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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

असिलक्खण ] ६५ भाग्य बतानेवाली ने राजकन्या को मण्डलपीठ की जगह पर जाते हुए 'डर मत' इशारा कर चारपाई पर लिटाया । उसी समय कुमार ने मिर्च-चूर्ण नाक पर फेंक छींक मारी । उसके छींक मारते ही (वह) भाग्य बतानेवाली राजकन्या को छोड़ बड़ा शोर मचाती हुई सबसे पहले भागी । उसके भागने पर एक भी न ठहर सका । जिसके पास जो शस्त्र थे उन्हें छोड़ सभी भाग गए । राजकुमार जैसे निश्चय किया गया था उसके अनुसार सब करके राजकन्या को अपने घर ले गया । भाग्य बतानेवाली ने जाकर राजा को सब हाल कहा । राजा ने स्वीकार किया, बोला—यूँ भी मैने उसे उसी के लिए पाला था । दूध म घी पड़ने जैसा हुआ। आगे चलकर भानजे को राज्य दे अपनी कन्या को उसकी पटरानी बनाया । वह उसके साथ मेल से रहता हुआ धर्म-पूर्वक राज्य करता रहा । वह तलवार के लक्षण बतानेवाला भी उसी की सेवा में रहता था । एक दिन राज्य-सेवा में आ सूर्य के सामने खड़े हो सेवा-कार्य करते हुए उसकी नाक की लाख पिघल गई । नकली नाक जमीन पर गिर पड़ी । वह शर्म के मारे सिर नीचा करके खड़ा हुआ । राजा ने हँसते हुए कहा—आचार्य्य सोच मत करो । छींकना एक के लिए कल्याणकर होता है, दूसरे के लिए बुरा । तुम्हारे छींकने पर नाक पृथक हो गई, लेकिन हमने छींका तो हमें मामा की लड़की और राज्य मिला। इतना कह यह गाथा कही— तथेवेकस्स कल्याणं तथेवेकस्स पापकं, तस्मा सब्बं न कल्याणं सब्बं वापि न पापकं ॥ [ वही किसी के लिए कल्याणकारक है, वही किसी के लिए बुरा । इस लिए न सब कल्याणकारक ही है, न सब बुरा ही है।] तथेवेक्स्स तवेवेकस्स—यह भी पाठ है । दूसरे पद में भी ऐस ही । इस प्रकार इस गाथा द्वारा उसने यह बात कही । फिर दान आदि पुण्यकर्म करके यथाकर्म परलोक सिधारा । ५

हैं उन सबका अनैकान्तिक होना प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया।

६६ [ १.१३.१२७ शास्ता ने इस धर्मोपदेश द्वारा लोक में जो बहुत सी अच्छी बुरी मान्यताएँ हैं उन सबका अनैकान्तिक होना प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया। उस समय का तलवार के लक्षण पढनेवाला तो यह अब का तलवार के लक्षण पड़नेवाला ही था। हाँ भानजा-राजा मैं ही था। १२७. कलण्डुक जातक "ते देसा तानि वत्थूनि..." यह (धर्मदेशना) शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक बकवादी भिक्षु के बारे में कही। दोनो कथाएँ (अतीत कथा तथा वर्तमान कथा) कटाहक जातक १ की कथा की तरह ही हैं। हाँ, इस जातक में वाराणसी के सेठ का नाम कलण्डुक था। उसके भाग कर प्रत्यन्त सेठ की लड़की से विवाह कर बड़े ठाट-बाट के साथ रहने के समय, वाराणसी के सेठ के उसे ढुंढवाने पर भी उसके न मिलने पर, वाराणसी सेठ ने अपना पाला-पोसा एक तोते का बच्चा भेजा कि जा कलण्डुक को खोज। तोते का बच्चा इधर-उधर घूमता हुआ उस नगर में पहुँचा। उस समय कलण्डुक जल क्रीडा करने की इच्छा से बहुत सारे माला-गन्ध- विलेपन तथा खाद्य-भोज्य ले नदी पर जा सेठ कन्या के साथ एक नौका पर बैठ पानी में खेलता था। उस देश में ऐश्वर्यशाली लोग जब जल-क्रीडा करते तो कोई तेज औषध मिला हुआ दूध पीते थे। उससे उनके सारा दिन भी जल में क्रीडा करते रहने पर उन्हें शीत नही लगता था। यह कलण्डुक उस दूध से मुँह भर उससे कुरला कर उसे थूक देता, लेकिन उसे जल में न थूककर उस सेठ-कन्या के सिर पर थूकता था। १कटाहक जातक (१२५) ।

