जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरुहक ] २७७ अश्व का रूप कैसा है ! ओह ! अश्व कितना सुन्दर है ! उसने घर आ प्रासाद पर चढ भार्य्या को बुलाया—'भद्रे ! हमारा घोडा बडा सुन्दर लगता है। दोनो ओर खडे आदमी हमारे घोडे की ही प्रशंसा करते हैं। वह ब्राह्मणी थोडी धूर्त थी। उसने उसे कहा—'आर्य ! तू घोडे के सौन्दर्य के कारण को नही जानता। यह घोडा अपने साज के कारण शोभा देता है। यदि तू भी अश्व की तरह सुन्दर लगना चाहता है, तो घोडे का साज पहन, बाजार में उतर, अश्व की तरह पैरो की टाप देते हुए, जाकर राजा को देख । राजा भी तेरी प्रशंसा करेगा । आदमी भी तेरी ही प्रशंसा करेगे। उस पगले ब्राह्मण ने उसकी बात सुन, अमुक कारण से यह ऐसा कहती है न समझ, उसकी बात में विश्वास कर वैसा किया। जो जो देखते वे वे मजाक करते हुए कहते—'आचार्य्य ! खूब शोभा देते है। राजा न उससे पूछा—"आचार्य्य ! क्या पित्त प्रकोप हुआ है ? क्या तू पगला हो गया है ?” इस प्रकार लज्जित किया। उस समय ब्राह्मण ने सोचा 'मैने अनुचित किया।' यह लज्जित हुआ। ब्राह्मणी से क्रुद्ध हो, 'उसने मुझे राजा सहित सेना के बीच में लज्जित किया' सोच उसे पीट कर घर से निकालने दे लिए घर गया। धूर्त ब्राह्मणी को जब मालूम हुआ कि वह उस पर क्रोधित होकर आया है, तो वह पहले ही छोटे दरवाजे से निकल राज-महल में जा पहुँची। वह चार पाँच दिन वही रही। राजा ने वह समाचार जान पुरोहित को बुला कर कहा— “आचार्य्य ! स्त्री से दोष होता ही है। ब्राह्मणी को क्षमा करना चाहिए।” उसे क्षमा दिलाने के लिए पहली गाथा कही— अम्भॊ रुहक छिन्नापि जिया सन्धीयते पुन, सन्धीयस्सु पुराणिया मा क्रोधस्स वस गमि ॥ [ भो रुहक ! धनुष की डोरी टूट कर फिर भी जुड जाती है। पुराणि के साथ मेल कर लो। क्रोध के वशीभूत मत हो । ]