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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९३

बड़े विस्तारवाले मण्डल (साम्राज्य) को; वृणीष्व=माँग लो; स्वयम् च=तुम स्वयं भी; यावत् शरदः=जितने वर्षोंतक; इच्छसि=चाहो; जीव=जीते रहो ॥ २३ ॥

व्याख्या—नचिकेता ! तुम बड़े भोले हो, क्या करोगे इस वरको लेकर ? तुम ग्रहण करो इन सुखकी विशाल सामग्रियोंको। इस सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुत्र-पौत्रादि बड़े परिवारको माँग लो। गौ आदि बहुत-से उपयोगी पशु, हाथी, सुवर्ण, घोड़े और विशाल भूमण्डलके महान् साम्राज्यको माँग लो और इन सबको भोगनेके लिये जितने वर्षोंतक जीनेकी इच्छा हो, उतने ही वर्षोंतक जीते रहो ॥ २३ ॥

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥

नचिकेतः=हे नचिकेता; वित्तम् चिरजीविकाम्=धन, सम्पत्ति और अनन्तकालतक जीनेके साधनोंको; यदि त्वम्=यदि तुम; एतत्तुल्यम्=इस आत्मज्ञानविषयक वरदानके समान; वरम् मन्यसे वृणीष्व=वर मानते हो तो माँग लो; च महाभूमौ=और तुम इस पृथ्वीलोकमें; एधि=बड़े भारी सम्राट् बन जाओ; त्वा कामानाम्=(मैं) तुम्हें सम्पूर्ण भोगोंमेंसे; कामभाजम्=अति उत्तम भोगोंको भोगनेवाला; करोमि=बना देता हूँ॥ २४॥

व्याख्या—‘नचिकेता! यदि तुम प्रचुर धन-सम्पत्ति, दीर्घजीवनके लिये उपयोगी सुख-सामग्रियाँ अथवा और भी जितने भोग मनुष्य भोग सकता है, उन सबको मिलाकर उस आत्मतत्त्व-विषयक वरके समान समझते हो तो इन सबको माँग लो। तुम इस विशाल भूमिके सम्राट् बन जाओ। मैं तुम्हें समस्त भोगोंको इच्छानुसार भोगनेवाला बनाये देता हूँ।' इस प्रकार यहाँ यमराजने वाक्चातुर्यसे आत्मतत्त्वका महत्त्व बढ़ाते हुए नचिकेताको विशाल भोगोंका प्रलोभन दिया॥ २४॥

९४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

सम्बन्ध— इतनेपर भी नचिकेता अपने निश्चयपर अटल रहा, तब स्वर्गके दैवी भोगोंका प्रलोभन देते हुए यमराजने कहा—

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाँः श्छन्दतः प्रार्थयस्व। इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः। आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥ २५॥

ये ये कामाः = जो-जो भोग; मर्त्यलोके = मनुष्यलोकमें; दुर्लभाः = दुर्लभ हैं; सर्वान् कामान् = उन सम्पूर्ण भोगोंको; छन्दतः प्रार्थयस्व = इच्छानुसार माँग लो; सरथाः सतूर्याः इमाः रामाः = रथ और नाना प्रकारके बाजोंके सहित इन स्वर्गकी अप्सराओंको (अपने साथ ले जाओ); मनुष्यैः ईदृशाः = मनुष्योंको ऐसी स्त्रियाँ; न हि लम्भनीयाः = निःसंदेह अलभ्य हैं; मत्प्रत्ताभिः = मेरे द्वारा दी हुई; आभिः = इन स्त्रियोंसे; परिचारयस्व = तुम अपनी सेवा कराओ; नचिकेतः = हे नचिकेता; मरणम् = मरनेके बाद आत्माका क्या होता है; मा अनुप्राक्षीः = इस बातको मत पूछो॥ २५॥

व्याख्या— नचिकेता! जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छानुसार माँग लो। ये रथों और विविध प्रकारके वाद्योंसहित जो स्वर्गकी सुन्दरी रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियाँ मनुष्योंमें कहीं नहीं मिल सकतीं। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि इनके लिये ललचाते रहते हैं। मैं इन सबको तुम्हें सहज ही दे रहा हूँ। तुम इन्हें ले जाओ और इनसे अपनी सेवा कराओ; परंतु नचिकेता! आत्मतत्त्वविषयक प्रश्न मत पूछो॥ २५॥

सम्बन्ध— यमराज शिष्यपर स्वाभाविक ही दया करनेवाले महान् अनुभवी आचार्य हैं। इन्होंने अधिकारिपरीक्षाके साथ ही इस प्रकार भय और एकके बाद एक उत्तम भोगोंका प्रलोभन दिखाकर, जैसे खूँटेको हिला-हिलाकर दृढ़ किया जाता है, वैसे ही नचिकेताके वैराग्यसम्पन्न निश्चयको और भी दृढ़ किया। पहले

वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९५

कठिनताका भय दिखाया, फिर इस लोकके एक-से-एक बढ़कर भोगोंके चित्र उसके सामने रखे और अन्तमें स्वर्गलोकमें भी उसका वैराग्य करा देनेके लिये स्वर्गके दैवी भोगोंका चित्र उपस्थित किया और कहा कि इनको यदि तुम अपने उस आत्मतत्त्वसम्बन्धी वरके समान समझते हो तो इन्हें माँग लो। परंतु नचिकेता तो दृढ़निश्चयी और सच्चा अधिकारी था। वह जानता था कि इस लोक और परलोकके बड़े-से-बड़े भोग-सुखकी आत्मज्ञानके सुखके किसी क्षुद्रतम अंशके साथ भी तुलना नहीं की जा सकती। अतएव उसने अपने निश्चयका युक्तिपूर्वक समर्थन करते हुए पूर्ण वैराग्ययुक्त वचनोंमें यमराजसे कहा—