कलण्डुक ] ६७ उस तोते के बच्चे ने भी नदी के किनारे एक गूलर की शाखा पर बैठ कलण्डुक को पहचान लिया और देखा कि वह सेठ-कन्या के सिर पर थूक रहा है। उसने कहा—"अरे ! कलण्डुक ! दास ! अपनी जाति और (पूर्व) निवास-स्थान को याद कर। दूध से मुँह भर, उसका कुल्ला कर ऊँची जाति- वाली सुख में पली हुई सेठ की कन्या के सिर पर मत थूक। तू अपनी हैसियत को नहीं देखता ?" फिर यह गाथा कही— ते देसा तानि यत्थूनि अहञ्च वनगोचरो, अनुविच्च खो त गण्हेय्यु पिव खीरं कलण्डुक ॥ [वह देश और वस्तुएँ (=कोख)। मैं वनचर पक्षी। तुझे पहचान कर पकड़ लगे। कलण्डुक दूध पी।] ते देसा तानि यत्थूनि, यह माता की कोख के बारे म कहा है। भावार्थ यह है—जहाँ तू रहा है वह क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है, अथवा जहाँ तू प्रतिष्ठित रहा है वह भी क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है। तू दासी की कोख मे रहा और प्रतिष्ठित हुआ। अहञ्च वन गोचरो—मै तिरश्चीन योनि में पैदा होकर भी यह सब जानता हूँ, यह प्रकट करता है। अनुविच्च खो त गण्हेय्यु, इस प्रकार अनाचार करते हुए को देख जब मैं जाकर कहूँगा तो पहचानकर वह तेरे स्वामी आकर तुझे ताड़कर और दाग देकर पकड कर ले जायेगें। इसलिए अपनी हैसियत देखकर सेठ की लडकी के सिर पर बिना थूके हुए पिव खीर कलण्डुक, नाम से सम्बोधन करता है कि (हे कलण्डुक दूध पी)। कलण्डुक ने भी तोते के बच्चे को पहचानकर 'यह मुझे प्रकट कर रहा है' सोच भयभीत हो कहा—आइए ! स्वामी ! कब आए ? तोते के बच्चे ने सोचा यह मेरा हित चिन्तक होकर नही बुला रहा है। यह मेरी गरदन मरोड़कर मार डालना चाहता है। यह समझकर कहा कि मुझे तुझसे काम नहीं है। तब वह उड़कर बाराणसी गया और जैसे जैसे देखा था सेठ को विस्तार- पूर्वक सब कहा।

हैं उन सबका भलीभाँति विवेचन प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया।

६६ [ १-१३-१२७ शास्ता ने इस धर्मोपदेश द्वारा लोक में जो बहुधा भी अच्छी बुरी भावनाएं हैं उन सबका भलीभाँति विवेचन प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया। उस समय का तलवार से लक्षण पढ़नेवाला तो यह अब का तलवार के लक्षण पढ़नेवाला ही था। मैं भानन्द-राजा में ही था। १२७. कलण्डुक जातक "से ऐसा सानि थल्पूनि..." यह (धर्मदेशना) शास्ता ने जेतवन म रहने समय एक थरवादी भिक्षु के बारे में कही। दोनो कथाएँ (अतीत कथा तथा वर्तमान कथा) कटाहक जातक¹ की कथा की तरह ही हैं। हाँ, इस जातक में वाराणसी के सेठ का नाम कलण्डुक था। उसने भाग कर प्रत्यन्त सेठ की लडकी से विवाह कर बडे ठाट-बाट के साथ रहने के समय, वाराणसी के सेठ के उसे ढुंढवाने पर भी उसके न मिलने पर, वाराणसी सेठ ने अपना पाला-पोसा एक तोते का बच्चा भेजा कि जा कलण्डुक को खोज। तोते का बच्चा इधर-उधर घूमता हुआ उस नगर में पहुँचा। उस समय कलण्डुक जल-क्रीडा करने की इच्छा से बहुत सारे माला-गन्ध- विलेपन तथा खाद्य-भोज्य ले नदी पर जा सेठ कन्या के साथ एक नौका पर बैठ पानी म खेलता था। उस देश में ऐश्वर्य्यशाली लोग जब जल-क्रीडा करते तो कोई तेज औषध मिला हुआ दूध पीते थे। उससे उनके सारा दिन भी जल म क्रीडा करते रहने पर उन्हें शीत नही लगता था। यह कलण्डुक उस दूध से मुंह भर उससे कुरला कर उसे थूक देता, लेकिन उसे जल में न थूककर उस सेठ-कन्या के सिर पर थूकता था। ¹ कटाहक जातक (१२५) ।

