर देनेका वचन दे चुका हूँ, अतएव तुम्हारा ऋणी हूँ; पर तुम इस वरके लिये, जैसे महाजन ऋणीको दबाता है वैसे मुझको मत दबाओ। इस आत्मतत्त्वविषयक वरको मुझे लौटा दो। इसको मेरे लिये छोड़ दो॥ २१॥
सम्बन्ध— नचिकेता आत्मतत्त्वकी कठिनताकी बात सुनकर तनिक भी घबराया नहीं, न उसका उत्साह ही मन्द हुआ; वरं उसने और भी दृढ़ताके साथ कहा—
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥ २२॥
९२ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
**मृत्यो=**हे यमराज; **त्वम् यत् आत्थ=**आपने जो यह कहा कि; **अत्र किल देवैः अपि=**सचमुच इस विषयपर देवताओंने भी; **विचिकित्सितम्=**विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये); **च न सुविज्ञेयम्=**और वह सुविज्ञेय भी नहीं है (इतना ही नहीं); **च=**इसके सिवा; **अस्य वक्ता=**इस विषयका कहनेवाला भी; **त्वादृक्=**आपके-जैसा; **अन्यः न लभ्यः=दूसरा नहीं मिल सकता; [अतः]=**इसलिये मेरी समझमें तो; **एतस्य तुल्यः=**इसके समान; **अन्यः कश्चित्=**दूसरा कोई भी; **वरः न=**वर नहीं है॥ २२॥
**व्याख्या—**हे मृत्यो! आप जो यह कहते हैं कि पूर्वकालमें देवताओंने भी जब इस विषयपर विचार-विनिमय किया था तथा वे भी इसे जान नहीं पाये थे और यह विषय सहज नहीं है, बड़ा ही सूक्ष्म है; तब यह तो सिद्ध ही है कि यह बड़े ही महत्त्वका विषय है और ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयको समझानेवाला आपके समान अनुभवी वक्ता मुझे ढूँढ़नेपर भी दूसरा कोई मिल नहीं सकता। आप कहते हैं इसे छोड़कर दूसरा वर माँग लो। परंतु मैं तो समझता हूँ कि इसकी तुलनाका दूसरा कोई वर है ही नहीं। अतएव कृपापूर्वक मुझे इसीका उपदेश कीजिये॥ २२॥
सम्बन्ध— विषयकी कठिनतासे नचिकेता नहीं घबराया, वह अपने निश्चयपर ज्यों-का-त्यों दृढ़ रहा। इस एक परीक्षामें वह उत्तीर्ण हो गया। अब यमराज दूसरी परीक्षाके रूपमें उसके सामने विभिन्न प्रकारके प्रलोभन रखनेकी बात सोचकर उससे कहने लगे—
शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्। भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि॥ २३॥
**शतायुषः=**सैकड़ों वर्षोंकी आयुवाले; **पुत्रपौत्रान्=**बेटे और पोतोंको (तथा); **बहून् पशून्=**बहुत-से गौ आदि पशुओंको (एवं); **हस्तिहिरण्यम्=**हाथी, सुवर्ण और; **अश्वान् वृणीष्व=**घोड़ोंको माँग लो; **भूमेः महत् आयतनम्=**भूमिके
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९३
बड़े विस्तारवाले मण्डल (साम्राज्य) को; वृणीष्व=माँग लो; स्वयम् च=तुम स्वयं भी; यावत् शरदः=जितने वर्षोंतक; इच्छसि=चाहो; जीव=जीते रहो ॥ २३ ॥
व्याख्या—नचिकेता ! तुम बड़े भोले हो, क्या करोगे इस वरको लेकर ? तुम ग्रहण करो इन सुखकी विशाल सामग्रियोंको। इस सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुत्र-पौत्रादि बड़े परिवारको माँग लो। गौ आदि बहुत-से उपयोगी पशु, हाथी, सुवर्ण, घोड़े और विशाल भूमण्डलके महान् साम्राज्यको माँग लो और इन सबको भोगनेके लिये जितने वर्षोंतक जीनेकी इच्छा हो, उतने ही वर्षोंतक जीते रहो ॥ २३ ॥
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥
नचिकेतः=हे नचिकेता; वित्तम् चिरजीविकाम्=धन, सम्पत्ति और अनन्तकालतक जीनेके साधनोंको; यदि त्वम्=यदि तुम; एतत्तुल्यम्=इस आत्मज्ञानविषयक वरदानके समान; वरम् मन्यसे वृणीष्व=वर मानते हो तो माँग लो; च महाभूमौ=और तुम इस पृथ्वीलोकमें; एधि=बड़े भारी सम्राट् बन जाओ; त्वा कामानाम्=(मैं) तुम्हें सम्पूर्ण भोगोंमेंसे; कामभाजम्=अति उत्तम भोगोंको भोगनेवाला; करोमि=बना देता हूँ॥ २४॥
