जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
२५०. कपि जातक
कपि ] ४६१ २५०. कपि जातक "अयं इसी उपसम सङ्कमे रतो " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक ढोगी भिक्षु के बारे मे कही। क वर्तमान कथा उसका ढोग भिक्षुओ म प्रकट हो गया। भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक भिक्षु कल्याणकारी बुद्धशासन म प्रव्रजित हो ढोग करता है। शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, बैठ क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, यह भिक्षु केवल अभी ढोंगी नही है, यह पहले भी ढोगी रहा है। इसने जब यह वन्दर या केवल आग के लिए ढोग किया। इतना कह पूर्व-जन्म की क्या कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशीदेश में ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ। बडे होने पर पुत्र के भागने दौड़ने में समर्थ होने पर, ब्राह्मणी के मर जाने पर पुत्र को गोद मे ल हिमालय चला गया। वहाँ ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो उस पुत्र को भी तपस्वीकुमार बना पर्णशाला में रहने लगा। वर्षा ऋतु मे मूसलधार वर्षा होने के समय एक बन्दर पीडित, दाँत फटफटाता हुआ, काँपता हुआ भटकता था। बोधिसत्त्व बडे बडे लकड लाकर आग बना मन्च पर लेटा था। उसका पुत्र भी पाँव दबाता हुआ बैठा था। वह बन्दर एक मृत तपस्वी के वल्कल वस्त्र ओढ पहन, एक कन्धे पर अजिनचर्म रख, बैहगी तथा कमण्डल ले ऋषिवेष बना पर्णशाला के द्वार पर जा आग के लिए ढोग करके खडा हुआ।
४६२ [ २.१०.२५० तपस्वी कुमार ने उसे देखे 'तात ! एक तपस्वी शीत से पीड़ित है। काँप रहा है। उसे यहाँ बुला। सेक लेगा' कहा। उसने पिता से प्रार्थना करते हुए यह गाथा कही— अयं इसी उपसमसंयमे रतो संतिट्ठति सिसिरभयेन अट्टितो, हन्द अयं पविसतुमं अगारकं विनेतु सीतं दरथञ्च केवलं । [ यह ऋषि उपशमन में तथा संयम में लगा है। शीतभय से पीड़ित है। यह इस घर में प्रवेश करे और अपने शीत तथा पीड़ा को दूर करे ।] उपसमसंयमे रतो रागादि क्लेश के उपशमन में तथा शीलसंयम मे लगा है। संतिट्ठति, वह ठहरता है। सिसिरभयेन वायु और वर्षा से उत्पन्न शीतभय से। अट्टितो पीड़ित। पविसतुमं, यहाँ प्रवेश करे। केवलं सब। बोधिसत्व ने पुत्र की बात सुन उठकर देखते हुए बन्दर का भाव समझ दूसरी गाथा कही— नायं इसी उपसमसंयमे रतो कपी अयं दुमवरसाखगोचरो, सो दूसको रोसकोचापि जम्मो सचे वजे इमम्पिं दूसये घरं ॥ [ यह उपशमन तथा सयम मे लगा हुआ ऋषि नही । यह वृक्षो की शाखा पर घूमने वाला बन्दर है। यह दूषित करने वाला है। यह क्रोध करने वाला है। यह नीच है। यदि घर मे आए तो इस घर को भी दूषित करे ।] दुमवरसाखगोचरो वृक्षो की शाखां पर घूमने वाला। सो दूसको रोसको चापि जम्मो जहाँ जहाँ जाए उस उस जगह को दूषित करने वाला होने से दूसक। झगड़ने वाला होने से रोसको, नीच होने से जम्मो। सचे वजे यदि इस पर्ण-
कपि ] ४६३ शाला म आवे, दाखिल हो तो सब जगह पाखाना पेशाब करके और आग लगा कर खराब कर दे । यह कह कर बोधिसत्त्व ने जली लकड़ी ले उसे डरा भगाया । वह कूद कर वन म प्रवेश कर चला ही गया । फिर उस जगह नही गया । बोधिसत्त्व न अभिञ्जा और समापत्तियां प्राप्त कर तपस्वीकुमार को व सिन-परिकर्म सिखाया । उसने अभिञ्जा तथा समापत्तियां प्राप्त कीं । व दोनो ध्यान प्राप्त हो ब्रह्मलोक परायण हुए । शास्ता न 'न भिक्षुओ केवल अभी किन्तु पुरान समय से भी यह ढोगी ही हैं', कह यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यों के अन्त म कोई खोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी हुए । उस समय बन्दर ढोगी भिक्षु था । पुत्र राहुल । पिता तो मैं ही था ।
कपि ] ४६३ शाला म आवे, दाखिल हो तो सब जगह पाखाना पेशाब करके और आग लगा कर खराब कर दे । यह कह कर बोधिसत्त्व ने जली लकडी ले उसे डरा भगाया । वह कूद कर वन में प्रवेश कर चला ही गया । फिर उस जगह नहीं गया । बोधिसत्त्व ने अभिज्ञा और समापत्तियां प्राप्त कर तपस्वीकुमार को कसिन्-परिकर्म सिखाया । उसने अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कीं । वे दोनो ध्यान-प्राप्त हो ब्रह्मलोक परायण हुए । शास्ता ने 'न भिक्षुओ केवल अभी किन्तु पुराने समय से भी यह ढोगी ही हैं', कह यह धर्मदेशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो के अन्त में कोई स्रोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी हुए । उस समय बन्दर ढोगी भिक्षु था । पुत्र राहुल । पिता तो मैं ही था ।