कलण्डुक ] ६७ उस तोते के बच्चे ने भी नदी के किनारे एक गूलर की शाखा पर बैठ कलण्डुक को पहचान लिया और देखा कि वह सेठ-कन्या के सिर पर थूक रहा है। उसने कहा—"अरे ! कलण्डुक ! दास ! अपनी जाति और (पूर्व) निवास-स्थान को याद कर। दूध से मुंह भर, उसका कुरला कर ऊँची जाति- वाली कुल में पली हुई सेठ की कन्या के सिर पर मत थूक। तू अपनी हैसियत को नहीं देखता ?" फिर यह गाथा कही— ते देसा तानि वत्थूनि अहञ्च वनगोचरो, अनुविच्च खो त गण्हेय्यु पिव खीर कलण्डुक ॥ [ वह देश और वस्तुएँ (=कोख) । मैं वनचर पक्षी । तुझे पहचान कर पकड़ लगे । कलण्डुक दूध पी ।] ते देसा तानि वत्थूनि, यह माता की कोख के बारे मे कहा है। भावार्थ यह है—जहाँ तू रहा है वह क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है, अथवा जहाँ तू प्रतिष्ठित रहा है वह भी क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है। तू दासी की कोख मे रहा और प्रतिष्ठित हुआ। अहञ्च वन गोचरो—में तिरश्चीन योनि में पैदा होकर भी यह सब जानता हूँ, यह प्रकट करता है। अनुविच्च खो त गण्हेय्यु, इस प्रकार अनाचार करते हुए को देख जब मैं जाकर कहूँगा तो पहचानकर वह तेरे स्वामी आकर तुझे ताड़कर और दाग देकर पकड़ कर ले जायेंगे। इसलिए अपनी हैसियत देखकर सेठ की लड़की के सिर पर बिना थूके हुए पिव खीर कलण्डुक; नाम से सम्बोधन करता है कि (हे कलण्डुक दूध पी) । कलण्डुक ने भी तोते के बच्चे को पहचानकर 'यह मुझे प्रकट कर रहा है' सोच भयभीत हो कहा—आइए ! स्वामी ! कब आए ? तोते के बच्चे ने सोचा यह मेरा हित चिन्तक होकर नही बुला रहा है। यह मेरी गरदन मरोड़कर मार डालना चाहता है। यह समझकर कहा कि मुझे तुझसे काम नही है। तब वह उड़कर बाराणसी गया और जैसे जैसे देखा था सेठ को विस्तार- पूर्वक सब कहा।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का

६८ [ १.१३ १२८ सेठ बोला—उसने अनुचित किया। और आज्ञा दे उसे वाराणसी मँगवा दास बनाकर रक्खा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का कटण्डुक यह भिक्षु था। वाराणसी सेठ तो मैं ही था। १२८. बिळारवत जातक “यो चे धम्मं धजं कत्वा ..” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोंगी भिक्षु के बारे म कही। क. वर्तमान कथा उस समय शास्ता ने उसके ढोंग की चर्चा चलने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नहीं, पहल भी यह ढोगी ही रहा है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व ने चूहे का जन्म ग्रहण किया। बड़े होने पर वह बढ़कर सूअर के बच्चे की तरह हो अनेक सौ चूहों के साथ जंगल म रहने लगा। इधर उधर घूमते हुए एक शृगाल ने उस चूहों के समूह को देखकर सोचा कि इन चूहों को ठगकर खाऊँगा। यह सोच वह चूहों के बिल से थोड़ी ही दूर पर सूर्याभिमुख हो, मुंह खोल हवा पीते हुए की तरह एक ही पाँव से खड़ा हुआ। इधर उधर भोजन के लिए ढूंढ़ते हुए बोधिसत्त्व ने उसे देख सोचा यह सदाचारी होगा और उसके पास आकर पूछा—

