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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१३१. असम्पदान जातक

पहला परिच्छेद १४. असम्पदान वर्ग १३१. असम्पदान जातक "असम्पदानेनितरीतस्स..." यह (गाथा) शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय भिक्षु धर्मसभा में बैठे बातचीत कर रहे थे—आयुष्मानो ! देवदत्त अकृतज्ञ है। तथागत के सद्गुणो को नही जानता। शास्ता न आकर पूछा— "भिक्षुओ ! अब बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, देवदत्त केवल अभी अकृतज्ञ नहीं है, पहले भी अकृतज्ञ ही रहा है।" —इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल मे मगधदेश के राजगृह नगर में किसी मगधनरेश के राज्य करते समय बोधिसत्त्व उस (राजा) के ही सेठ थे। उनके पास अस्सी करोड धन था। नाम था सङ्घसेठ। वाराणसी मे भी पिल्लिय सेठ नामक सेठ था। उसके पास भी अस्सी करोड धन था। वे दोनो परस्पर मित्र थे। उनमें से वाराणसी के पिल्लिय सेठ को किसी कारण से कोई खतरा आ पडा। तमाम जायदाद नष्ट हो गई। वह दरिद्र हो गया। आश्रयरहित

असम्यदान ] ७७

रह गया। तब वह अपनी स्त्री को ले, सङ्गसेठ के पास आने के विचार से वाराणसी से निकल पैदल ही राजगृह पहुँच सङ्गसेठ के घर गया। उसने उसे देखते ही 'मेरा मित्र आया है' पहचान गले मिल आदर सत्कार करवाया। फिर कुछ दिन बिताकर पूछा—"मित्र कैसे आए?" "सौम्य, मुझ पर खतरा आ पडा। मेरा सब धन नष्ट हो गया। मुझे सहारा दे।" "मित्र, अच्छा डरें मत" कह उसने खजाना खुलवा चालीस करोड हिरण्य दिलवा उसके साथ अपने पास जो कुछ भी वस्त्र आदि तथा जानदार और बेजान वस्तु थी सभी बांटकर आधी आधी दी। वह उस धन को ले फिर वारा- णसी लौट रहने लगा। आगे चलकर सङ्गसेठ पर भी वैसा ही खतरा आ पडा। उसने अपने लिए सहारा ढूंढते हुए सोचा—मैने अपने मित्र का बहुत उपकार किया। आधी जायदाद दे दी। वह मुझे देखकर त्यागेगा नही। मैं उसके पास चलूँ। उसने अपनी स्त्री के साथ पैदल ही वाराणसी पहुँचकर कहा—भद्रे, तेरे लिए यह अच्छा नही है कि तू मेरे साथ गली गली भटके। मै जाकर सवारी भेजूंगा, तू पीछे उस पर बडे ठाट से आना। उसे एक शाला में बिठा स्वय नगर में दाखिल हुआ। सेठ के घर पहुँच सूचना भिजवाई कि राजगृह से तुम्हारा मित्र आया है। सेठ बोला—आ जाए। उसे देखकर न वह आसन से उठा न स्वागत ही किया, केवल इतना पूछा—"क्यो आया है?" "तुम्हें देखने आया हूँ।" "निवास स्थान कहीं ठीक किया है?" "अभी कही ठीक नही हुआ है। सेठानी को शाला में बिठाकर आया हूँ।" "यहाँ तुम्हारे ठहरने को जगह नही। सीधा लेकर किसी जगह पका खाकर चले जाओ। फिर मेरे पास न आना"—इतना कह अपने एक दास को आज्ञा दी कि मेरे मित्र के पल्ले में एक तूम्बा भर भूसा बाँध दो। उसी दिन उसने एक हजार गाडी लाल चावल छटवाकर कोठे भरे थे। चालीस करोड धन लेकर आए अकृतज्ञ महाचोर ने मित्र को केवल एक तूम्बा भर भुस दिलवाया। दास एक टोकरी मे तूम्बा भर भुस डाल वोधिसत्व के पास गया।