श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः। अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते॥ २६॥

अन्तक = हे यमराज! (जिनका आपने वर्णन किया, वे); श्वोभावाः = क्षणभङ्गुर भोग (और उनसे प्राप्त होनेवाले सुख); मर्त्यस्य = मनुष्यके; सर्वेन्द्रियाणाम् = अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका; यत् तेजः = जो तेज है; एतत् = उसको; जरयन्ति = क्षीण कर डालते हैं; अपि सर्वम् = इसके सिवा समस्त; जीवितम् = आयु (चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो); अल्पम् एव = अल्प ही है (इसलिये); तव वाहाः = ये आपके रथ आदि वाहन और; नृत्यगीते = ये अप्सराओंके नाच-गान; तव एव = आपके ही पास रहें (मुझे नहीं चाहिये) ॥ २६ ॥

व्याख्या—हे सबका अन्त करनेवाले यमराज! आपने जिन भोग्य वस्तुओंकी महिमाके पुल बाँधे हैं, वे सभी क्षणभङ्गुर हैं। कलतक रहेंगी या नहीं, इसमें भी संदेह है। इनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला सुख वास्तवमें सुख ही नहीं है, वह तो दुःख ही है (गीता ५। २२)। ये भोग्य वस्तुएँ कोई लाभ तो देती ही नहीं, वरं मनुष्यकी इन्द्रियोंके तेज और धर्मको हरण कर लेती हैं। आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है, वह भी अनन्तकालकी तुलनामें अत्यन्त अल्प ही है। जब ब्रह्मा आदि देवताओंका जीवन भी अल्पकालका है—एक दिन उन्हें भी मरना पड़ता है, तब औरोंकी तो बात

१६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

ही क्या है। अतएव मैं यह सब नहीं चाहता। ये आपके रथ, हाथी, घोड़े, ये रमणियों और इनके नाच-गान आप अपने ही पास रखें ॥ २६ ॥

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्षम् चेतु त्वा। जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥

मनुष्यः=मनुष्य; वित्तेन=धनसे; तर्पणीयः न=कभी भी तूस नहीं किया जा सकता है; चेतु=जब कि (हमने); त्वा अद्राक्षम्=आपके दर्शन पा लिये हैं (तब); वित्तम्=धनको; लप्स्यामहे=(तो हम) पा ही लेंगे; (और) त्वम् यावत्=आप जबतक; ईशिष्यसि=शासन करते रहेंगे (तबतक तो); जीविष्यामः=हम जीते ही रहेंगे (इन सबको भी क्या माँगना है अतः); मे वरणीयः वरः तु=मेरे माँगनेलायक वर तो; सः एव=वह (आत्मज्ञान) ही है ॥ २७ ॥

व्याख्या—आप जानते ही हैं, धनसे मनुष्य कभी तूस नहीं हो सकता। आगमें घी-ईंधन डालनेसे जैसे आग जोरोंसे भड़कती है, उसी प्रकार धन और भोगोंकी प्राप्तिसे भोग-कामनाका और भी विस्तार होता है। वहाँ तुसि कैसी। वहाँ तो दिन-रात अपूर्णता और अभावकी अग्रिमें ही जलना पड़ता है। ऐसे दुःखमय धन और भोगोंको कोई भी बुद्धिमान् पुरुष नहीं माँग सकता। मुझे अपने जीवननिर्वाहके लिये जितने धनकी आवश्यकता होगी, उतना तो आपके दर्शनसे अपने-आप प्राप्त हो जायगा। रही दीर्घ जीवनकी बात, सो जबतक मृत्युके पदपर आपका शासन है, तबतक मुझे मरनेका भी भय क्यों होने लगा। अतएव किसी भी दृष्टिसे दूसरा वर माँगना उचित नहीं मालूम होता। इसलिये मेरा प्रार्थनीय तो वह आत्मतत्त्वविषयक वर ही है। मैं उसे लौटा नहीं सकता ॥ २७ ॥

सम्बन्ध—इस प्रकार भोगोंकी तुच्छताका वर्णन करके अब नचिकेता अपने वरका महत्त्व बतलाता हुआ उसीको प्रदान करनेके लिये दृढ़तापूर्वक निवेदन करता है—

बल्ली १ ]

कठोपनिषद्

१७

अजीर्यताममृतानामुपेत्य

जीर्यन् मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।

अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदा-

नतिदीर्घं जीविते को रमेत ॥ २८ ॥

जीर्यन् मर्त्यः=यह मनुष्य जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है; प्रजानन्=इस तत्त्वको भलीभाँति समझनेवाला; क्वधःस्थः=मनुष्यलोकका निवासी; कः=कौन (ऐसा) मनुष्य है (जो कि); अजीर्यताम्=बुढ़ापेसे रहित; अमृतानाम्=न मरनेवाले (आप-सदृश) महात्माओंका; उपेत्य=सङ्ग पाकर भी; वर्णरतिप्रमोदान्=(स्त्रियोंके) सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोदका; अभिध्यायन्=बार-बार चिन्तन करता हुआ; अतिदीर्घं=बहुत कालतक; जीविते=जीवित रहनेमें; रमेत=प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥

व्याख्या—हे यमराज! आप ही बताइये—भला, आप-सरीखे अजर-अमर महात्मा देवताओंका दुर्लभ एवं अमोघ सङ्ग प्राप्त करके मृत्युलोकका जरा-मरणशील ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा जो स्त्रियोंके सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोदमें आसक्त होकर उनकी ओर दृष्टिपात करेगा और इस लोकमें दीर्घकालतक जीवित रहनेमें आनन्द मानेगा ? ॥ २८ ॥

यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो

यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।

योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो

नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥

मृत्यो=हे यमराज; यस्मिन्=जिस; महति साम्पराये=महान् आश्चर्यमय परलोकसम्बन्धी आत्मज्ञानके विषयमें; इदम् विचिकित्सन्ति=(लोग) यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरनेके बाद रहता है या नहीं; (तत्र) यत्=उसमें जो निर्णय है; तत् नः ब्रूहि=वह आप हमें बतलाइये; यः अयम्=जो यह; गूढम् अनुप्रविष्टः वरः=अत्यन्त गम्भीरताको प्राप्त हुआ वर है; तस्मात्=इससे; अन्यम्=दूसरा वर; नचिकेताः=नचिकेता; न वृणीते=नहीं माँगाता ॥ २९ ॥

१८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

व्याख्या—नचिकेता कहता है—‘हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्वसम्बन्धी महान् ज्ञानके विषयमें लोग यह शङ्का करते हैं कि मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, उसके सम्बन्धमें निर्णयात्मक जो आपका अनुभूत ज्ञान हो, मुझे कृपापूर्वक उसीका उपदेश कीजिये। यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर अत्यन्त गूढ़ है—यह सत्य है; पर आपका शिष्य यह नचिकेता इसके अतिरिक्त दूसरा कोई वर नहीं चाहता’ ॥ २९ ॥

॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय वल्ली

सम्बन्ध—इस प्रकार परीक्षा करके जब यमराजने समझ लिया कि नचिकेता दृढ़ निश्चयी, परम वैराग्यवान् एवं निर्भीक है, अतः ब्रह्मविद्याका उत्तम अधिकारी है तब ब्रह्मविद्याका उपदेश आरम्भ करनेके पहले उसका महत्त्व प्रकट करते हुए यमराज बोले—

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैवप्रेय-
स्ते उभे नानार्थेपुरुषःसिनीतः।
तयोः श्रेय आददानस्यसाधु
भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥

श्रेयः=कल्याणका साधन; अन्यत्=अलग है; उत्त=और; प्रेयः=प्रिय लगनेवाले भोगोंका साधन; अन्यत् एव=अलग ही है; ते=वे; नानार्थे=भिन्न-भिन्न फल देनेवाले; उभे=दोनों साधन; पुरुषम्=मनुष्यको; सिनीतः=बाँधते हैं—अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; श्रेयः=कल्याणके साधनको; आददानस्य=ग्रहण करनेवालेका; साधु भवति=कल्याण होता है; उ यः=परंतु जो; प्रेयः वृणीते=सांसारिक भोगोंके साधनको स्वीकार करता है; [सः=वह;] अर्थात्=यथार्थ लाभसे; हीयते=भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥

वल्ल्नी २ ]

कठोपनिषद्

१९

व्याख्या—मनुष्य-शरीर अन्यान्य योनियोंकी भाँति केवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही नहीं मिला है। इसमें मनुष्य भविष्यमें सुख देनेवाले साधनका अनुष्ठान भी कर सकता है। वेदोंमें सुखके साधन दो बताये गये हैं—(१) श्रेय अर्थात् सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर नित्य आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका उपाय और (२) प्रेय अर्थात् स्त्री, पुत्र, धन, मकान, सम्मान, यश आदि इहलोककी और स्वर्गलोककी जितनी भी प्राकृत सुखभोगकी सामग्रियाँ हैं, उनकी प्राप्तिका उपाय। इस प्रकार अपने-अपने ढंगसे मनुष्यको सुख पहुँचा सकनेवाले ये दोनों साधन मनुष्यको बाँधते हैं—उसे अपनी-अपनी ओर खींचते हैं। अधिकांश लोग तो 'भोगोंमें प्रत्यक्ष और तत्काल सुख मिलता है' इस प्रतीतिके कारण, उसका परिणाम सोचे-समझे बिना ही प्रेयकी ओर खिंच जाते हैं; परंतु कोई-कोई भाग्यवान् मनुष्य भगवान्की दयासे प्राकृत भोगोंकी आपातरमणीयता एवं परिणामदुःखताका रहस्य जानकर उनकी ओरसे विरक्त हो श्रेयकी ओर आकर्षित हो जाता है। इन दोनों प्रकारके मनुष्योंमेंसे जो भगवान्की कृपाका पात्र होकर श्रेयको अपना लेता है और तत्परताके साथ उसके साधनमें लग जाता है, उसका तो सब प्रकारसे कल्याण हो जाता है। वह सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर अनन्त असीम आनन्दस्वरूप परमात्माको पा लेता है। परंतु जो सांसारिक सुखके साधनोंमें लग जाता है, वह अपने मानव-जीवनके परम लक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिरूप यथार्थ प्रयोजनको सिद्ध नहीं कर पाता, इसलिये उसे आत्यन्तिक और नित्य सुख नहीं मिलता। उसे तो भ्रमवश सुखरूप प्रतीत होनेवाले वे अनित्य भोग मिलते हैं, जो वास्तवमें दुःखरूप ही हैं। अतः वह वास्तविक सुखसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत- स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।

श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ २ ॥

१००

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

श्रेयः च प्रेयः च=श्रेय और प्रेय—ये दोनों ही; मनुष्यम् एतः=मनुष्यके सामने आते हैं; धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य; तौ=उन दोनोंके स्वरूपपर; सम्परीत्य=भलीभाँति विचार करके; विविनक्ति=उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है; (और) धीरः=वह श्रेष्ठबुद्धिमनुष्य; श्रेयः हि=परम कल्याणके साधनको ही; प्रेयसः=भोग-साधनकी अपेक्षा; अभिवृणीते=श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है (परंतु); मन्दः=मन्दबुद्धिवाला मनुष्य; योगक्षेमात्=लौकिक योगक्षेमकी इच्छासे; प्रेयः वृणीते=भोगोंके साधनरूप प्रेयको अपनाता है ॥ २ ॥