बिळारवत ] ६६ "आपका, भन्ते ! क्या नाम है ?" "मेरा नाम है धार्मिक ।" "चारो पैर पृथ्वी पर न रख, एक ही पैर से क्या खड़े हैं ?" "मेरे चारो पैर पृथ्वी पर रखने से पृथ्वी के लिए दूभर होगा, इस लिए एक ही पैर से खडा होता हूँ।" "मुँह खोले क्यो खड़े हैं ?" "हम हवा के अतिरिक्त और कुछ नही खाते ?" "सूर्य की ओर मुंह करके क्यो खडे है ?" 'सूर्य को नमस्कार कर रहा हूँ।" बोधिसत्त्व ने सोचा, यह सदाचारी है । उसके बाद से चूहों के समूह के साथ प्रात साय उसकी सेवा में जाने लगे । उसकी सेवा कर लौटने के समय शृगाल सबसे पिछले चूहे को पकड़कर मास खा, निगल कर, मुंह पोछ खडा हो जाता । क्रम से चूहों का दल कम पड गया । चूहे सोचने लगे कि पहले हम यह बिल पर्याप्त नही होता था, सट सट कर खड़े होते थे, अब खुलकर खड़े होते हैं तब भी बिल नही भरता । क्या मामला है ? उन्होने बोधिसत्त्व से सारा हाल कहा । बोधिसत्त्व ने 'चूहे किस कारण कम हो गए' सोचते हुए शृगाल पर शक किया । फिर जांच करने के लिए (शृगाल की) सेवा (से लौटने) के समय बाकी चूहों को आगे कर स्वय पीछे रहा । शृगाल उस पर उछला । अपने को पकडने के लिए शृगाल को उछलता देख बोधिसत्त्व ने रुककर कहा— भो शृगाल ! तेरा यह व्रत धार्मिक नहीं है । तू दूसरो की हिंसा करने के लिए ही धर्म को आगे करके रहता है । इतना कह यह गाथा कही— यो वे धम्मं धजं कत्वा निगूळ्हो पापमाचरे, विस्सासयित्वा भूतानि बिळार नाम तं वतं ॥ [जो धर्म की ध्वजा बनाकर, प्राणियो में विश्वास उत्पादन कर छिप कर पाप करता है, उसका व्रत बिलाल-व्रत है ।] यो वे, क्षत्रिय आदियों में कोई भी । धम्मं धजं कत्वा, दस कुशल धर्मों की ध्वजा बनाकर, उन्ह करता हुआ उठाकर दिखाता हुआ, विस्सासयित्वा, यह

७० [ १.१३ १२६ सदाचारी है, ऐसा विश्वास पैदा करके विडार नाम त व्रत, इस प्रकार धर्म की ध्वजा बनाकर छिपकर पाप करनेवाले का व्रत ढोंग कहलाता है। चूहों के राजा ने इस प्रकार कहते ही कहते उछलकर उसकी गरदन पर चढ, ठोडी के नीचे की अन्दर की गले की नाली को डसकर गले की नली को फाड मार डाला। चूहों के दल ने रुक कर शृगाल को मुर मुर करके खा डाला। पहले आए हुओ को ही शृगाल का मांस मिला, पीछे आए हुओ को नही मिला। उसके बाद से चूहों का दल निर्भय हो गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का शृगाल यह ढोगी भिक्षु था। चूहों का राजा तो मै ही था। १२६. अग्गिक जातक “नाय सिखा पुञ्जहेतु .” यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोगी भिक्षु के ही बारे में कही— ख. अतीत कथा पुराने समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व चूहों के राजा हो जगल में रहते थे। एक शृगाल जगल में आग लगने पर जब भागने में असमर्थ रहा, तो एक वृक्ष से सिर टिकाकर खडा हो गया। उसके सारे शरीर के बाल जल गए। वृक्ष से लगे हुए सिर पर शिखा की तरह से कुछ बाल बच गए। उसने एक दिन एक पर्वतीय तालाब में पानी पीते हुए अपनी छाया के साथ शिखा को देखकर सोचा अब मुझे पूंजी मिल गई। फिर जगल में घूमते हुए चूहों के बिल

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी

७२ [ १.१३.१३० न खा पाएगा। अथवा हमारे साथ तुम्हारा रहना बन्द हुआ; अब हम तेरे साथ न बसेंगे। शेष पहले ही की तरह से है। ————— शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी शृगाल यही भिक्षु था। चूहों का राजा तो मैं ही था। १३०. कोसिय जातक "यथाधाचाव भुञ्जस्सु..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय श्रावस्ती-निवासी एक स्त्री के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह एक श्रद्धालु ब्राह्मण उपासक की ब्राह्मणी थी; बहुत दुश्चरित्र, पापिन। रात को दुराचार करती। दिन में कुछ न कर रोग का बहाना बना बड़बड़ाती हुई लेट रहती। वह ब्राह्मण उससे पूछता—"भद्रे ! तुझे क्या कष्ट है?" "मुझे वायु बींधती है।" "तो तुझे क्या क्या चाहिए?" "चिकने, मीठे, अच्छे, स्वादिष्ट यागु-भात-तेल आदि।" जो जो वह इच्छा करती, ब्राह्मण ला लाकर देता। दास की तरह सब काम करता। लेकिन वह ब्राह्मण के घर आने के समय लेट रहती, बाहर जाने के समय जारों के साथ गुजारती। ब्राह्मण सोचता कि इसके शरीर में चुभनेवाली वायु का अन्त ही होता दिखाई नहीं देता। एक दिन वह गन्ध माला आदि से जेतवन जा शास्ता की वन्दना तथा पूजा