७८ [ १.१४.१३१ बोधिसत्व ने सोचा—यह असत्पुरुष मेरे पास से चालीस करोड़ धन पाकर अब तूम्बा भर भूसा दे रहा है। इसे लूँ अथवा न लूँ ? उसे विचार हुआ— यह तो अकृतज्ञ है, मित्रद्रोही है, कृत उपकार को भूलकर इसने मेरे साथ मैत्री- सम्बन्ध तोड़ डाला है। यदि में इसका दिया तूम्बा भर भूसा बुरा होने के कारण नही ग्रहण करता हूँ, तो में भी मैत्री सम्बन्ध को तोडनेवाला होता हूँ । इसलिए मै इसके दिए तूम्बा भर भूसे को ग्रहण कर अपनी ओर से मैत्री-भाव की प्रतिष्ठा करूँगा । उसने तूम्बा भर भूसे को अपने पल्ले में बांध लिया और महल से उतर शाला को गया । स्त्री न पूछा—आर्य्य, तुम्हें क्या मिला ? "भद्रे ! हमारे मित्र पिल्लिय सेठ ने हमें तूम्बा भर भूसा दे आज ही विदा कर दिया ।” उसने रोना प्रारम्भ किया—आर्य्य ! इसे लिया ही क्यो ? क्या चालीस करोड़ धन का बदला यही है ? बोधिसत्त्व ने कहा—भद्रे, रो मत । मैने अपनी ओर से मैत्री-सम्बन्ध न टूटने देने के लिए, अपनी ओर से उसे बनाए रखने के लिए ग्रहण किया है । तू क्यों सोच करती हैं । —इतना कह यह गाथा कही— असम्पदानेनितरीतरस्स बालस्स मित्तानि कती भवन्ति, तस्मा हरामि भुसं अद्धमानं मा मे मित्ति ओपिय सस्सतायं ॥ [ऐसी वैसी वस्तु स्वीकार न करने से मूर्ख आदमी के मित्र मित्र नहीं रहते । इसीलिए में अर्धमान भूसा ले आया हूँ । मेरा मैत्री-सम्बन्ध न टूटे । यह शास्वत बना रहे ।] असम्पदानेन, परस्पर का लोप होकर सन्धि हुई है, अर्थ है ग्रहण न करने से । इतरीतरस्स, जिस किसी अच्छी बुरी चीज के । बालस्स मित्तानि कसी भवन्ति, मूढ, अप्रज्ञावान् के मित्र स्खलित हो जाते हैं, मनहूस से हो जाते हैं,

धम्मपददान ] ७६ मतलब टूट जाते हैं। तस्मा हरामि भुसं अटुठमानं, इसी कारण रो प्रकट करता हूँ कि मैं मित्र का दिया हुआ तूम्बा भर भुस ले आया हूँ। आठ नाळि को मान कहते हैं। चार नाळियों को अर्ध-मान; और चार ही नाळियो को तूम्बा; इसी लिए कहा तूम्बा भर भूसा। मा ने मित्ति जीयित्य सस्मताय, मेरे मित्र से मेरा मैत्री भाव न टूटे। हमेशा बना रहे। ऐसा कहने पर भी सेठानी रोती ही रही। उसी समय सङ्घसेठ द्वारा पीळिय सेठ को दिया गया एक दास शाला के दरवाजे के पास से गुजर रहा था। उसने सेठानी के रोने की आवाज सुनी। अन्दर जाकर जब उसने देखा कि उसके स्वामी है तो पैरो पर गिर पडा और रोने-चिल्लाने लगा। उसने पूछा- "स्वामी ! यहाँ कैसे आए ?" सेठ ने सब हाल कह दिया। दास बोला -स्वामी, हो, चिन्ता न करें। इस प्रकार दोनों को दिलासा दे अपने घर ले गया। वहाँ सुगन्धित जल से नहलाया, खिलाया। फिर अन्य सब दासों को खबर कर दी कि स्वामी आए हैं। कुछ दिन बिताकर सभी दासो की राय से वह राजा के यहाँ पहुँचा और शोर किया। राजा ने बुलवाकर पूछा- यह क्या है ? उन्होंने यह सब हाल राजा को कह दिया। राजा ने उनकी बात सुन दोनो सेठो को बुलवा सङ्घसेठ को पूछा- "महासेठ ! क्या तूने सचमुच पिळिय सेठ को चालीस करोड धन दिया ?" "महाराज ! मेरी आशा लगा जब मेरा मित्र मेरे पास राजगृह आया तो मैंने उसे न केवल चालीस करोड धन ही दिया बल्कि जितना भी मेरे पास धन था, चाहे जानदार चाहे बेजान सभी के दो बराबर हिस्से कर एक हिस्सा दिया।" राजा ने पिळिय सेठ से पूछा- क्या यह सच है ? "देव ! हाँ ठीक है।" "तेरी ही आशा लगाकर तेरे पास आनेपर तूने भी इसका कोई सत्कार सम्मान किया ?" वह चुप रहा। "तूने तूम्बा भर भूसा इसके पल्ले में ढलवाकर दिया है ?"

