ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली १ ] कठोपनिषद् ९१
हानिकर होता है, अतएव पहले पात्रपरीक्षाकी आवश्यकता है—यों विचारकर यमराजने इस तत्त्वकी कठिनताका वर्णन करके नचिकेताको टालना चाहा और कहा—
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा
न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥ २१॥
नचिकेतः=हे नचिकेता; अत्र पुरा=इस विषयमें पहले; देवैः अपि=देवताओंने भी; विचिकित्सितम्=संदेह किया था (परंतु उनकी भी समझमें नहीं आया); हि एषः धर्मः अणुः=क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है; न सुविज्ञेयम्=सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है (इसलिये); अन्यम् वरम् वृणीष्व=तुम दूसरा वर माँग लो; मा मा उपरोत्सीः=मुझपर दबाव मत डालो; एनम् मा=इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वरको मुझे; अतिसृज=लौटा दो॥ २१॥
**व्याख्या—**नचिकेता! यह आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म विषय है। इसका समझना सहज नहीं है। पहले देवताओंको भी इस विषयमें संदेह हुआ था। उनमें भी बहुत विचार-विनिमय हुआ था; परंतु वे भी इसको जान नहीं पाये। अतएव तुम दूसरा वर माँग लो। मैं तुम्हें तीन वर देनेका वचन दे चुका हूँ, अतएव तुम्हारा ऋणी हूँ; पर तुम इस वरके लिये, जैसे महाजन ऋणीको दबाता है वैसे मुझको मत दबाओ। इस आत्मतत्त्वविषयक वरको मुझे लौटा दो। इसको मेरे लिये छोड़ दो॥ २१॥
सम्बन्ध— नचिकेता आत्मतत्त्वकी कठिनताकी बात सुनकर तनिक भी घबराया नहीं, न उसका उत्साह ही मन्द हुआ; वरं उसने और भी दृढ़ताके साथ कहा—
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥ २२॥