कोसिय ] ७३ पर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा- "क्यों ब्राह्मण दिखाई नहीं देता ?" "भन्ते ! मेरी ब्राह्मणी के शरीर को वायु बीधती है। सो मैं उसके लिए घी-तेल तथा अच्छे अच्छे भोजन योजता हूँ। उसका शरीर मोटा गया है। चमड़ी निखर आई है। लेकिन वात-रोग का अन्त होता नहीं दिखाई देता। मैं उसकी सेवा में ही लगा रहता हूँ। इसी लिए यहाँ आने का अवकाश नहीं मिलता।" शास्ता ने ब्राह्मणी के दुश्चरित्र होने की बात जान कहा- "ब्राह्मण ! इस प्रकार पड़ी हुई स्त्री के रोग के न शान्त होने पर पूर्व-जन्म में भी तुझे बुद्धिमानो ने बताया था कि यह यह ओषधि करनी चाहिए, लेकिन यह पूर्व-जन्म की बात होने के कारण तू उस पर ध्यान नहीं देता।" - उस ब्राह्मण के पूछने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ब्राह्मणो के एक बड़े कुल में पैदा हुए। सयाने होने पर तक्षशिला जा, यहाँ सब विद्याएँ सीख लौटकर बनारस में प्रसिद्ध आचार्य्य हुए। एक सौ राज- धानियो के क्षत्रिय ब्राह्मण कुमार प्रायः उसी के पास विद्याएँ सीखने । एक जनपदवासी ब्राह्मण ने बोधिसत्त्व से तीनो वेद और अट्ठारह विद्याएँ सीखीं। वह वाराणसी में ही बस कर प्रतिदिन दो तीन बार बोधिसत्व के पास आता। उसकी ब्राह्मणी दुश्चरित्र थी, पापिन थी। शेष सारी कथा वर्तमान कथा ही की तरह है। हाँ, बोधिसत्व ने यह सुन कि 'इस कारण से उपदेश सुनने आने का समय नहीं मिलता' और यह समझकर कि वह लडकी उसे धोखा देकर लेट रहती है, उसके अनुकूल औषधि बताने का विचार कर कहा— "तात ! अब से तू उसे दूध, घी, रस आदि मत दे। गोमूत्र में त्रिफला आदि और पांच प्रकार के पत्ते रगड़कर उनका काढ़ा बनाकर ओषधि में ताँबे की गन्ध आने तक ताँबे के नए वर्तन में रख रस्सी, जोत या किसी वृक्ष की ही लता ले उसे जाकर कहना—यह तेरे रोग के लिए उचित दवाई है। या तो इसे पी; नही तो जो भोजन तू करती है उसके अनुसार काम कर। और यह गाथा भी कहना। यदि दवाई न पीए तो उसे रस्सी से या जोत से अथवा लता से कुछ

७४ [ १.१३.१३० प्रहार लगाकर, केसो से पकड़कर, खींचकर कोहनी से पीटना। उसी समय उठकर वह काम करने लगेगी।" . उसने 'अच्छा' कह स्वीकार कर कथनानुसार ओषधि बना कहा—भद्रे ! यह ओषधि पी।' “यह ओषधि तुझे किसने कही ?” “आचार्य ने, भद्रे !” “इसे ले जाओ, नहीं पीऊँगी।” ब्राह्मण ने कहा, तू स्वेच्छा से नहीं पीएगी। रस्सी लेकर बोला, या तो रोग के अनुसार दवाई पी अथवा यवागु-भात के अनुसार काम कर। इतना कह यह गाथा कही— यथावाचाय भुञ्जस्सु यथाभुतञ्च व्याहर, उभयं ते न समेति वाचा भुतञ्च कोसिये ॥ [ जैसे कहती है, वैसे दवाई पी, अथवा जैसे खाती है वैसे काम कर,। कोसिये ! तेरी वाणी और तेरे भोजन का मेल नहीं बैठता ।]

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के

कोसिय ] ७५ ली। अब मैं ऐसा नहीं कर सकती। आचार्य के प्रति गौरव होने से उसने पाप-कर्म करना छोड़ दिया और शीलवान् हो गई। उस ब्राह्मणी ने भी सोचा कि अब मुझे सम्यक् सम्बुद्ध ने जान लिया। उसने भी फिर शास्ता के प्रति गौरव का भाव होने से दुराचार नहीं किया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के पति-पत्नी अब के पति-पत्नी थे। आचार्य मैं ही था।

१३१. असम्पदान जातक

पहला परिच्छेद १४. असम्पदान वर्ग १३१. असम्पदान जातक "असम्पदानेनितरीतस्स..." यह (गाथा) शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय भिक्षु धर्मसभा में बैठे बातचीत कर रहे थे—आयुष्मानो ! देवदत्त अकृतज्ञ है। तथागत के सद्गुणो को नही जानता। शास्ता न आकर पूछा— "भिक्षुओ ! अब बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, देवदत्त केवल अभी अकृतज्ञ नहीं है, पहले भी अकृतज्ञ ही रहा है।" —इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल मे मगधदेश के राजगृह नगर में किसी मगधनरेश के राज्य करते समय बोधिसत्त्व उस (राजा) के ही सेठ थे। उनके पास अस्सी करोड धन था। नाम था सङ्घसेठ। वाराणसी मे भी पिल्लिय सेठ नामक सेठ था। उसके पास भी अस्सी करोड धन था। वे दोनो परस्पर मित्र थे। उनमें से वाराणसी के पिल्लिय सेठ को किसी कारण से कोई खतरा आ पडा। तमाम जायदाद नष्ट हो गई। वह दरिद्र हो गया। आश्रयरहित