८० [ १.१४.१३२ उसे भी सुनकर वह चुप ही रहा। राजा ने मन्त्रियों के साथ सलाह करके कि क्या करना चाहिए, सेठ की निन्दा कर आज्ञा दी—जाओ, पिल्लिय सेठ के घर में जितना धन है, वह सब सङ्गसेठ को दे दो। वोधिसत्त्व ने कहा—महाराज ! मुझे पराया धन नहीं चाहिए। जितना धन मैंने दिया है, उतना ही दिलवा दें। राजा ने बोधिसत्त्व का धन दिलवा दिया। बोधिसत्त्व ने अपना दिया हुआ सब धन ले दास-समूह सहित राजगृह जाकर कुटुम्ब बसाया। फिर दान आदि पुण्य कर्म करते हुए कर्मानुसार परलोक सिधारे। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पिल्लिय सेठ देवदत्त था। सङ्गसेठ तो मैं ही था। १३२. पञ्चगरुक जातक "कुसलोपदेसे पितिया दळहाय च..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय अजपाल न्यग्रोध (वृक्ष) के नीचे मार-कुमारियों द्वारा प्रलोभित किए जाने के सूत्र के बारे में कही। भगवान् आरम्भ से ही ऐसे थे— वड्ढलमाना आगच्छु तण्हा च अरती रगा, ता तत्थ पनुदी सत्था तूल भट्ठंव मारुतो ॥१ [तण्हा, अरति और रगा (मारकन्याएँ) प्रभास फैलाती हुई आईं। शास्ता ने उनको ऐसे दूर भगा दिया जैसे हवा उड़ती हुई रूई को।] १ सयुत्त-निकाय, मार-सयुत्त ।

पञ्चगरुक ] ८१ इस प्रकार उस सूत्र को अन्त तक कहने के समय धर्म-सभा में एकत्र हुए भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो, सम्यक् सम्बुद्ध के पास मारकन्याएँ सैंकड़ों प्रकार के दिव्य रूप बनाकर लुभाने के लिए आईं। लेकिन उन्होंने आँख खोलकर भी नहीं देखा। अहो ! बुद्ध-बल अद्भुत है। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, इस समय मेरे सभी आश्रवों को नष्ट कर सर्वज्ञता प्राप्त किए रहने पर मार कन्याओं के न देखने में कुछ भी आश्चर्य नहीं है। पूर्व समय में बुद्धत्व प्राप्ति की खोज में लगे हुए रहने पर चित्त मैल के रहते हुए भी निर्मित दिव्य रूप को आँख उघाड़कर कामुक भाव से न देख, जाकर महाराज्य प्राप्त किया था। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व सौ भाइयों में सबसे छोटे थे। सारी कथा उपरोक्त तक्कसिला जातक¹ के अनुसार विस्तारपूर्वक कहनी चाहिए। उस समय तक्षशिला नगर निवासियो ने नगर के बाहर शाला में (बैठे हुए) बोधिसत्त्व के पास जा, स्वीकृति ले उन्हें राज्य का भार सौंप अभिषेक किया। फिर उन्होंने नगर को देवनगर की तरह तथा राजभवन को इन्द्रभवन की तरह अलंकृत किया। उस समय बोधिसत्त्व नगर में प्रविष्ट हो राजभवन के महल के ऊँचे तल पर श्वेत छत्र के नीचे श्रेष्ठ रतन सिंहासन पर चढ़ देवेन्द्र की तरह बैठे। अमात्य, ब्राह्मण गृहपति आदि तथा सभी अलंकारों से अलंकृत क्षत्रियकुमार उसे घेर कर खड़े थे। देव अप्सराओं के समान नृत्य-गीत तथा वाद्य में कुशल, उत्तम हाव भाव वाली सोलह हजार नर्तकियों ने गाना बजाना किया। ¹ तक्कसिला=तेलपत्त जातक (९६) ६

८२ [ १.१४.१३२ गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से महासमुद्र की घोस भर जाए। तब बोधिसत्त्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए दिव्य-रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही— कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, न रक्खसीनं वसमागमिम्हा स सोत्थिभायो महता भयेन मे ॥ [ सदुपदेश पर दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन में स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। मै बडे भारी भय से बच गया (सकुशल रहा) ।] कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से; प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार (चलकर) । धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से वा स्थिर अखण्डित धीर्य्य से । अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय कहते हैं चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कंपा देनेवाला भय। यह दोनो बोधिसत्त्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती हैं— इस भय के कारण के उत्पन्न होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि- तत्ताभयभीरुताय च । भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से । नरक्खसीनं वसमागमिम्हा, यक्ष- कान्तार मे उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए, इसलिए राक्षसियो के वश में नही आए—यही भाव है। स सोत्थि भायो महता भयेन मे. सो आज मुझेयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले दुःख दौर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।