व्याख्या —अधिकांश मनुष्य तो पुनर्जन्ममें विश्वास न होनेके कारण इस विषयमें विचार ही नहीं करते, वे भोगोंमें आसक्त होकर अपने देवदुर्लभ मनुष्य-जीवनको पशुवत् भोगोंके भोगनेमें ही समाप्त कर देते हैं। किंतु जिनका पुनर्जन्ममें और परलोकमें विश्वास है, उन विचारशील मनुष्योंके सामने जब ये श्रेय और प्रेय दोनों आते हैं, तब वे इन दोनोंके गुण-दोषोंपर विचार करके दोनोंको पृथक्-पृथक् समझनेकी चेष्टा करते हैं। इनमें जो श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न होता है, वह तो दोनोंके तत्त्वको पूर्णतया समझकर नीरक्षीर-विवेकी हंसकी तरह प्रेयकी उपेक्षा करके श्रेयको ही ग्रहण करता है। परंतु जो मनुष्य अल्पबुद्धि है, जिसकी बुद्धिमें विवेक-शक्तिका अभाव है, वह श्रेयके फलमें अविश्वास करके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले लौकिक योगक्षेमकी सिद्धिके लिये प्रेयको अपनाता है, वह इतना ही समझता है कि जो कुछ भोगपदार्थ प्राप्त हैं, वे सुरक्षित बने रहें और जो अप्राप्त हैं, वे प्रचुर मात्रामें मिल जायें। यही योगक्षेम है ॥ २ ॥

सम्बन्ध —परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप श्रेयकी प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्योंसे निचेकेताकी विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्यकी प्रशंसा करते हैं—

स त्वं प्रियान् प्रियरूपाः श्रु कामा- नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्त्राक्षीः । नैताः सृष्ट्वां वित्तमयीमवासे यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥

वल्ल्बी २ ]

कठोपनिषद्

१०१

नचिकेतः=हे नचिकेता! (उन्हीं मनुष्योंमें); सः त्वम्=तुम (ऐसे निःस्पृह हो कि); प्रियान् च=प्रिय लगनेवाले और; प्रियरूपान्=अत्यन्त सुन्दर रूपवाले; कामान्=इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको; अभिध्यायन्=भलीभाँति सोच-समझकर; अत्यन्तस्वाक्षीः=(तुमने) छोड़ दिया; एताम् वित्तमयीम् सुद्वाम्= इस सम्पत्तिरूप शृङ्खला (बेड़ी) को; न अवाप्तः=(तुम) नहीं प्राप्त हुए (इसके बन्धनमें नहीं फँसे); यस्याम्=जिसमें; बहवः मनुष्याः=बहुत-से मनुष्य; मज्जन्ति=फँस जाते हैं ॥ ३ ॥

व्याख्या—यमराज कहते हैं—‘हे नचिकेता! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बड़े बुद्धिमान्, विवेकी तथा वैराग्यसम्पन्न हो। अपनेको बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक माननेवाले लोग भी जिस चमक-दमकवाली सम्पत्तिके मोहजालमें फँस जाया करते हैं, उसे भी तुमने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषामें तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौएँ, धन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगोंका प्रलोभन दिया; इतना ही नहीं, स्वर्गके दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियोंके चिर-भोगसुखका लालच दिया; परंतु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्वका श्रवण करनेके सर्वोत्तम अधिकारी हो ॥ ३ ॥

दूरमेते विपरीते विपूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥

या अविद्या=जो कि अविद्या; च विद्या इति ज्ञाता=और विद्या नामसे विख्यात हैं; एते=ये दोनों; दूरम् विपरीते=परस्पर अत्यन्त विपरीत; (और) विपूची=भिन्न-भिन्न फल देनेवाली हैं; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताको; विद्याभीप्सिनम्

१०२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

मन्ये=मैं विद्याका ही अभिलाषी मानता हूँ (क्योंकि); त्वा बहवः कामाः=तुमको बहुत-से भोग; न अलोल्पन्त=(किसी प्रकार भी) नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥

व्याख्या—ये अविद्या और विद्या नामसे प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देनेवाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगोंमें आसक्ति है, वह कल्याण-साधनमें आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याणमार्गका पथिक है, वह भोगोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता। वह सब प्रकारके भोगोंको दुःखरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता! मैं मानता हूँ कि तुम विद्याके ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मनमें किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥

अविद्यायामन्तरे

वर्तमानाः

स्वयं

धीराः

पण्डितमन्यमानाः।

दन्द्रम्यमाणाः

परियन्ति

मूढा

अन्धेनैव

नीयमाना

यथान्धाः * ॥ ५ ॥

अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमानाः=अविद्याके भीतर रहते हुए (भी); स्वयं धीराः=अपने-आपको बुद्धिमान् (और); पण्डितम् मन्यमानाः=विद्वान् माननेवाले; मूढाः=(भोगकी इच्छा करनेवाले) वे मूर्खलोग; दन्द्रम्यमाणाः= नाना योनियोंमें चारों ओर भटकते हुए; (तथा) परियन्ति=ठीक वैसे ही ठोकरें खाते रहते हैं; यथा=जैसे; अन्धेन एव नीयमानाः=अन्धे मनुष्यके द्वारा चलाये जानेवाले; अन्धाः=अन्धे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥ ५ ॥

व्याख्या—जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं पहुँच पाता, बीचमें ही ठोकरें खाता भटकता है और कॉट-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गड़ढे आदिमें

*यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद्में भी आया है। (मु० ३० १।२।८)

बल्ली २ ]

