भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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पृष्ठ 129

अरिष्टाध्यायः ॥४॥ १०३ अथ चतुर्थवर्षे मरणम् । षष्ठाष्टमे कर्कणि जन्मलग्नात् सौम्ये सुधारश्मिनिरीक्ष्यमाणे ॥ अब्दैश्चतुर्भिः समुपैति नाशं जातो नरः सर्वबलान्वितोऽपि ॥ ४२ ॥ ४ वर्षायुः

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|       \       | लग्नं. /       |
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|         \     |      /   चं.   |
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|  \  ४बु. /         \  ४बु. /   |
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कर्कराशिगते सौम्ये=बुधे जन्मलग्नात् षष्ठे- ऽष्टमे वा विद्यमाने सुधारश्मिना = चन्द्रेण निरी- क्ष्यमाणे = अवलोकिते जातो नरः सर्वबलान्वि- तोऽपि यदि भवति तथापि चतुर्भिरब्दैः नाशं = मृत्युं समुपैति । तथा सारावल्याम्— "कर्कटधामनिसौम्यः षष्ठाष्टमसंस्थितो विलग्नर्क्षात् । चन्द्रेण दृष्टमूर्तिर्वर्षचतुष्केन मारयति ॥" इति ॥ ४२ ॥ कर्कका बुध जन्मलग्नसे छठें वा आठवेंमें हो उसको चन्द्रमा देखता हो तो जातक सर्व- बल-सम्पन्न होनेपर भी चौथे वर्षमें मरे ॥ ४२ ॥ अथ पञ्चमेऽब्दे मरणम् । रविचन्द्रभौमगुरुभिः कुजगुरुसौरेन्दुभिः सहैकस्थैः ॥ रविशनिभौमशशाङ्कैर्मरणं खलु पञ्चभिर्वर्षैः ॥ ४३ ॥

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| \   ( १ )       / | \               / |
|  \ र. चं. मं. बृ./  |  \             /  |
|   \             /   |   \           /   |
|    \           /    |    \         /    |
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|     |  ( २ )  |     |     |       |     |
|     |मं.बृ.श.चं|पञ्चमाब्दे|       |     |
|     |         |मृत्युः     |       |     |
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|    /           \    |    /         \    |
|   /   ( ३ )     \   |   /           \   |
|  /  र. श. मं. चं.\  |  /             \  |
| /                 \ | /               \ |
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यत्र कुत्रापि रविचन्द्रभौमगुरूणामेकत्र योगे, अथ च कुजगुरुशनिचन्द्राणां योगे, तथा च रविशनिभौमचन्द्राणां योगे खलु = निश्चयेन पञ्चभिर्वर्षैर्मरणं भवति । अत्र- "तिग्मांशुनीहारकरादनीज- युक्तैः क्रमादेकगृहाश्रितैस्तैः । सूर्यात्मजेनाङ्गिरसा सितेन स्यात्पञ्चता पञ्चभिरेव वर्षैः" इति गुणाकरः ४३ रवि-चन्द्र-मंगल-गुरु एकत्र हों, वा मंगल-गुरु-शनि-चन्द्रमा एकत्र हों वा रवि- शनि-मंगल-चन्द्रमा एकत्र हों तो ५ वर्षमें बालककी मृत्यु करते हैं ॥ ४३ ॥ अथ षड्वर्षमायुः । यदा सुधारश्मिनवांशकस्थे निरीक्षिते शीतकरेण मन्दे ॥ लग्नाधिपे चन्द्रदृशा समेते जातस्य षड्वर्षमितं तदाऽऽयुः ॥ ४४ ॥ ६ वर्षायुः

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| \     ३       |       २       |       १     / |
|  \            |               |            /  |
|   \           |               |           /   |
| ४  \          |               |          / १२ |
|     \         |               |         /     |
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|      |      /                   \      |      |
|      |     /                     \     |      |
|      | ५ चं.                     ११ शु.|      |
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|      |       \                 /       |      |
|  ६   |        \               /        |  १०  |
|     /          \    ८ श. इं  /         \      |
|    /            \           /           \     |
|   /      ७       \         /      ९      \    |
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यदा = यस्मिन्काले, मन्दे = शनौ यत्र कुत्रापि सुधारश्मेश्चन्द्रस्य नवांशकस्थे, शीत- करेण = चन्द्रेण निरीक्षिते, लग्नाधिपे च चन्द्रदृशा समेते ( चन्द्रदृष्ट इत्यर्थः ) सति जन्म भवति, तदा जातस्य षड्वर्षमितमायु- र्भवति । ततोऽनन्तरं म्रियते ॥ ४४ ॥ यदि शनि चन्द्रमाके नवांशमें हो उसे