भारतकोश
जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

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किन्तु जो मनुष्य उसकी रचना का गणित करते हुए 'असंख्य' शब्द का प्रयोग करते हैं उनके सिर पर भी भार पड़ता है। शब्दों द्वारा ही उस निरंकार के नाम को जपा जा सकता है, शब्दों से ही उसका गुणगान किया जा सकता है। परमात्मा के गुणों का ज्ञान भी शब्दों द्वारा हो सकता है तथा उसकी प्रशंसा भी शब्दों द्वारा ही कही जा सकती है। शब्दों द्वारा ही उसकी वाणी को लिखा व बोला जा सकता है। शब्दों द्वारा मस्तिष्क पर लिखे गए कर्मों को बताया जा सकता है। किन्तु जिस निरंकार ने यह कर्म लेख लिखे हैं उसके मस्तिष्क पर कोई कर्म-लेख नहीं है; अर्थात्-उसके कर्मों को न तो कोई कह सकता है और न उनका हिसाब रख सकता है। अकाल-पुरुष जिस प्रकार मनुष्य के कर्मों के अनुसार आदेश करता है, वैसे ही वह अपने कर्मों को भोगता है। सृजनहार ने इस सृष्टि का जितना प्रसार किया है, वह समस्त नाम-रूप ही है। कोई भी स्थान उसके नाम से रिक्त नहीं है। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं।। १९ ।।