भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९३

बड़े विस्तारवाले मण्डल (साम्राज्य) को; वृणीष्व=माँग लो; स्वयम् च=तुम स्वयं भी; यावत् शरदः=जितने वर्षोंतक; इच्छसि=चाहो; जीव=जीते रहो ॥ २३ ॥

व्याख्या—नचिकेता ! तुम बड़े भोले हो, क्या करोगे इस वरको लेकर ? तुम ग्रहण करो इन सुखकी विशाल सामग्रियोंको। इस सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुत्र-पौत्रादि बड़े परिवारको माँग लो। गौ आदि बहुत-से उपयोगी पशु, हाथी, सुवर्ण, घोड़े और विशाल भूमण्डलके महान् साम्राज्यको माँग लो और इन सबको भोगनेके लिये जितने वर्षोंतक जीनेकी इच्छा हो, उतने ही वर्षोंतक जीते रहो ॥ २३ ॥

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥

नचिकेतः=हे नचिकेता; वित्तम् चिरजीविकाम्=धन, सम्पत्ति और अनन्तकालतक जीनेके साधनोंको; यदि त्वम्=यदि तुम; एतत्तुल्यम्=इस आत्मज्ञानविषयक वरदानके समान; वरम् मन्यसे वृणीष्व=वर मानते हो तो माँग लो; च महाभूमौ=और तुम इस पृथ्वीलोकमें; एधि=बड़े भारी सम्राट् बन जाओ; त्वा कामानाम्=(मैं) तुम्हें सम्पूर्ण भोगोंमेंसे; कामभाजम्=अति उत्तम भोगोंको भोगनेवाला; करोमि=बना देता हूँ॥ २४॥

व्याख्या—‘नचिकेता! यदि तुम प्रचुर धन-सम्पत्ति, दीर्घजीवनके लिये उपयोगी सुख-सामग्रियाँ अथवा और भी जितने भोग मनुष्य भोग सकता है, उन सबको मिलाकर उस आत्मतत्त्व-विषयक वरके समान समझते हो तो इन सबको माँग लो। तुम इस विशाल भूमिके सम्राट् बन जाओ। मैं तुम्हें समस्त भोगोंको इच्छानुसार भोगनेवाला बनाये देता हूँ।' इस प्रकार यहाँ यमराजने वाक्चातुर्यसे आत्मतत्त्वका महत्त्व बढ़ाते हुए नचिकेताको विशाल भोगोंका प्रलोभन दिया॥ २४॥