असम्यदान ] ७७

रह गया। तब वह अपनी स्त्री को ले, सङ्गसेठ के पास आने के विचार से वाराणसी से निकल पैदल ही राजगृह पहुँच सङ्गसेठ के घर गया। उसने उसे देखते ही 'मेरा मित्र आया है' पहचान गले मिल आदर सत्कार करवाया। फिर कुछ दिन बिताकर पूछा—"मित्र कैसे आए?" "सौम्य, मुझ पर खतरा आ पडा। मेरा सब धन नष्ट हो गया। मुझे सहारा दे।" "मित्र, अच्छा डरें मत" कह उसने खजाना खुलवा चालीस करोड हिरण्य दिलवा उसके साथ अपने पास जो कुछ भी वस्त्र आदि तथा जानदार और बेजान वस्तु थी सभी बांटकर आधी आधी दी। वह उस धन को ले फिर वारा- णसी लौट रहने लगा। आगे चलकर सङ्गसेठ पर भी वैसा ही खतरा आ पडा। उसने अपने लिए सहारा ढूंढते हुए सोचा—मैने अपने मित्र का बहुत उपकार किया। आधी जायदाद दे दी। वह मुझे देखकर त्यागेगा नही। मैं उसके पास चलूँ। उसने अपनी स्त्री के साथ पैदल ही वाराणसी पहुँचकर कहा—भद्रे, तेरे लिए यह अच्छा नही है कि तू मेरे साथ गली गली भटके। मै जाकर सवारी भेजूंगा, तू पीछे उस पर बडे ठाट से आना। उसे एक शाला में बिठा स्वय नगर में दाखिल हुआ। सेठ के घर पहुँच सूचना भिजवाई कि राजगृह से तुम्हारा मित्र आया है। सेठ बोला—आ जाए। उसे देखकर न वह आसन से उठा न स्वागत ही किया, केवल इतना पूछा—"क्यो आया है?" "तुम्हें देखने आया हूँ।" "निवास स्थान कहीं ठीक किया है?" "अभी कही ठीक नही हुआ है। सेठानी को शाला में बिठाकर आया हूँ।" "यहाँ तुम्हारे ठहरने को जगह नही। सीधा लेकर किसी जगह पका खाकर चले जाओ। फिर मेरे पास न आना"—इतना कह अपने एक दास को आज्ञा दी कि मेरे मित्र के पल्ले में एक तूम्बा भर भूसा बाँध दो। उसी दिन उसने एक हजार गाडी लाल चावल छटवाकर कोठे भरे थे। चालीस करोड धन लेकर आए अकृतज्ञ महाचोर ने मित्र को केवल एक तूम्बा भर भुस दिलवाया। दास एक टोकरी मे तूम्बा भर भुस डाल वोधिसत्व के पास गया।

७८ [ १.१४.१३१ बोधिसत्व ने सोचा—यह असत्पुरुष मेरे पास से चालीस करोड़ धन पाकर अब तूम्बा भर भूसा दे रहा है। इसे लूँ अथवा न लूँ ? उसे विचार हुआ— यह तो अकृतज्ञ है, मित्रद्रोही है, कृत उपकार को भूलकर इसने मेरे साथ मैत्री- सम्बन्ध तोड़ डाला है। यदि में इसका दिया तूम्बा भर भूसा बुरा होने के कारण नही ग्रहण करता हूँ, तो में भी मैत्री सम्बन्ध को तोडनेवाला होता हूँ । इसलिए मै इसके दिए तूम्बा भर भूसे को ग्रहण कर अपनी ओर से मैत्री-भाव की प्रतिष्ठा करूँगा । उसने तूम्बा भर भूसे को अपने पल्ले में बांध लिया और महल से उतर शाला को गया । स्त्री न पूछा—आर्य्य, तुम्हें क्या मिला ? "भद्रे ! हमारे मित्र पिल्लिय सेठ ने हमें तूम्बा भर भूसा दे आज ही विदा कर दिया ।” उसने रोना प्रारम्भ किया—आर्य्य ! इसे लिया ही क्यो ? क्या चालीस करोड़ धन का बदला यही है ? बोधिसत्त्व ने कहा—भद्रे, रो मत । मैने अपनी ओर से मैत्री-सम्बन्ध न टूटने देने के लिए, अपनी ओर से उसे बनाए रखने के लिए ग्रहण किया है । तू क्यों सोच करती हैं । —इतना कह यह गाथा कही— असम्पदानेनितरीतरस्स बालस्स मित्तानि कती भवन्ति, तस्मा हरामि भुसं अद्धमानं मा मे मित्ति ओपिय सस्सतायं ॥ [ऐसी वैसी वस्तु स्वीकार न करने से मूर्ख आदमी के मित्र मित्र नहीं रहते । इसीलिए में अर्धमान भूसा ले आया हूँ । मेरा मैत्री-सम्बन्ध न टूटे । यह शास्वत बना रहे ।] असम्पदानेन, परस्पर का लोप होकर सन्धि हुई है, अर्थ है ग्रहण न करने से । इतरीतरस्स, जिस किसी अच्छी बुरी चीज के । बालस्स मित्तानि कसी भवन्ति, मूढ, अप्रज्ञावान् के मित्र स्खलित हो जाते हैं, मनहूस से हो जाते हैं,