कठोपनिषद्

१०३

गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उन मूर्खोंको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विविध दुःखपूर्ण योनियोंमें एवं नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझते हैं, विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करते हैं और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंका भोग करनेमें तथा उनके उपाजनोंमें ही निरन्तर संलग्न रहकर मनुष्य-जीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं ॥५॥

न साम्प्ररायः प्रतिभाति बालं

प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।

अयं लोको नास्ति पर इति मानी

पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥६॥

वित्तमोहेन मूढम्=इस प्रकार सम्पत्तिके मोहसे मोहित; प्रमाद्यन्तम् बालम्=निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको; साम्प्ररायः=परलोक; न प्रतिभाति=नहीं सूझता; अयम् लोकः=(वह समझता है) कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है; परः न अस्ति=इसके सिवा दूसरा (स्वर्ग-नरक आदि लोक) कुछ भी नहीं है; इति मानी=इस प्रकार माननेवाला अभिमानी मनुष्य; पुनः पुनः=बार-बार; मे वशम्=मेरे (यमराजके) वशमें; आपद्यते=आता है ॥६॥

व्याख्या—इस प्रकार मनुष्य-जीवनके महत्त्वको नहीं समझनेवाला अभिमानी मनुष्य सांसारिक भोग-सम्पत्तिकी प्राप्तिके साधनरूप धनादिके मोहसे मोहित हुआ रहता है; अतएव भोगोंमें आसक्त होकर वह प्रमादपूर्वक मनमाना आचरण करने लगता है। उसे परलोक नहीं सूझता। उसके अन्तःकरणमें इस प्रकारके विचार उत्पन्न ही नहीं होते कि मरनेके बाद मुझे अपने समस्त

१०४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य होकर बारम्बार विविध योनियोंमें जन्म लेना पड़ेगा। वह मूर्ख समझता है कि बस, जो कुछ यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है, यही लोक है। इसीकी सत्ता है। यहाँ जितना विषय-सुख भोग लिया जाय, उतनी ही बुद्धिमानी है। इसके आगे क्या है। परलोकको किसने देखा है। परलोक तो लोगोंकी कल्पनामात्र है इत्यादि। इस प्रकारकी मान्यता रखनेवाला मनुष्य बारम्बार यमराजके चंगुलमें पड़ता है और वे उसके कर्मानुसार उसे नाना योनियोंमें ढकेलते रहते हैं। उसके जन्म-मरणका चक्र नहीं छूटता ॥ ६ ॥

सम्बन्ध— इस प्रकार विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खोंकी निन्दा करके अब उस आत्मतत्त्वकी और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करनेवाले पुरुषोंकी दुर्लभताका वर्णन करते हैं—

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः

शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः।

आश्रयौ वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-

ऽऽश्रयौ ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥

यः बहुभिः =जो (आत्मतत्त्व) बहतोंको तो; श्रवणाय अपि =सुननेके लिये भी; न लभ्यः =नहीं मिलता; यम् =जिसको; बहवः =बहुत-से लोग; शृण्वन्तः =अपि-सुनकर भी; न विद्युः =नहीं समझ सकते; अस्य =ऐसे इस गूढ़ आत्मतत्त्वका; वक्ता आश्रयः =वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्रयमय है (बड़ा दुर्लभ है); लब्धा कुशलः =उसे प्राप्त करनेवाला भी बड़ा कुशल (सफल-जीवन) कोई एक ही होता है; कुशलानुशिष्टः =और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुषके द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ; ज्ञाता =आत्मतत्त्वका ज्ञाता भी; आश्रयः =आश्रयमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥

व्याख्या— आत्मतत्त्वकी दुर्लभता बतलानेके लिये यमराजने कहा—नचिकेता! आत्मतत्त्व कोई साधारण-सी बात नहीं। जगत्में अधिकांश मनुष्य

बल्ली २ ]

कठोपनिषद्

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तो ऐसे हैं—जिनको आत्मकल्याणकी चर्चातक सुननेको नहीं मिलती। वे ऐसे वातावरणमें रहते हैं कि जहाँ प्रातःकाल जागनेसे लेकर रात्रिको सोनेतक केवल विषय-चर्चा ही हुआ करती है, जिससे उसका मन आठों पहर विषय-चिन्तनमें डूबा रहता है। उनके मनमें आत्मतत्त्व सुनने-समझनेकी कभी कल्पना ही नहीं आती और भूले-भटके यदि ऐसा कोई प्रसङ्ग आ जाता है तो उन्हें विषय-सेवनसे अवकाश नहीं मिलता। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो सुनना-समझना उत्तम समझकर सुनते तो हैं, परंतु उनके विषयाभिभूत मनमें उसकी धारणा नहीं हो पाती अथवा मन्दबुद्धिके कारण वे उसे समझ नहीं पाते। जो तीक्ष्णबुद्धि पुरुष समझ लेते हैं, उनमें भी ऐसे आश्चर्यमय महापुरुष कोई विरले ही होते हैं, जो उस आत्मतत्त्वका यथार्थरूपसे वर्णन करनेवाले समर्थ वक्ता हों। एवं ऐसे पुरुष भी कोई एक ही होते हैं, जिन्होंने आत्मतत्त्वको प्राप्त करके जीवनकी सफलता सम्पन्न की हो; और भलीभाँति समझाकर वर्णन करनेवाले सफलजीवन अनुभवी आत्मदर्शी आचार्यके द्वारा उपदेश प्राप्त करके उसके अनुसार मनन-निदिध्यासन करते-करते तत्त्वका साक्षात्कार करनेवाले पुरुष भी जगत्में कोई विरले ही होते हैं। अतः इसमें सर्वत्र ही दुर्लभता है ॥७॥

