भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

असिलक्खण ] ६५ भाग्य बतानेवाली ने राजकन्या को मण्डलपीठ की जगह पर जाते हुए 'डर मत' इशारा कर चारपाई पर लिटाया । उसी समय कुमार ने मिर्च-चूर्ण नाक पर फेंक छींक मारी । उसके छींक मारते ही (वह) भाग्य बतानेवाली राजकन्या को छोड़ बड़ा शोर मचाती हुई सबसे पहले भागी । उसके भागने पर एक भी न ठहर सका । जिसके पास जो शस्त्र थे उन्हें छोड़ सभी भाग गए । राजकुमार जैसे निश्चय किया गया था उसके अनुसार सब करके राजकन्या को अपने घर ले गया । भाग्य बतानेवाली ने जाकर राजा को सब हाल कहा । राजा ने स्वीकार किया, बोला—यूँ भी मैने उसे उसी के लिए पाला था । दूध म घी पड़ने जैसा हुआ। आगे चलकर भानजे को राज्य दे अपनी कन्या को उसकी पटरानी बनाया । वह उसके साथ मेल से रहता हुआ धर्म-पूर्वक राज्य करता रहा । वह तलवार के लक्षण बतानेवाला भी उसी की सेवा में रहता था । एक दिन राज्य-सेवा में आ सूर्य के सामने खड़े हो सेवा-कार्य करते हुए उसकी नाक की लाख पिघल गई । नकली नाक जमीन पर गिर पड़ी । वह शर्म के मारे सिर नीचा करके खड़ा हुआ । राजा ने हँसते हुए कहा—आचार्य्य सोच मत करो । छींकना एक के लिए कल्याणकर होता है, दूसरे के लिए बुरा । तुम्हारे छींकने पर नाक पृथक हो गई, लेकिन हमने छींका तो हमें मामा की लड़की और राज्य मिला। इतना कह यह गाथा कही— तथेवेकस्स कल्याणं तथेवेकस्स पापकं, तस्मा सब्बं न कल्याणं सब्बं वापि न पापकं ॥ [ वही किसी के लिए कल्याणकारक है, वही किसी के लिए बुरा । इस लिए न सब कल्याणकारक ही है, न सब बुरा ही है।] तथेवेक्स्स तवेवेकस्स—यह भी पाठ है । दूसरे पद में भी ऐस ही । इस प्रकार इस गाथा द्वारा उसने यह बात कही । फिर दान आदि पुण्यकर्म करके यथाकर्म परलोक सिधारा । ५

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