ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
सम्बन्ध— इतनेपर भी नचिकेता अपने निश्चयपर अटल रहा, तब स्वर्गके दैवी भोगोंका प्रलोभन देते हुए यमराजने कहा—
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाँः श्छन्दतः प्रार्थयस्व। इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः। आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥ २५॥
ये ये कामाः = जो-जो भोग; मर्त्यलोके = मनुष्यलोकमें; दुर्लभाः = दुर्लभ हैं; सर्वान् कामान् = उन सम्पूर्ण भोगोंको; छन्दतः प्रार्थयस्व = इच्छानुसार माँग लो; सरथाः सतूर्याः इमाः रामाः = रथ और नाना प्रकारके बाजोंके सहित इन स्वर्गकी अप्सराओंको (अपने साथ ले जाओ); मनुष्यैः ईदृशाः = मनुष्योंको ऐसी स्त्रियाँ; न हि लम्भनीयाः = निःसंदेह अलभ्य हैं; मत्प्रत्ताभिः = मेरे द्वारा दी हुई; आभिः = इन स्त्रियोंसे; परिचारयस्व = तुम अपनी सेवा कराओ; नचिकेतः = हे नचिकेता; मरणम् = मरनेके बाद आत्माका क्या होता है; मा अनुप्राक्षीः = इस बातको मत पूछो॥ २५॥
व्याख्या— नचिकेता! जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छानुसार माँग लो। ये रथों और विविध प्रकारके वाद्योंसहित जो स्वर्गकी सुन्दरी रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियाँ मनुष्योंमें कहीं नहीं मिल सकतीं। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि इनके लिये ललचाते रहते हैं। मैं इन सबको तुम्हें सहज ही दे रहा हूँ। तुम इन्हें ले जाओ और इनसे अपनी सेवा कराओ; परंतु नचिकेता! आत्मतत्त्वविषयक प्रश्न मत पूछो॥ २५॥
सम्बन्ध— यमराज शिष्यपर स्वाभाविक ही दया करनेवाले महान् अनुभवी आचार्य हैं। इन्होंने अधिकारिपरीक्षाके साथ ही इस प्रकार भय और एकके बाद एक उत्तम भोगोंका प्रलोभन दिखाकर, जैसे खूँटेको हिला-हिलाकर दृढ़ किया जाता है, वैसे ही नचिकेताके वैराग्यसम्पन्न निश्चयको और भी दृढ़ किया। पहले