८२ [ १.१४.१३२ गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से महासमुद्र की कोक्ष भर जाए। तब बोधिसत्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए दिव्य-रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही— कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च अवत्थिसत्ताभयभीरुताय च, न रक्खसीन वसमागमिम्हा स सोत्थिभावो महता भयेन मे ॥ [ सदुपदेश पर दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन में स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। मै बडे भारी भय से बच गया (सकुशल रहा) ।] कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से, प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार (चलकर) । धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से वा स्थिर अखण्डित वीर्य से। अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय कहते है चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कँपा देनेवाला भय। यह दोनो बोधिसत्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती है— इस भय के कारण के उत्पन्न होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि- तत्ताभयभीरुताय च। भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से। नरक्खसीनं वसमागमिम्हा, यक्ष- कान्तार मे उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए, इसलिए राक्षसियो के वश मे नही आए—यही भाव है। स सोत्थि भावो महता भयेन मे. सो आज मुझेयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले दुःख दोर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मैं उस समय

घंतासन ] ८३ इस प्रकार बोधिसत्त्व इस गाथा से धर्मोपदेश कर धर्मानुसार राज्य कर दानादि पुण्य करते हुए कर्मानुसार परलोक गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मैं उस समय तक्षशिला जाकर राज्य प्राप्त करनेवाला कुमार था। १३३. घतासन जातक “खेम योंह...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह भिक्षु बुद्ध से कर्मस्थान ग्रहण कर प्रत्यन्त देश में जा एक गाँव के पास एक आरण्यक निवासस्थान में रहने लगा। पहले ही महीने में जब वह भिक्षा माँगने गया था, उसकी पर्णकुटी में आग लग गई। निवासस्थान के अभाव में कष्ट पाते हुए उसने उपस्थायको से कहा। वे बोले—'अच्छा, भन्ते पर्णशाला बनाएँगे। अभी तो हल जोत रहे हैं। अभी बो रहे हैं, इस प्रकार कहते कहते उन्होंने तीन महीने बिता दिए।' निवासस्थान की अनुकूलता न होने से वह भिक्षु कर्मस्थान को पूरा नहीं कर सका। उसे निमित्त¹ तक प्राप्त नहीं हुआ। वर्षावास की समाप्ति पर वह जेतवन गया और वहाँ शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने उसके साथ बातचीत करते हुए पूछा—क्या भिक्षु ! तेरा कर्मस्थान सफल ¹ ध्यान के विषय (object) का आंख बन्द कर लेने पर दिखाई देने वाला आकार।

८२ [ १.१४.१३२ गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से महासमुद्र की कोख भर जाए। तब बोधिसत्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए दिव्य रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही— कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, न रक्खसीन वसमगमिरम्हा स सोत्थिभावो महता भयेन मे ॥ [ सदुपदेश पर दृढता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन मे स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। में बडे भारी भय से बच गया (सकुशल रहा)।]

कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से, प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार (चलकर)। धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से या स्थिर अखण्डित वीर्य्य से। अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय कहते हे चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कँपा देनेवाला भय। यह दोनो बोधिसत्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती हैं— इस भय के कारण के उत्पन होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि- तत्ताभयभीरुताय च। भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से। नरक्खसीन वसमगमिरम्हा, यक्ष- कान्तार में उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए, इसलिए राक्षसियो के वश में नही आए--यही भाव है। स सोत्थि भावो महता भयेन मे सो आज मुझयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले दु ख दोर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मै उस समय

घंतासन ] ८३ इस प्रकार बोधिसत्त्व इस गाथा से धर्मोपदेश कर धर्मानुसार राज्य कर दानादि पुण्य करते हुए कर्मानुसार परलोक गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मै उस समय तक्षशिला जाकर राज्य प्राप्त करनेवाला कुमार था। १३३. घतासन जातक “खेमं यहिं...” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह भिक्षु बुद्ध से कर्मस्थान ग्रहण कर प्रत्यन्त देश मे जा एक गाँव के पास एक आरण्यक निवासस्थान में रहने लगा। पहले ही महीने में जब यह भिक्षा माँगने गया था, उसकी पर्णकुटी में आग लग गई। निवासस्थान के अभाव में कष्ट पाते हुए उसने उपस्थापको से कहा। वे बोले—'अच्छा, भन्ते पर्णशाला बनाएँगे। अभी तो हल जोत रहे हैं। अभी बो रहे हैं; इस प्रकार कहते कहते उन्होने तीन महीने बिता दिए।' निवासस्थान की अनुकूलता न होने से वह भिक्षु कर्मस्थान को पूरा नहीं कर सका। उसे निमित्त¹ तक प्राप्त नही हुआ। वर्षावास की समाप्ति पर वह जेतवन गया और वहीं शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने उसके साथ बातचीत करते हुए पूछा—क्यो भिक्षु ! तेरा कर्मस्थान सफल ¹ ध्यात, ज्ञे. विषय (Object), का, आँख बन्द कर लेने पर, दिखाई देने वाला आकार।