व्याख्या—‘नचिकेता! यदि तुम प्रचुर धन-सम्पत्ति, दीर्घजीवनके लिये उपयोगी सुख-सामग्रियाँ अथवा और भी जितने भोग मनुष्य भोग सकता है, उन सबको मिलाकर उस आत्मतत्त्व-विषयक वरके समान समझते हो तो इन सबको माँग लो। तुम इस विशाल भूमिके सम्राट् बन जाओ। मैं तुम्हें समस्त भोगोंको इच्छानुसार भोगनेवाला बनाये देता हूँ।' इस प्रकार यहाँ यमराजने वाक्चातुर्यसे आत्मतत्त्वका महत्त्व बढ़ाते हुए नचिकेताको विशाल भोगोंका प्रलोभन दिया॥ २४॥
९४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
सम्बन्ध— इतनेपर भी नचिकेता अपने निश्चयपर अटल रहा, तब स्वर्गके दैवी भोगोंका प्रलोभन देते हुए यमराजने कहा—
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाँः श्छन्दतः प्रार्थयस्व। इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः। आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥ २५॥
ये ये कामाः = जो-जो भोग; मर्त्यलोके = मनुष्यलोकमें; दुर्लभाः = दुर्लभ हैं; सर्वान् कामान् = उन सम्पूर्ण भोगोंको; छन्दतः प्रार्थयस्व = इच्छानुसार माँग लो; सरथाः सतूर्याः इमाः रामाः = रथ और नाना प्रकारके बाजोंके सहित इन स्वर्गकी अप्सराओंको (अपने साथ ले जाओ); मनुष्यैः ईदृशाः = मनुष्योंको ऐसी स्त्रियाँ; न हि लम्भनीयाः = निःसंदेह अलभ्य हैं; मत्प्रत्ताभिः = मेरे द्वारा दी हुई; आभिः = इन स्त्रियोंसे; परिचारयस्व = तुम अपनी सेवा कराओ; नचिकेतः = हे नचिकेता; मरणम् = मरनेके बाद आत्माका क्या होता है; मा अनुप्राक्षीः = इस बातको मत पूछो॥ २५॥
व्याख्या— नचिकेता! जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छानुसार माँग लो। ये रथों और विविध प्रकारके वाद्योंसहित जो स्वर्गकी सुन्दरी रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियाँ मनुष्योंमें कहीं नहीं मिल सकतीं। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि इनके लिये ललचाते रहते हैं। मैं इन सबको तुम्हें सहज ही दे रहा हूँ। तुम इन्हें ले जाओ और इनसे अपनी सेवा कराओ; परंतु नचिकेता! आत्मतत्त्वविषयक प्रश्न मत पूछो॥ २५॥
सम्बन्ध— यमराज शिष्यपर स्वाभाविक ही दया करनेवाले महान् अनुभवी आचार्य हैं। इन्होंने अधिकारिपरीक्षाके साथ ही इस प्रकार भय और एकके बाद एक उत्तम भोगोंका प्रलोभन दिखाकर, जैसे खूँटेको हिला-हिलाकर दृढ़ किया जाता है, वैसे ही नचिकेताके वैराग्यसम्पन्न निश्चयको और भी दृढ़ किया। पहले
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९५
कठिनताका भय दिखाया, फिर इस लोकके एक-से-एक बढ़कर भोगोंके चित्र उसके सामने रखे और अन्तमें स्वर्गलोकमें भी उसका वैराग्य करा देनेके लिये स्वर्गके दैवी भोगोंका चित्र उपस्थित किया और कहा कि इनको यदि तुम अपने उस आत्मतत्त्वसम्बन्धी वरके समान समझते हो तो इन्हें माँग लो। परंतु नचिकेता तो दृढ़निश्चयी और सच्चा अधिकारी था। वह जानता था कि इस लोक और परलोकके बड़े-से-बड़े भोग-सुखकी आत्मज्ञानके सुखके किसी क्षुद्रतम अंशके साथ भी तुलना नहीं की जा सकती। अतएव उसने अपने निश्चयका युक्तिपूर्वक समर्थन करते हुए पूर्ण वैराग्ययुक्त वचनोंमें यमराजसे कहा—
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः। अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते॥ २६॥
अन्तक = हे यमराज! (जिनका आपने वर्णन किया, वे); श्वोभावाः = क्षणभङ्गुर भोग (और उनसे प्राप्त होनेवाले सुख); मर्त्यस्य = मनुष्यके; सर्वेन्द्रियाणाम् = अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका; यत् तेजः = जो तेज है; एतत् = उसको; जरयन्ति = क्षीण कर डालते हैं; अपि सर्वम् = इसके सिवा समस्त; जीवितम् = आयु (चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो); अल्पम् एव = अल्प ही है (इसलिये); तव वाहाः = ये आपके रथ आदि वाहन और; नृत्यगीते = ये अप्सराओंके नाच-गान; तव एव = आपके ही पास रहें (मुझे नहीं चाहिये) ॥ २६ ॥