सम्बन्ध—अब आत्मज्ञानकी दुर्लभताका कारण बताते हैं—

नरेणावरेणप्रोक्तएष
सुविज्ञेयोबहुधाचिन्त्यमानः।
अनन्यप्रोक्तेगतिरत्रनास्ति
अणीयान्हातकर्मणुप्रमाणात्॥ ८ ॥

अवरेण नरेण प्रोक्तः=अल्पज्ञ मनुष्यके द्वारा बतलाये जानेपर; बहुधा चिन्त्यमानः=(और उनके अनुसार) बहुत प्रकारसे चिन्तन किये जानेपर भी; एषः=यह आत्मतत्त्व; सुविज्ञेयः न=सहज ही समझमें आ जाय, ऐसा नहीं है; अनन्यप्रोक्ते=किसी दूसरे ज्ञानी पुरुषके द्वारा उपदेश न किये जानेपर; अत्र गतिः

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

न अस्ति=इस विषयमें मनुष्यका प्रवेश नहीं होता; हि अणुप्रमाणात्= क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुसे भी; अणीयान्=अधिक सूक्ष्म है; अतर्क्यम्=(इसलिये) तर्कसे अतीत है ॥८॥

व्याख्या —प्रकृतिपर्यन्त जो भी सूक्ष्मात्सूक्ष्म तत्त्व है, यह आत्मतत्त्व उससे भी सूक्ष्म है। यह इतना गहन है कि जबतक इसे यथार्थरूपसे समझानेवाले कोई महापुरुष नहीं मिलते, तबतक मनुष्यका इसमें प्रवेश पाना अत्यन्त ही कठिन है। अल्पज्ञ—साधारण ज्ञानवाले मनुष्य यदि इसे बतलाते हैं और उसके अनुसार यदि कोई विविध प्रकारसे इसके चिन्तनका अभ्यास करता है, तो उसका आत्मज्ञानरूपी फल नहीं होता, आत्मतत्त्व तनिक-सा भी समझमें नहीं आता। दूसरेसे सुने बिना केवल अपने-आप तर्क-वितर्कयुक्त विचार करनेसे भी यह आत्मतत्त्व समझमें नहीं आ सकता। अतः सुनना आवश्यक है; पर सुनना उनसे है, जो इसे भलीभाँति जाननेवाले महापुरुष हों। तभी तर्कसे सर्वथा अतीत इस गहन विषयकी जानकारी हो सकती है ॥८॥

नैषा | तर्केण | मतिरापनेया | ---|---|---|--- | प्रोक्तान्येनैव | सुज्ञानाय | प्रेष्ठ। यां | त्वमापः | सत्यधूर्तिर्बतासि | | त्वादृक् नो | भूयान्नचिकेतः | प्रष्ठा ॥ ९ ॥

प्रेष्ठ=हे प्रियतम!; याम् त्वम् आपः=जिसको तुमने पाया है; एषा मतिः=यह बुद्धि; तर्केण न आपनेया=तर्कसे नहीं मिल सकती (यह तो); अन्येन प्रोक्ता एव=दूसरेके द्वारा कही हुई ही; सुज्ञानाय=आत्मज्ञानमें निमित्त; [भवति=होती है;] बत=सचमुच ही (तुम); सत्यधूर्तिः=उत्तम धैर्यवाले; असि=हो; नचिकेतः=हे नचिकेता! (हम चाहते हैं कि); त्वादृक्=तुम्हारे-जैसे ही; प्रष्ठा=पूछनेवाले; नः भूयात्=हमें मिला करें ॥९॥

व्याख्या —नचिकेताकी प्रशंसा करते हुए यमराज फिर कहते हैं कि हे प्रियतम! तुम्हारी इस पवित्र मति—निर्मल निष्ठाको देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ऐसी निष्ठा तर्कसे कभी नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती

वल्ली २ ] कठोपनिषद् १०७


है, जब भगवत्कृपासे किसी महापुरुषका सङ्ग प्राप्त होता है और उनके द्वारा लगातार परमात्माके महत्त्वका विशद विवेचन सुननेका सौभाग्य मिलता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्यको आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करनेमें प्रवृत्त करती है। इतना प्रलोभन दिये जानेपर भी तुम अपनी निष्ठापर दृढ़ रहे, इससे यह सिद्ध है कि वस्तुतः तुम सच्ची धारणासे सम्पन्न हो। नचिकेता ! हमें तुम-जैसे ही पूछनेवाले जिज्ञासु मिला करें ॥ ९ ॥

**सम्बन्ध—**अब यमराज अपने उदाहरणसे निष्कामभावकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—

जानाम्यहꣳ शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत्।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि -
रनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥

**अहम् जानामि=**मैं जानता हूँ कि; **शेवधिः=**कर्मफलरूप निधि; **अनित्यम् इति=**अनित्य है; **हि अध्रुवैः=**क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओंसे; **तत् ध्रुवम्=**वह नित्य पदार्थ (परमात्मा); **न हि प्राप्यते=**नहीं मिल सकता; **ततः=**इसलिये; **मया=**मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धिसे); **अनित्यैः द्रव्यैः=**अनित्य पदार्थोंके द्वारा; **नाचिकेतः=**नाचिकेत नामक; **अग्निः चितः=**अग्निका चयन किया गया (अनित्य भोगोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, अतः उस निष्कामभावकी अपूर्व शक्तिसे मैं); **नित्यम्=**नित्य वस्तु परमात्माको; **प्राप्तवान् अस्मि=**प्राप्त हो गया हूँ ॥ १० ॥

**व्याख्या—**नचिकेता ! मैं इस बातको भलीभाँति जानता हूँ कि कर्मोंके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके भोगसमूहकी जो निधि मिलती है, वह चाहे कितनी ही महान् क्यों न हो, एक दिन उसका विनाश निश्चित है, अतएव वह अनित्य है और यह सिद्ध है कि अनित्य साधनोंसे नित्य पदार्थकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस रहस्यको जानकर ही मैंने नाचिकेत अग्निके चयनादिरूपसे जो कुछ यज्ञादि कर्तव्यकर्म अनित्य वस्तुओंके द्वारा

