जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 293, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ [ २५।१६२ संक्षेपार्थ—भो रुहक ! छिन्नापि धनुष की डोरी जुड ही जाती है। इसी प्रकार तू भी पुराणी के साथ सन्धीयस्सु कोधस्स वस मा गमि। उसे सुनकर रुहक ने दूसरी गाथा कही— विज्जमानासु मरुवासु विज्जमानेसु कारिसु अञ्ञं जियं करिस्साम अलञ्चेव पुराणिया ॥ [ मरुव नाम की छाल के रहते और बनाने वालो के रहते में दूसरी डोरी बनवा लूंगा । मुझे पुरानी की जरूरत नही । ] महाराज ! मरुव छाल और डोरी बनाने वाले मनुष्यों के रहते दूसरी डोरी बनवा लूंगा । इस टूटी हुई पुरानी डोरी की मुझे जरूरत नही । ऐसा कह उसे निकाल दूसरी ब्राह्मणी को ले आया । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न चित्त भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय पुराणि पूर्व-भार्या थी । रुहक उद्विग्न-चित्त भिक्षु था । बाराणसी राजा तो मै ही था । १६२. सिरिकालकण्णि जातक “इत्थी सिया रूपवती ” यह सिरिकालकण्णि जातक महाउम्मग्ग जातक¹ में आएगी । ¹ महाउम्मग्ग जातक (५४६)