व्याख्या—हे सबका अन्त करनेवाले यमराज! आपने जिन भोग्य वस्तुओंकी महिमाके पुल बाँधे हैं, वे सभी क्षणभङ्गुर हैं। कलतक रहेंगी या नहीं, इसमें भी संदेह है। इनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला सुख वास्तवमें सुख ही नहीं है, वह तो दुःख ही है (गीता ५। २२)। ये भोग्य वस्तुएँ कोई लाभ तो देती ही नहीं, वरं मनुष्यकी इन्द्रियोंके तेज और धर्मको हरण कर लेती हैं। आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है, वह भी अनन्तकालकी तुलनामें अत्यन्त अल्प ही है। जब ब्रह्मा आदि देवताओंका जीवन भी अल्पकालका है—एक दिन उन्हें भी मरना पड़ता है, तब औरोंकी तो बात
१६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
ही क्या है। अतएव मैं यह सब नहीं चाहता। ये आपके रथ, हाथी, घोड़े, ये रमणियों और इनके नाच-गान आप अपने ही पास रखें ॥ २६ ॥
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्षम् चेतु त्वा। जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥
मनुष्यः=मनुष्य; वित्तेन=धनसे; तर्पणीयः न=कभी भी तूस नहीं किया जा सकता है; चेतु=जब कि (हमने); त्वा अद्राक्षम्=आपके दर्शन पा लिये हैं (तब); वित्तम्=धनको; लप्स्यामहे=(तो हम) पा ही लेंगे; (और) त्वम् यावत्=आप जबतक; ईशिष्यसि=शासन करते रहेंगे (तबतक तो); जीविष्यामः=हम जीते ही रहेंगे (इन सबको भी क्या माँगना है अतः); मे वरणीयः वरः तु=मेरे माँगनेलायक वर तो; सः एव=वह (आत्मज्ञान) ही है ॥ २७ ॥
व्याख्या—आप जानते ही हैं, धनसे मनुष्य कभी तूस नहीं हो सकता। आगमें घी-ईंधन डालनेसे जैसे आग जोरोंसे भड़कती है, उसी प्रकार धन और भोगोंकी प्राप्तिसे भोग-कामनाका और भी विस्तार होता है। वहाँ तुसि कैसी। वहाँ तो दिन-रात अपूर्णता और अभावकी अग्रिमें ही जलना पड़ता है। ऐसे दुःखमय धन और भोगोंको कोई भी बुद्धिमान् पुरुष नहीं माँग सकता। मुझे अपने जीवननिर्वाहके लिये जितने धनकी आवश्यकता होगी, उतना तो आपके दर्शनसे अपने-आप प्राप्त हो जायगा। रही दीर्घ जीवनकी बात, सो जबतक मृत्युके पदपर आपका शासन है, तबतक मुझे मरनेका भी भय क्यों होने लगा। अतएव किसी भी दृष्टिसे दूसरा वर माँगना उचित नहीं मालूम होता। इसलिये मेरा प्रार्थनीय तो वह आत्मतत्त्वविषयक वर ही है। मैं उसे लौटा नहीं सकता ॥ २७ ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार भोगोंकी तुच्छताका वर्णन करके अब नचिकेता अपने वरका महत्त्व बतलाता हुआ उसीको प्रदान करनेके लिये दृढ़तापूर्वक निवेदन करता है—
बल्ली १ ]
कठोपनिषद्
१७
अजीर्यताममृतानामुपेत्य
जीर्यन् मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदा-
नतिदीर्घं जीविते को रमेत ॥ २८ ॥
जीर्यन् मर्त्यः=यह मनुष्य जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है; प्रजानन्=इस तत्त्वको भलीभाँति समझनेवाला; क्वधःस्थः=मनुष्यलोकका निवासी; कः=कौन (ऐसा) मनुष्य है (जो कि); अजीर्यताम्=बुढ़ापेसे रहित; अमृतानाम्=न मरनेवाले (आप-सदृश) महात्माओंका; उपेत्य=सङ्ग पाकर भी; वर्णरतिप्रमोदान्=(स्त्रियोंके) सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोदका; अभिध्यायन्=बार-बार चिन्तन करता हुआ; अतिदीर्घं=बहुत कालतक; जीविते=जीवित रहनेमें; रमेत=प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥
व्याख्या—हे यमराज! आप ही बताइये—भला, आप-सरीखे अजर-अमर महात्मा देवताओंका दुर्लभ एवं अमोघ सङ्ग प्राप्त करके मृत्युलोकका जरा-मरणशील ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा जो स्त्रियोंके सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोदमें आसक्त होकर उनकी ओर दृष्टिपात करेगा और इस लोकमें दीर्घकालतक जीवित रहनेमें आनन्द मानेगा ? ॥ २८ ॥
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥
मृत्यो=हे यमराज; यस्मिन्=जिस; महति साम्पराये=महान् आश्चर्यमय परलोकसम्बन्धी आत्मज्ञानके विषयमें; इदम् विचिकित्सन्ति=(लोग) यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरनेके बाद रहता है या नहीं; (तत्र) यत्=उसमें जो निर्णय है; तत् नः ब्रूहि=वह आप हमें बतलाइये; यः अयम्=जो यह; गूढम् अनुप्रविष्टः वरः=अत्यन्त गम्भीरताको प्राप्त हुआ वर है; तस्मात्=इससे; अन्यम्=दूसरा वर; नचिकेताः=नचिकेता; न वृणीते=नहीं माँगाता ॥ २९ ॥
१८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
व्याख्या—नचिकेता कहता है—‘हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्वसम्बन्धी महान् ज्ञानके विषयमें लोग यह शङ्का करते हैं कि मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, उसके सम्बन्धमें निर्णयात्मक जो आपका अनुभूत ज्ञान हो, मुझे कृपापूर्वक उसीका उपदेश कीजिये। यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर अत्यन्त गूढ़ है—यह सत्य है; पर आपका शिष्य यह नचिकेता इसके अतिरिक्त दूसरा कोई वर नहीं चाहता’ ॥ २९ ॥
॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय वल्ली
सम्बन्ध—इस प्रकार परीक्षा करके जब यमराजने समझ लिया कि नचिकेता दृढ़ निश्चयी, परम वैराग्यवान् एवं निर्भीक है, अतः ब्रह्मविद्याका उत्तम अधिकारी है तब ब्रह्मविद्याका उपदेश आरम्भ करनेके पहले उसका महत्त्व प्रकट करते हुए यमराज बोले—
| अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव | प्रेय- |
|---|---|
| स्ते उभे नानार्थे | पुरुषःसिनीतः। |
| तयोः श्रेय आददानस्य | साधु |
| भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ |
श्रेयः=कल्याणका साधन; अन्यत्=अलग है; उत्त=और; प्रेयः=प्रिय लगनेवाले भोगोंका साधन; अन्यत् एव=अलग ही है; ते=वे; नानार्थे=भिन्न-भिन्न फल देनेवाले; उभे=दोनों साधन; पुरुषम्=मनुष्यको; सिनीतः=बाँधते हैं—अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; श्रेयः=कल्याणके साधनको; आददानस्य=ग्रहण करनेवालेका; साधु भवति=कल्याण होता है; उ यः=परंतु जो; प्रेयः वृणीते=सांसारिक भोगोंके साधनको स्वीकार करता है; [सः=वह;] अर्थात्=यथार्थ लाभसे; हीयते=भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥
वल्ल्नी २ ]
कठोपनिषद्
१९
व्याख्या—मनुष्य-शरीर अन्यान्य योनियोंकी भाँति केवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही नहीं मिला है। इसमें मनुष्य भविष्यमें सुख देनेवाले साधनका अनुष्ठान भी कर सकता है। वेदोंमें सुखके साधन दो बताये गये हैं—(१) श्रेय अर्थात् सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर नित्य आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका उपाय और (२) प्रेय अर्थात् स्त्री, पुत्र, धन, मकान, सम्मान, यश आदि इहलोककी और स्वर्गलोककी जितनी भी प्राकृत सुखभोगकी सामग्रियाँ हैं, उनकी प्राप्तिका उपाय। इस प्रकार अपने-अपने ढंगसे मनुष्यको सुख पहुँचा सकनेवाले ये दोनों साधन मनुष्यको बाँधते हैं—उसे अपनी-अपनी ओर खींचते हैं। अधिकांश लोग तो 'भोगोंमें प्रत्यक्ष और तत्काल सुख मिलता