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

किये, सब-के-सब कामना और आसक्तिसे रहित होकर केवल कर्तव्य-बुद्धिसे किये। इस निष्कामभावकी ही यह महिमा है कि अनित्य पदार्थोंके द्वारा कर्तव्य-पालनरूप ईश्वर-पूजा करके मैंने नित्य-सुखरूप परमात्माको प्राप्त कर लिया ॥ १० ॥

सम्बन्ध— नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—

कामस्यासिंजगतःप्रतिष्ठां
क्रतो रनन्त्यमभयस्यपारम् ।
स्तोममहदुरुगायंप्रतिष्ठां
दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यन्तस्वाक्षीः ॥ ११ ॥

नचिकेतः :-हे नचिकेता!; कामस्य आसिम् -जिसमें सब प्रकारके भोग मिल सकते हैं; जगतः प्रतिष्ठाम् -जो जगत्का आधार; क्रतोः अनन्त्यम् -यज्ञका चिरस्थायी फल; अभयस्य पारम् -निर्भयताकी अवधि (और); स्तोममहत् -स्तुति करनेयोग्य एवं महत्वपूर्ण है (तथा); उरुगायम् -वेदोंमें जिसके गुण नाना प्रकारसे गये गये हैं; प्रतिष्ठाम् -(और) जो दीर्घकालतककी स्थितिसे सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोकको; दृष्ट्वा धृत्या -देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक; अत्यन्तस्वाक्षीः :-उसका त्याग कर दिया; [अतः=इसलिये;] (मैं समझता हूँ कि) धीरः [असि] -(तुम) बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥

व्याख्या— नचिकेता! तुम सब प्रकारसे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न और निष्काम हो। मैंने तुम्हारे सामने वरदानके रूपमें उस स्वर्गलोकको रखा, जो सब प्रकारके भोगोंसे परिपूर्ण, जगत्का आधारस्वरूप, यज्ञादि शुभकर्मोंका अन्तरहित फल, सब प्रकारके दुःख और भयसे रहित, स्तुति करनेयोग्य और अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वेदोंने भाँति-भाँतिसे उसकी शोभाके गुणगान किये हैं और वह दीर्घकालतक स्थित रहनेवाला है; तुमने उसके महत्त्वको समझकर भी बड़े धैर्यके साथ उसका परित्याग कर दिया, तुम्हारा मन तनिक भी उसमें आसक्त नहीं हुआ,

वल्ल्बी २ ]

कठोपनिषद्

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तुम अपने निश्चयपर दृढ़ और अटल रहे—यह साधारण बात नहीं है। इसलिये मैं यह मानता हूँ कि तुम बड़े ही बुद्धिमान्, अनासक्त और आत्मतत्त्वको जाननेके अधिकारी हो ॥ ११ ॥

सम्बन्ध —इस प्रकार नचिकेताके निष्कामभावको देखकर यमराजने निश्चय कर लिया कि यह परमात्माके तत्त्वज्ञानका यथार्थ अधिकारी है; अतः उसके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करनेके लिये यमराज अब दो मन्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी महिमाका वर्णन करते हैं—

तं दुर्दर्शं गृह्मनुप्रविष्टं गृहाहितं गृह्नेष्टं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥

गृह्म=जो योगमायाके पदमें छिपा हुआ; अनुप्रविष्ट=सर्वव्यापी; गृहाहितम्=सबके हृदयरूप गुफामें स्थित (अतएव); गृह्नेष्टम्=संसाररूप गहन वनमें रहनेवाला; पुराणम्=सनातन है, ऐसे; तम् दुर्दर्शम् देवम्=उस कठिनतासे देखे जानेवाले परमात्मदेवको; धीरः=शुद्ध बुद्धियुक्त साधक; अध्यात्मयोगाधिगमेन=अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा; मत्वा=समझकर; हर्षशोकौ जहाति=हर्ष और शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥

व्याख्या —यह सम्पूर्ण जगत् एक अत्यन्त दुर्गम गहन वनके सदृश है, परंतु यह परब्रह्म परमेश्वरसे परिपूर्ण है, वह सर्वव्यापी इसमें सर्वत्र प्रविष्ट है (गीता ९।४)। वह सबके हृदयरूपी गुफामें स्थित है (गीता १३।१७; १५।१५; १८।६१)। इस प्रकार नित्य साथ रहनेपर भी लोग उसे सहजमें देख नहीं पाते; क्योंकि वह अपनी योगमायाके पदमें छिपा है (गीता ७।२५), इसलिये अत्यन्त गुप्त है। उसके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। जो शुद्ध-बुद्धिसम्पन्न साधक अपने मन-बुद्धिको नित्य-निरन्तर उसके चिन्तनमें संलग्न रखता है, वह उस सनातन देवको प्राप्त करके सदाके लिये हर्ष-शोकसे

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

रहित हो जाता है। उसके अन्तःकरणमेंसे हर्ष-शोकादि विकार समूल नष्ट हो जाते हैं*॥ १२॥

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयः हि लब्ध्वा विवृतः सच्च नचिकेतसं मन्ये॥ १३॥

मर्त्यः=मनुष्य (जब); एतत्=इस; धर्म्यम्=धर्ममय (उपदेश)-को; श्रुत्वा=सुनकर; सम्परिगृह्य=भलीभाँति ग्रहण करके; प्रवृह्य=(और) उसपर विवेकपूर्वक विचार करके; एतम्=इस; अणुम्=सूक्ष्म आत्मतत्त्वको; आप्य=जानकर (अनुभव कर लेता है, तब); सः=वह; मोदनीयम्=आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; लब्ध्वा=पाकर; मोदते हि=आनन्दमें ही मग्न हो जाता है; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताके लिये; विवृतम् सच्च मन्ये=(मैं) परमधामका द्वार खुला हुआ मानता हूँ॥ १३॥