फिर उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—

हुआ ? उसने प्रारम्भ से लेकर प्रतिकूलता की सब बात कही । शास्ता ने कहा--भिक्षु ! पूर्व समय मे जानवरो ने भी अपनी अनुकूलता प्रतिकूलता देख, अनुकूल रहने पर उस जगह रह, प्रतिकूल प्रतीत होने पर उसे छोड दिया और दूसरी जगह चले गए । तू ने क्यो अपनी अनुकूलता प्रतिकूलता न समझी ? फिर उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्वकाल में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व पक्षी होकर पैदा हुए । बडे होने पर सौभाग्यशाली पक्षि-राजा हो एक जगल में एक तालाब के किनारे शाखा प्रशाखाओ से युक्त तथा बहुत पत्तोवाले एक महान्-वृक्ष पर अनेक अनुचरो सहित रहने लगे । बहुत से पक्षी पानी पर फैली हुई शाखाओ पर रहते हुए अपनी बीट पानी मे गिरा देते थे । उस तालाब मे एक प्रचण्ड नाग-राज रहता था । उसके मन में आया कि यह पक्षिगण मेरे निवासस्थान तालाब में बीट गिराते है । में पानी मे से आग पैदा कर इस वृक्ष को जला इन्हें यहाँ से भगाऊँ । उसने क्रुद्ध हो रात को जिस समय सब पक्षिगण इकट्ठे हो वृक्ष की शाखाओ पर सो रहे थे, पहले चूल्हे पर रक्खे पानी की तरह बुलबुले पैदा कर, दूसरी बार धुआँ उठा, तीसरी बार ताड के वृक्ष जितनी ऊँची ज्वाला उठाई । बोधिसत्त्व ने कहा—"पक्षिगण ! आग से जलने पर पानी से बुझाया जाता है, लेकिन अब पानी ही जलने लगा है इसलिए यहाँ नही रह सक्ते । अन्यत्र चले ।" इतना कह, यह गाथा कही— खेमं यहिं तत्थ घरी उदीरितो उदकस्स मज्झे जलते घतासनो, न अज्ज वासो महिया महीरुहे दिसा भजव्हो सरणज्ज नो भय ॥ [ जहाँ कल्याण था, वही शत्रु पैदा हो गया । पानी में आग जलने लगी । आज पृथ्वी से उगे वृक्ष पर रहना नहीं होगा । (किसी दूसरी) दिशा को चलो। जिस जगह हम ने शरण ली थी वहाँ से भय पैदा हो गया । ]

भानसोधन ] ८५ सेमें याँहि तत्थ अरी उदीरितो, जिस पानी में हमारा कल्याण था, जहाँ निर्भयता थी, वही से विरोधी, शत्रु पैदा हो गया । उदरस्स, पानी के, घतासनो, अग्नि । वह घृत खाती है, इसी लिए घतासन कहलाई । न अज्ज वासो, आज हमारा रहना नहीं है । महिया महीरुहे, महीरुह कहते हैं वृक्ष को, उस इस पृथ्वी में से पैदा हुए वृक्ष में । दिसा भजव्हो, दिशाओं में जाओ । सरणञ्च नो भय, आज हमारे शरणस्थान से ही भय पैदा हो गया । प्रतिशरणस्थान ही भय का जनक हो गया ।

ऐसा कह बोधिसत्व अपना कहना मानने वाले पक्षियों को लेकर अन्यत्र चले गए । बोधिसत्व का कहना न मान जो पक्षीगण वहीं रहे वह मर गए । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला चार आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । आर्य-सत्यों के प्रकाशन के अंत में वह भिक्षु अर्हत् हो गया । उस समय बोधिसत्व का कहना मानने वाले पक्षीगण बुद्ध परिषद हुई । पक्षि-राजा तो मैं ही था । १३४. भानसोधन जातक “ये सञ्चिन्नो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय सङ्कस्स नगर द्वार पर सक्षेप में पूछे गए प्रश्न की धर्मसेनापति (सारिपुत्र) द्वारा विस्तृत व्याख्या के बारे में कही । अतीत कथा इस प्रकार है— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणमी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने एकान्त जगल में मृत्यु को प्राप्त होते समय शिष्यो के पूछने पर सक्षेप से उत्तर