है' इस प्रतीतिके कारण, उसका परिणाम सोचे-समझे बिना ही प्रेयकी ओर खिंच जाते हैं; परंतु कोई-कोई भाग्यवान् मनुष्य भगवान्की दयासे प्राकृत भोगोंकी आपातरमणीयता एवं परिणामदुःखताका रहस्य जानकर उनकी ओरसे विरक्त हो श्रेयकी ओर आकर्षित हो जाता है। इन दोनों प्रकारके मनुष्योंमेंसे जो भगवान्की कृपाका पात्र होकर श्रेयको अपना लेता है और तत्परताके साथ उसके साधनमें लग जाता है, उसका तो सब प्रकारसे कल्याण हो जाता है। वह सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर अनन्त असीम आनन्दस्वरूप परमात्माको पा लेता है। परंतु जो सांसारिक सुखके साधनोंमें लग जाता है, वह अपने मानव-जीवनके परम लक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिरूप यथार्थ प्रयोजनको सिद्ध नहीं कर पाता, इसलिये उसे आत्यन्तिक और नित्य सुख नहीं मिलता। उसे तो भ्रमवश सुखरूप प्रतीत होनेवाले वे अनित्य भोग मिलते हैं, जो वास्तवमें दुःखरूप ही हैं। अतः वह वास्तविक सुखसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत- स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ २ ॥
१००
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
श्रेयः च प्रेयः च=श्रेय और प्रेय—ये दोनों ही; मनुष्यम् एतः=मनुष्यके सामने आते हैं; धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य; तौ=उन दोनोंके स्वरूपपर; सम्परीत्य=भलीभाँति विचार करके; विविनक्ति=उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है; (और) धीरः=वह श्रेष्ठबुद्धिमनुष्य; श्रेयः हि=परम कल्याणके साधनको ही; प्रेयसः=भोग-साधनकी अपेक्षा; अभिवृणीते=श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है (परंतु); मन्दः=मन्दबुद्धिवाला मनुष्य; योगक्षेमात्=लौकिक योगक्षेमकी इच्छासे; प्रेयः वृणीते=भोगोंके साधनरूप प्रेयको अपनाता है ॥ २ ॥
व्याख्या —अधिकांश मनुष्य तो पुनर्जन्ममें विश्वास न होनेके कारण इस विषयमें विचार ही नहीं करते, वे भोगोंमें आसक्त होकर अपने देवदुर्लभ मनुष्य-जीवनको पशुवत् भोगोंके भोगनेमें ही समाप्त कर देते हैं। किंतु जिनका पुनर्जन्ममें और परलोकमें विश्वास है, उन विचारशील मनुष्योंके सामने जब ये श्रेय और प्रेय दोनों आते हैं, तब वे इन दोनोंके गुण-दोषोंपर विचार करके दोनोंको पृथक्-पृथक् समझनेकी चेष्टा करते हैं। इनमें जो श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न होता है, वह तो दोनोंके तत्त्वको पूर्णतया समझकर नीरक्षीर-विवेकी हंसकी तरह प्रेयकी उपेक्षा करके श्रेयको ही ग्रहण करता है। परंतु जो मनुष्य अल्पबुद्धि है, जिसकी बुद्धिमें विवेक-शक्तिका अभाव है, वह श्रेयके फलमें अविश्वास करके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले लौकिक योगक्षेमकी सिद्धिके लिये प्रेयको अपनाता है, वह इतना ही समझता है कि जो कुछ भोगपदार्थ प्राप्त हैं, वे सुरक्षित बने रहें और जो अप्राप्त हैं, वे प्रचुर मात्रामें मिल जायें। यही योगक्षेम है ॥ २ ॥
सम्बन्ध —परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप श्रेयकी प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्योंसे निचेकेताकी विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्यकी प्रशंसा करते हैं—
स त्वं प्रियान् प्रियरूपाः श्रु कामा- नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्त्राक्षीः । नैताः सृष्ट्वां वित्तमयीमवासे यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥
वल्ल्बी २ ]
कठोपनिषद्
१०१
