भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १३३

से गुणाकर दो सौका भाग देनेसे लब्ध दिन होते हैं । शेष को ६० से गुणाकर दो सौका भाग देने से लब्ध घटी होती है, शेष को ६० से गुणा कर २०० का भाग देने से लब्ध पल होते हैं ॥ उदाहरण संस्कृत टीका में देखिये । ( सु० शा० कार ) ॥ १८ ॥ इसकी उपपत्ति यह है कि-'ग्रहभुक्तनवांशराशितुल्यम्' के अनुसार ग्रह जिसके नवांश- पर हों उतने वर्ष होते हैं । इसलिये ग्रहभुक्तराशियों तथा अंशादिकों की कलामें २०० का भाग देनेसे लब्धि नवांश होते हैं । ∵ १ नवांशमें २०० कलायें होती हैं । ∵ ग्र. भु. क ÷ २०० = नवाँशा = वर्ष । यहां राशिसङ्ख्या १२ ही होनेके कारण १२ से अधिक नवांशसंख्या ( वर्ष) होने पर १२ से भाग देना उचित है । शेष परसे २०० कलामें यदि १ वर्ष ( १२ महीने ) तो शेषकलामें क्या (१२ × शे)/२०० इस अनुपातसे मासादि आते हैं । ( सु. शा. कार ) ॥ १८ ॥ सत्याचार्यके मतमें इतना विशेष है कि जो ग्रह अपनी उच्च राशिमें है, अथवा वक्री है उसकी आयु वर्षादि जो मिले उसको तिगुना करे, और जो ग्रह वर्गोत्तम नवांश वा स्वन- वांश या अपने द्रेष्काणमें हो वा अपनी राशिमें हो उसको द्विगुण करे और सब कर्म पूर्वोक्त प्रकारसे करे । जो ग्रह शत्रु राशिमें है उसका तीसरा भाग घटता है और शुक्र, शनि के बिना अस्तंगत ग्रहका आधा घटता है तथा "सर्वार्धेति” इस श्लोक के अनुसार चक्र पात करे ॥ १९ ॥ यहां सत्याचार्यके मतमें लग्न भुक्तनवांशके बराबर आयु देता है । यदि लग्न बलवान् ( स्वामिगुरुज्ञवीक्षितयुता ) हो तो भुक्त राशिके तुल्य वर्ष आयु देता है । सत्याचार्यके मतमें क्रूरोदय ( सार्द्धोदितोदितोक्त ) प्रकारसे जो हरण करते हैं वह नहीं करना चाहिये । तथा पूर्वोक्त पिण्डायु तथा निसर्गायु इत्यादि परसे आयुकी स्पष्टी क्रिया नहीं करनी चाहिये॥ मथ आदिके तथा जीवशर्माके मतसे सत्याचार्य का मत श्रेष्ठ है । परन्तु शंका यह है कि कोई ग्रह स्वगृहमें है तो द्विगुण हुआ, वही स्वनवांशमें है तो फिर द्विगुण हुआ, फिर स्वद्रेष्काणमें होनेसे फिर द्विगुण, और वर्गोत्तमांशमें होनेसे फिर त्रिगुण वही ग्रह वक्री हो तो त्रिगुण और उच्चराशिमें हो तो पुनः त्रिगुण इस प्रकार इसकी अनवस्था होती है । इस शङ्काकी निवृत्ति इस श्लोकके उत्तरार्धमें है कि बहुत बार द्विगुण की प्राप्ति हो तो भी एक ही बार द्विगुण करे । बहुत बार त्रिगुणकी प्राप्ति हो तो भी एक वार त्रिगुण करे, और जहां द्विगुण त्रिगुण दोनों की प्राप्ति हो वहां एक वार त्रिगुण करे । घटनेके क्रममें भी बहुतकी प्राप्तिमें एकही बार घटेगा ( चक्रं पात भिन्न है वह सबका होता है ) अर्थात् दो भाग तीन भाग घटनेमें दो भाग ही घटेगा । जहां किसी प्रकारसे घटता है और किसी प्रकारसे बढ़ता है वहां पहले घटनेका मुख्य भाग घटा करके तब वृद्धिके मुख्यभागसे वृद्धिकरे । घटानेमें पहले चक्रपातसे हानि करले पश्चात् और क्रमसे घटावे इसके बाद वृद्धि करे । यह अंशायु- दशा है । आचार्यने पिण्डायु निसर्गायुको छोड़कर अंशायुको ही प्रमाणित माना है । औरोंके मतमें लग्नके अधिक बल होनेसे अंशायु, सूर्य अधिक बली हो तो पिण्डायु और चन्द्रमा विशेष बलवान् हो तो निसर्गायु होती है ॥ २१ ॥ अथ रश्मिजायुः । दशगोशरबाणाद्रिवसुसायकरश्मयः । दिननायकमुख्येषु निजतुङ्गगतेषु च ॥२२॥ स्वोच्चोनमिष्टखचरं यदि षड्गृहीनं चक्राद्विशोध्य कृतलिप्तकमंशुमानैः ॥ हत्वा भचक्रकलिकाहृतमन्दपूर्वं रव्यादिरश्मिजनितायुरिति ब्रुवन्ति ॥ २३ ॥ इदानीं ग्रहाणां रश्म्वानयनमुच्यते । निजतुङ्गगतेषु दिननायकमुख्येषु = सूर्यादिग्रहेषु १२ जा०