८६ [ १.१४.१३४ दिया—नेवसञ्जानासञ्जी...तपस्वियों को ज्येष्ठ-शिष्य की बात समझ मे नही आई। बोधिसत्व ने आभास्वर (-लोक) से आ आकाश में ठहर यह गाथा कही— ये सञ्जिनो तेपि दुग्गता येपि असञ्जिनो तेपि दुग्गता, एतं उभयं विवज्जय तं समापत्तिसुखं अनङ्गणं ॥ [जो सञ्जि है, उनकी भी दुर्गति है। जो असञ्जि हैं, उनकी भी दुर्गति है। इन दोनो को छोड़कर समापत्ति सुख दोष रहित है।] ये सञ्जिनो, नेवसञ्जानासञ्जी प्राणियो को छोड़ शेष चित्त वाले प्राणियो से मतलब है। तेपि दुग्गता, उस समापत्ति के न होने से वह भी दुर्गति- प्राप्त है। येपि असञ्जिनो, असञ्जा-भव में पैदा होनेवाले चित्त-रहित प्रा- णियो से मतलब है। तेपि दुग्गता, ये भी इसी समापत्ति को प्राप्त किए न रहने से दुर्गति-प्राप्त हैं। एतं उभयं विवज्जय। इन दोनो सञ्जि-भाव तथा असञ्जिभाव को छोड़, त्याग—यह शिष्यो को उपदेश देता है। तं समापत्ति सुखं अनङ्गणं—नेवसञ्जानासञ्जायतन को प्राप्त करने वालो के शान्त होने के कारण उसे सुख कहा, ध्यान सुख अङ्गण-रहित, दोष रहित होता है। चित्त की बहुत एकाग्रता होने से भी वह अङ्गण-रहित कहलाया। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने धर्मोपदेश दिया। फिर शिष्य की प्रशंसा कर ब्रह्मलोक गए। तब बाकी के तपस्वियो की ज्येष्ठ-शिष्य के प्रति श्रद्धा बड़ी। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ शिष्य सारिपुत्र था; महाब्रह्मा तो मै ही था।

१३५. चन्दाभ जातक

चन्दाभ ] ८७ १३५. चन्दाभ जातक “चन्दाभं...”, यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय सङ्कस्स नगर के द्वार पर स्थविर की प्रश्न-की-व्याख्या के ही बारे में कही— पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने एकात जगल में मृत्यु को प्राप्त होने के समय शिष्यो के पूछने पर चन्दाभं सुरि- याभं कहा। वह मरकर आभस्वर लोक में उत्पन्न हुए। तपस्वियो ने ज्येष्ठ- शिष्य की बात पर विश्वास नहीं किया। बोधिसत्त्व ने आकर आकाश में उप- स्थित हो यह गाथा कही— चन्दाभं सुरियाभञ्च योघ पञ्ञाय गाधति, अवितक्केन झानेन होति आभस्सरूपगो ॥ [ जो प्रज्ञा से सूर्याभा तथा चन्द्राभा पर स्थिर होता है। वह वितर्क- रहित ध्यान से आभस्वर-लोक में उत्पन्न होता है। ] चन्दाभं का मतलब है श्वेत-कसिण। सुरियाभं का पीत-कसिण। योघ पञ्ञाय गाधति, जो आदमी इस ससार में इन दोनो कसिणों की प्रज्ञा से भावना करता है, उन्हें आलम्बन बनाकर उनमें प्रवेश करता है, उनमें प्रतिष्ठित होता है। अथवा चन्दाभं सुरियाभञ्च योघ पञ्ञाय भावति, जहाँ तक सूर्य तथा चन्द्रमा की आभा फैली है, उस सारे स्थान में परिभाग-कसित¹ को बढाकर उसी को आलंबन बनाकर ध्यान का अभ्यास करनेवाला दोनों आभाओ की प्रज्ञा से भावना करता है। इसलिए यह भी ठीक अर्थ है। वितक्केन झानेन होति ¹परिभाग-कसिण=पटिभाग निमित्त (अभिधम्मत्य संगहो ६।१८)

