भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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९२ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १


**मृत्यो=**हे यमराज; **त्वम् यत् आत्थ=**आपने जो यह कहा कि; **अत्र किल देवैः अपि=**सचमुच इस विषयपर देवताओंने भी; **विचिकित्सितम्=**विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये); **च न सुविज्ञेयम्=**और वह सुविज्ञेय भी नहीं है (इतना ही नहीं); **च=**इसके सिवा; **अस्य वक्ता=**इस विषयका कहनेवाला भी; **त्वादृक्=**आपके-जैसा; **अन्यः न लभ्यः=दूसरा नहीं मिल सकता; [अतः]=**इसलिये मेरी समझमें तो; **एतस्य तुल्यः=**इसके समान; **अन्यः कश्चित्=**दूसरा कोई भी; **वरः न=**वर नहीं है॥ २२॥

**व्याख्या—**हे मृत्यो! आप जो यह कहते हैं कि पूर्वकालमें देवताओंने भी जब इस विषयपर विचार-विनिमय किया था तथा वे भी इसे जान नहीं पाये थे और यह विषय सहज नहीं है, बड़ा ही सूक्ष्म है; तब यह तो सिद्ध ही है कि यह बड़े ही महत्त्वका विषय है और ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयको समझानेवाला आपके समान अनुभवी वक्ता मुझे ढूँढ़नेपर भी दूसरा कोई मिल नहीं सकता। आप कहते हैं इसे छोड़कर दूसरा वर माँग लो। परंतु मैं तो समझता हूँ कि इसकी तुलनाका दूसरा कोई वर है ही नहीं। अतएव कृपापूर्वक मुझे इसीका उपदेश कीजिये॥ २२॥

सम्बन्ध— विषयकी कठिनतासे नचिकेता नहीं घबराया, वह अपने निश्चयपर ज्यों-का-त्यों दृढ़ रहा। इस एक परीक्षामें वह उत्तीर्ण हो गया। अब यमराज दूसरी परीक्षाके रूपमें उसके सामने विभिन्न प्रकारके प्रलोभन रखनेकी बात सोचकर उससे कहने लगे—

शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्। भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि॥ २३॥

**शतायुषः=**सैकड़ों वर्षोंकी आयुवाले; **पुत्रपौत्रान्=**बेटे और पोतोंको (तथा); **बहून् पशून्=**बहुत-से गौ आदि पशुओंको (एवं); **हस्तिहिरण्यम्=**हाथी, सुवर्ण और; **अश्वान् वृणीष्व=**घोड़ोंको माँग लो; **भूमेः महत् आयतनम्=**भूमिके