व्याख्या—इस अध्यात्म-विषयक धर्ममय उपदेशको पहले तो अनुभवी महापुरुषके द्वारा अतिशय श्रद्धापूर्वक सुना चाहिये, सुनकर उसका मनन करना चाहिये। तदनन्तर एकान्तमें उसपर विचार करके बुद्धिमें उसको स्थिर करना चाहिये। इस प्रकार साधन करनेपर जब मनुष्यको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् जब वह आत्माको तत्त्वसे समझ लेता है, तब आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। उस आनन्दके महान् समुद्रको पाकर वह उसमें निमग्न हो जाता है। हे नचिकेता! तुम्हारे लिये उस परमधामका द्वार खुला हुआ है। तुमको वहाँ जानेसे कोई रोक नहीं सकता। तुम ब्रह्मप्राप्तिके उत्तम अधिकारी हो, ऐसा मैं मानता हूँ॥ १३॥

  • प्रातःस्मरणीय भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने भी ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें इस प्रकरणको परमात्मविषयक माना है ('प्रकरणं चेद परमात्मनः'—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० २ के १२ वें सूत्रका भाष्य)।

वल्ली २ ] कठोपनिषद् १११

सम्बन्ध— यमराजके मुखसे परब्रह्म पुरुषोत्तमकी महिमा सुनकर और अपनेको उसका अधिकारी जानकर नचिकेताके मनमें परमात्मतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। साथ ही उसे यमराजके द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर साधु-सम्मत संकोच भी हुआ। इसलिये उसने यमराजसे बीचमें ही पूछा—

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥ १४॥

यत् तत्= जिस उस परमेश्वरको; धर्मात् अन्यत्र= धर्मसे अतीत; अधर्मात् अन्यत्र= अधर्मसे भी अतीत; च= तथा; अस्मात् कृताकृतात्= इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत्से भी; अन्यत्र= भिन्न; च= और; भूतात् भव्यात्= भूत, वर्तमान एवं भविष्यत्—तीनों कालोंसे तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थोंसे भी; अन्यत्र= पृथक्; पश्यसि= (आप) जानते हैं; तत्= उसे; वद= बतलाइये॥ १४॥

व्याख्या— नचिकेता कहता है—भगवन्! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मके सम्बन्धसे रहित, कार्य-कारणरूप प्रकृतिसे पृथक् एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन सबसे भिन्न जिस परमात्मतत्त्वको आप जानते हैं, उसे मुझको बतलाइये* ॥१४॥

सम्बन्ध— नचिकेताके इस प्रकार पूछनेपर यमराज उस ब्रह्मतत्त्वके वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं—

सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति
तपाꣳसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥ १५॥

सर्वे वेदाः= सम्पूर्ण वेद; यत् पदम्= जिस परम पदका; आमनन्ति= बारम्बार


* भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने इस प्रकरणको भी अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें परमेश्वरविषयक ही माना है (‘पृष्टं चेह ब्रह्म’—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० ३ के २४ वें सूत्रका भाष्य)।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

प्रतिपादन करते हैं; च=और; सर्वाणि तपांसि=सम्पूर्ण तप; यत्=जिस पदका; वदन्ति=लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन हैं; यत् इच्छन्तः=जिसको चाहनेवाले साधकगण; ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्यका; चरन्ति=पालन करते हैं; तत् पदम्=वह पद; ते=तुम्हें; (मैं) संग्रहेण=संक्षेपसे; ब्रवीमि=बतलाता हूँ; (वह है) ओम्=ओम्; इति=ऐसा; एतत्=यह (एक अक्षर) ॥ १५ ॥

व्याख्या —यमराज यहाँ परब्रह्म पुरुषोत्तमको परमप्राप्य बतलाकर उसके वाचक अँकारको प्रतीकरूपसे उसका स्वरूप बतलाते हैं। वे कहते हैं कि समस्त वेद नाना प्रकार और नाना छन्दोंसे जिसका प्रतिपादन करते हैं, सम्पूर्ण तप आदि साधनोंका जो एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छासे साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, उस पुरुषोत्तमभगवान्का परमतत्त्व मैं तुम्हें संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है 'अँ' यह एक अक्षर ॥ १५ ॥

सम्बन्ध —नामरहित होनेपर भी परमात्मा अनेक नामोंसे पुकारे जाते हैं। उनके सब नामोंमें 'अँ' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः यहाँ नाम और नामीका अभेद मानकर 'प्रणव' को परब्रह्म पुरुषोत्तमके स्थानमें वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं—

एतद्भ्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्भ्येवाक्षरं परम्।

एतद्भ्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥

एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही तो; ब्रह्म=ब्रह्म है (और); एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही; परम्=परब्रह्म है; हि=इसलिये; एतत् एव=इसी; अक्षरम्=अक्षरको; ज्ञात्वा=जानकर; यः=जो; यत्=जिसको; इच्छति=चाहता है; तस्य=उसको; तत्=वही (मिल जाता है) ॥ १६ ॥

व्याख्या —यह अविनाशी प्रणव—अँकार ही तो ब्रह्म (परमात्माका स्वरूप) है और यही परब्रह्म परमपुरुष पुरुषोत्तम है अर्थात् उस ब्रह्म और परब्रह्म दोनोंका ही नाम अँकार है; अतः इस तत्त्वको समझकर साधक इसके द्वारा दोनोंमेंसे किसी भी अभीष्ट रूपको प्राप्त कर सकता है ॥ १६ ॥