धम्मपददान ] ७६ मतलब टूट जाते हैं। तस्मा हरामि भुसं अटुठमानं, इसी कारण रो प्रकट करता हूँ कि मैं मित्र का दिया हुआ तूम्बा भर भुस ले आया हूँ। आठ नाळि को मान कहते हैं। चार नाळियों को अर्ध-मान; और चार ही नाळियो को तूम्बा; इसी लिए कहा तूम्बा भर भूसा। मा ने मित्ति जीयित्य सस्मताय, मेरे मित्र से मेरा मैत्री भाव न टूटे। हमेशा बना रहे। ऐसा कहने पर भी सेठानी रोती ही रही। उसी समय सङ्घसेठ द्वारा पीळिय सेठ को दिया गया एक दास शाला के दरवाजे के पास से गुजर रहा था। उसने सेठानी के रोने की आवाज सुनी। अन्दर जाकर जब उसने देखा कि उसके स्वामी है तो पैरो पर गिर पडा और रोने-चिल्लाने लगा। उसने पूछा- "स्वामी ! यहाँ कैसे आए ?" सेठ ने सब हाल कह दिया। दास बोला -स्वामी, हो, चिन्ता न करें। इस प्रकार दोनों को दिलासा दे अपने घर ले गया। वहाँ सुगन्धित जल से नहलाया, खिलाया। फिर अन्य सब दासों को खबर कर दी कि स्वामी आए हैं। कुछ दिन बिताकर सभी दासो की राय से वह राजा के यहाँ पहुँचा और शोर किया। राजा ने बुलवाकर पूछा- यह क्या है ? उन्होंने यह सब हाल राजा को कह दिया। राजा ने उनकी बात सुन दोनो सेठो को बुलवा सङ्घसेठ को पूछा- "महासेठ ! क्या तूने सचमुच पिळिय सेठ को चालीस करोड धन दिया ?" "महाराज ! मेरी आशा लगा जब मेरा मित्र मेरे पास राजगृह आया तो मैंने उसे न केवल चालीस करोड धन ही दिया बल्कि जितना भी मेरे पास धन था, चाहे जानदार चाहे बेजान सभी के दो बराबर हिस्से कर एक हिस्सा दिया।" राजा ने पिळिय सेठ से पूछा- क्या यह सच है ? "देव ! हाँ ठीक है।" "तेरी ही आशा लगाकर तेरे पास आनेपर तूने भी इसका कोई सत्कार सम्मान किया ?" वह चुप रहा। "तूने तूम्बा भर भूसा इसके पल्ले में ढलवाकर दिया है ?"

८० [ १.१४.१३२ उसे भी सुनकर वह चुप ही रहा। राजा ने मन्त्रियों के साथ सलाह करके कि क्या करना चाहिए, सेठ की निन्दा कर आज्ञा दी—जाओ, पिल्लिय सेठ के घर में जितना धन है, वह सब सङ्गसेठ को दे दो। वोधिसत्त्व ने कहा—महाराज ! मुझे पराया धन नहीं चाहिए। जितना धन मैंने दिया है, उतना ही दिलवा दें। राजा ने बोधिसत्त्व का धन दिलवा दिया। बोधिसत्त्व ने अपना दिया हुआ सब धन ले दास-समूह सहित राजगृह जाकर कुटुम्ब बसाया। फिर दान आदि पुण्य कर्म करते हुए कर्मानुसार परलोक सिधारे। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पिल्लिय सेठ देवदत्त था। सङ्गसेठ तो मैं ही था। १३२. पञ्चगरुक जातक "कुसलोपदेसे पितिया दळहाय च..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय अजपाल न्यग्रोध (वृक्ष) के नीचे मार-कुमारियों द्वारा प्रलोभित किए जाने के सूत्र के बारे में कही। भगवान् आरम्भ से ही ऐसे थे— वड्ढलमाना आगच्छु तण्हा च अरती रगा, ता तत्थ पनुदी सत्था तूल भट्ठंव मारुतो ॥१ [तण्हा, अरति और रगा (मारकन्याएँ) प्रभास फैलाती हुई आईं। शास्ता ने उनको ऐसे दूर भगा दिया जैसे हवा उड़ती हुई रूई को।] १ सयुत्त-निकाय, मार-सयुत्त ।