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ

८८ [ १.१४.१३६

आभस्सरूपगो, वह मनुष्य वैसा अभ्यास करने से द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो आभस्वर-ब्रह्मलोक को प्राप्त होना ही है। इस प्रकार बोधिसत्त्व तपस्वियों को समझाकर तथा ज्येष्ठ शिष्य की प्रशंसा कर ब्रह्मलोक गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ शिष्य सारिपुत्र थे और महाब्रह्मा तो मै ही था। १३६. सुवण्णहंस जातक "यं लद्धं तेन तुट्ठब्ब...", यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय थुल्ल नन्दा भिक्षुणी के बारे में कही— क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में एक उपासक ने भिक्षुणी संघ को लहसुन लेने का निमन्त्रण दिया और अपने खेत वाले को आज्ञा दी कि यदि भिक्षुणियां आएँ तो एक एक भिक्षुणी को दो तीन गांठ लहसुन दे। उसके बाद से भिक्षुणियां उसके घर भी और खेत पर भी लहसुन के लिए जाने लगीं। एक उत्सव के दिन उस (उपासक) के घर में लहसुन समाप्त हो गया। थुल्लनन्दा भिक्षुणी औरों को साथ ले घर गई और बोली—आयुष्मानो, लहसुन की आवश्यकता है। —आर्ये, लहसुन नहीं हैं। लाया हुआ समाप्त हो गया। खेत पर जाएँ। वह खेत पर गई और बेअन्दाज लहसुन लिवा लाई। खेत वाला खीझा—यह क्या है कि भिक्षुणियां अन्दाज न कर बे अंदाज लहसुन ले जाती हैं।

सुवण्णहंस ] ८६ उसे यह कहता सुन जो अप्पेच्छ भिक्षुणियां थी वह असन्तुष्ट हुई और उनमें सुनकर भिक्षु भी असन्तुष्ट हुए। उन्होंने खीझकर भगवान् से यह बात कही। भगवान् ने थुल्लनन्दा भिक्षुणी की निन्दा कर कहा— “भिक्षुओ, लालची (=महेच्छ) आदमी जिस मां ने जन्म दिया है, उसके लिए भी अप्रिय हो जाता है। वह अप्रसन्न को प्रसन्न नहीं कर सकता। प्रसन्नो को अधिक प्रसन्न नहीं कर सकता। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त नहीं कर सकता। प्राप्त वस्तु को सँभाल कर नहीं रख सकता। अप्पेच्छ आदमी अप्रसन्नो को प्रसन्न कर सकता है। प्रसन्न को अधिक प्रसन्न कर सकता है। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त कर सकता है। प्राप्त वस्तु को बनाए रख सकता है।” —इस प्रकार भिक्षुओं को उनके योग्य उपदेश दे फिर कहा 'भिक्षुओ, थुल्ल नन्दा अभी लोभी नहीं है, पहले भी लोभी ही रही है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उनके बड़े होने पर उनके समान जाति-कुल से उन्हे एक भार्या ला दी गई। उससे उसे नन्दा, नन्दवती और नन्दसुन्दरी तीन लड़कियाँ हुईं। उनका विवाह होने से पूर्व ही बोधिसत्त्व मर कर स्वर्ण- हंस होकर पैदा हुए। उन्हें पूर्व-जन्म-स्मृति का ज्ञान भी रहा। उसने बड़े होने पर सोने के परो से ढके हुए परम सौभाग्यवान् अपने शरीर को देखकर विचार किया कि मै कहाँ से मरकर यहाँ पैदा हुआ हूँ? उसे मालूम हुआ कि मनुष्य-लोक से। फिर विचार किया कि ब्राह्मणी और लडकियो का जीवन-यापन कैसे होता है ? उसे पता लगा कि दूसरो की मजदूरी करके बड़े कष्ट से जीवन-यापन करती है। तब उसने सोचा कि मेरे सोने के पर ठोस१ हैं। इनमें से में एक एक पर उन्हे दू। इस से मेरी भार्या और लड़कियाँ सुखपूर्वक जीएँगी।” वह यहाँ पहुँच घर के शहतीर के एक सिरे पर बैठ। ——— १कूटे और रगडे जा सकते हैं।

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ब्राह्मणी और लड़कियों ने बोधिसत्व को देखकर पूछा—स्वामी, कहाँ से आए ? "मैं तुम्हारा पिता हूँ। मरकर स्वर्ण हंस होकर पैदा हुआ हूँ। तुम्हें देखने के लिए आया हूँ। इसके बाद तुम्हे दूसरो की मजदूरी करते हुए कष्ट- पूर्वक जीवन-यापन करने की जरूरत नही है। में तुम्हें अपना एक एक पर दिया करूँगा। उसे बेच-वेच कर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना।" इतना कह वह एक पर देकर उड़ गया। इसी प्रकार वह बीच बीच में आकर एक एक पर देता। ब्राह्मणियाँ धनी और सुखी हो गईं। एक दिन उस ब्राह्मणी ने लडकियो से बुलाकर सलाह की—'अम्म ! जानवरो के दिल का पता नही। हो सकता है कि कभी तुम्हारा पिता न आए। इसलिए उसके इस बार आने पर हम उसके सभी पर उखाड लें।' उन्होने अस्वीकार किया। वे बोली—इस प्रकार हमारे पिता को कष्ट होगा। ब्राह्मणी ने लालची होने के कारण फिर एक दिन स्वर्ण-राजहंस के आने पर कहा—स्वामी आएँ। जब उसने देखा कि यह उसके पास आ गया है, तो दोनो हाथो से पकड़कर उसके सब पर नोच लिए। सभी पर बोधिसत्त्व की इच्छा के बिना जबर्दस्ती लिए जाने के कारण बगले के पर सदृश हो गए। अब बोधिसत्त्व पक्ष पसारकर उड़ न सके। उसने उन्हें मटके में रखकर पाला। उनके जो नए पर निकले वह श्वेत ही निकले। पक्ष निकलने पर वह उड़कर अपने स्थान पर चले गए, और फिर वहाँ नही गए। शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात सुनाकर कहा—भिक्षुओ, थुल्लनन्दा अभी लालची नही रही है। पहले भी लालची रही है। लालच के ही कारण स्वर्ण से हाथ धोया। अब अपने लालच के कारण लहसुन से भी हाथ धोएगी। इसके बाद अब लहसुन खाना न मिलेगा। जैसे थुल्लनन्दा को वैसे ही उसके कारण दूसरी भिक्षुणियों को भी। इस लिए बहुत मिलने पर भी अपना । जानना चाहिए। थोडा मिलने पर जितना मिले उसी से सन्तोष ना चाहिए। अधिक की इच्छा नही करनी चाहिए। इतना कह यह गाथा कही—