नचिकेतः=हे नचिकेता! (उन्हीं मनुष्योंमें); सः त्वम्=तुम (ऐसे निःस्पृह हो कि); प्रियान् च=प्रिय लगनेवाले और; प्रियरूपान्=अत्यन्त सुन्दर रूपवाले; कामान्=इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको; अभिध्यायन्=भलीभाँति सोच-समझकर; अत्यन्तस्वाक्षीः=(तुमने) छोड़ दिया; एताम् वित्तमयीम् सुद्वाम्= इस सम्पत्तिरूप शृङ्खला (बेड़ी) को; न अवाप्तः=(तुम) नहीं प्राप्त हुए (इसके बन्धनमें नहीं फँसे); यस्याम्=जिसमें; बहवः मनुष्याः=बहुत-से मनुष्य; मज्जन्ति=फँस जाते हैं ॥ ३ ॥
व्याख्या—यमराज कहते हैं—‘हे नचिकेता! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बड़े बुद्धिमान्, विवेकी तथा वैराग्यसम्पन्न हो। अपनेको बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक माननेवाले लोग भी जिस चमक-दमकवाली सम्पत्तिके मोहजालमें फँस जाया करते हैं, उसे भी तुमने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषामें तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौएँ, धन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगोंका प्रलोभन दिया; इतना ही नहीं, स्वर्गके दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियोंके चिर-भोगसुखका लालच दिया; परंतु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्वका श्रवण करनेके सर्वोत्तम अधिकारी हो ॥ ३ ॥
दूरमेते विपरीते विपूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥
या अविद्या=जो कि अविद्या; च विद्या इति ज्ञाता=और विद्या नामसे विख्यात हैं; एते=ये दोनों; दूरम् विपरीते=परस्पर अत्यन्त विपरीत; (और) विपूची=भिन्न-भिन्न फल देनेवाली हैं; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताको; विद्याभीप्सिनम्
१०२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
मन्ये=मैं विद्याका ही अभिलाषी मानता हूँ (क्योंकि); त्वा बहवः कामाः=तुमको बहुत-से भोग; न अलोल्पन्त=(किसी प्रकार भी) नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥
व्याख्या—ये अविद्या और विद्या नामसे प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देनेवाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगोंमें आसक्ति है, वह कल्याण-साधनमें आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याणमार्गका पथिक है, वह भोगोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता। वह सब प्रकारके भोगोंको दुःखरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता! मैं मानता हूँ कि तुम विद्याके ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मनमें किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥
अविद्यायामन्तरे
वर्तमानाः
स्वयं
धीराः
पण्डितमन्यमानाः।
दन्द्रम्यमाणाः
परियन्ति
मूढा
अन्धेनैव
नीयमाना
यथान्धाः * ॥ ५ ॥
अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमानाः=अविद्याके भीतर रहते हुए (भी); स्वयं धीराः=अपने-आपको बुद्धिमान् (और); पण्डितम् मन्यमानाः=विद्वान् माननेवाले; मूढाः=(भोगकी इच्छा करनेवाले) वे मूर्खलोग; दन्द्रम्यमाणाः= नाना योनियोंमें चारों ओर भटकते हुए; (तथा) परियन्ति=ठीक वैसे ही ठोकरें खाते रहते हैं; यथा=जैसे; अन्धेन एव नीयमानाः=अन्धे मनुष्यके द्वारा चलाये जानेवाले; अन्धाः=अन्धे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥ ५ ॥
व्याख्या—जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं पहुँच पाता, बीचमें ही ठोकरें खाता भटकता है और कॉट-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गड़ढे आदिमें
*यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद्में भी आया है। (मु० ३० १।२।८)