पञ्चगरुक ] ८१ इस प्रकार उस सूत्र को अन्त तक कहने के समय धर्म-सभा में एकत्र हुए भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो, सम्यक् सम्बुद्ध के पास मारकन्याएँ सैंकड़ों प्रकार के दिव्य रूप बनाकर लुभाने के लिए आईं। लेकिन उन्होंने आँख खोलकर भी नहीं देखा। अहो ! बुद्ध-बल अद्भुत है। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, इस समय मेरे सभी आश्रवों को नष्ट कर सर्वज्ञता प्राप्त किए रहने पर मार कन्याओं के न देखने में कुछ भी आश्चर्य नहीं है। पूर्व समय में बुद्धत्व प्राप्ति की खोज में लगे हुए रहने पर चित्त मैल के रहते हुए भी निर्मित दिव्य रूप को आँख उघाड़कर कामुक भाव से न देख, जाकर महाराज्य प्राप्त किया था। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व सौ भाइयों में सबसे छोटे थे। सारी कथा उपरोक्त तक्कसिला जातक¹ के अनुसार विस्तारपूर्वक कहनी चाहिए। उस समय तक्षशिला नगर निवासियो ने नगर के बाहर शाला में (बैठे हुए) बोधिसत्त्व के पास जा, स्वीकृति ले उन्हें राज्य का भार सौंप अभिषेक किया। फिर उन्होंने नगर को देवनगर की तरह तथा राजभवन को इन्द्रभवन की तरह अलंकृत किया। उस समय बोधिसत्त्व नगर में प्रविष्ट हो राजभवन के महल के ऊँचे तल पर श्वेत छत्र के नीचे श्रेष्ठ रतन सिंहासन पर चढ़ देवेन्द्र की तरह बैठे। अमात्य, ब्राह्मण गृहपति आदि तथा सभी अलंकारों से अलंकृत क्षत्रियकुमार उसे घेर कर खड़े थे। देव अप्सराओं के समान नृत्य-गीत तथा वाद्य में कुशल, उत्तम हाव भाव वाली सोलह हजार नर्तकियों ने गाना बजाना किया। ¹ तक्कसिला=तेलपत्त जातक (९६) ६

८२ [ १.१४.१३२ गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से महासमुद्र की घोस भर जाए। तब बोधिसत्त्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए दिव्य-रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही— कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, न रक्खसीनं वसमागमिम्हा स सोत्थिभायो महता भयेन मे ॥ [ सदुपदेश पर दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन में स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। मै बडे भारी भय से बच गया (सकुशल रहा) ।] कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से; प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार (चलकर) । धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से वा स्थिर अखण्डित धीर्य्य से । अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय कहते हैं चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कंपा देनेवाला भय। यह दोनो बोधिसत्त्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती हैं— इस भय के कारण के उत्पन्न होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि- तत्ताभयभीरुताय च । भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से । नरक्खसीनं वसमागमिम्हा, यक्ष- कान्तार मे उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए, इसलिए राक्षसियो के वश में नही आए—यही भाव है। स सोत्थि भायो महता भयेन मे. सो आज मुझेयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले दुःख दौर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।

८२ [ १.१४.१३२ गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से महासमुद्र की कोक्ष भर जाए। तब बोधिसत्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए दिव्य-रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही— कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च अवत्थिसत्ताभयभीरुताय च, न रक्खसीन वसमागमिम्हा स सोत्थिभावो महता भयेन मे ॥ [ सदुपदेश पर दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन में स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। मै बडे भारी भय से बच गया (सकुशल रहा) ।] कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से, प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार (चलकर) । धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से वा स्थिर अखण्डित वीर्य से। अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय कहते है चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कँपा देनेवाला भय। यह दोनो बोधिसत्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती है— इस भय के कारण के उत्पन्न होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि- तत्ताभयभीरुताय च। भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से। नरक्खसीनं वसमागमिम्हा, यक्ष- कान्तार मे उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए, इसलिए राक्षसियो के वश मे नही आए—यही भाव है। स सोत्थि भावो महता भयेन मे. सो आज मुझेयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले दुःख दोर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।