बब्बु ] ६१ य लद्ध तेन तुट्ठव्व अतिलोभो हि पापको, हंसराज गहेत्वान सुवण्णा परिहायथ ॥ [ जो मिले उससे संतुष्ट रहना चाहिए। अतिलोभ करना पाप है। हंसराज को पकड़कर स्वर्ण से हाथ धोया । ] तुट्ठव्वं का मतलब है संतोष करना चाहिए। इतना कह शास्ता ने अनेक प्रकार से निन्दा कर नियम बना दिया कि जो भिक्षुणी लहसुन खाए उसे पाचित्तिय (-दोष) लगे ।¹ फिर जातक का मेल बैठाया। उस समय की ब्राह्मणी यह थुल्लनन्दा हुई। तीन लड़कियाँ इस समय की तीन बहनें। स्वर्ण-राजहंस तो मैं ही था। १३७. बब्बु जातक “प्रत्येको लभते बब्बु...”, शास्ता ने इसे जेतवन में विहार करते समय काणमाता के शिक्षा-पद² के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में अपनी कानी लड़की के कारण काण माता कहलाने वाली एक श्रोतापन्न आर्य-श्राविका थी। उसने अपनी कानी लड़की को एक गामड़े ¹ भिक्खुणी-पातिमोक्ख । ² पाचित्तिय के भोजन-वर्ग का चौथा शिक्षापद ।

६२ [ १.१४.१३७ में समान जाति के किसी आदमी को दिया। काणा किसी काम से माँ के घर आई। कुछ दिन बीतने पर उसके स्वामी ने दूत भेजा—मैं चाहता हूँ कि काणा आये। काणा चली आवे। काणा ने दूत की बात सुन, माँ से पूछा—माँ ! जाती हूँ। काण-माता ने सोचा कि इतने दिन रहकर खाली हाथ कैसे जाएगी, इस लिए पुए पकाने लगी। उस समय एक पिण्डपातिक¹ भिक्षु उसके घर आया। उपासिका ने उसे बिठाकर पात्रभर पुए दिलवाए। उसने निकल दूसरे (भिक्षु) से कहा। उसे भी वैसे दिलवाए। उसने भी निकलकर दूसरे से कहा। उसे भी वैसे ही। इस प्रकार चार जनों को पुए दिलवाए। सब तैयार पुए समाप्त हो गए। काणा का जाना नहीं हुआ। उसके स्वामी ने दूसरा दूत भेजा और दूसरे के बाद तीसरा भेजा। तीसरे दूत के हाथ उसने कहला भेजा कि यदि काणा नहीं आएगी तो में दूसरी भार्या ले आऊँगा। तीनों बार उसी तरह जाना न हो सका। काणा का स्वामी दूसरी स्त्री ले आया। काणा ने जब यह सुना तो रोने लगी। शास्ता को पता लगा तो पहन कर पात्र-चीवर ले काण-माता के घर जा बिछे आसन पर बैठकर पूछा— “यह क्यो रोती है ?” “इस कारण से ।” शास्ता ने धर्मकथा कह काण-माता को दिलासा दिया। फिर उठकर विहार को गए। उन चार भिक्षुओं को तीन बार तैयार पुए ले आकर काणा के गमन में बाधक होने की बात भिक्षुसंघ में प्रकट हो गई। एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! चार ¹जो भिक्षु केवल भिक्षा से ही निर्वाह करता है, निमन्त्रण आदि ग्रहण नहीं करता।