भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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अस्मादन्येष्वपि (२६-३२) श्लोकोक्तयोगेषु पिण्डायुः ग्राह्यम्। अथ च जन्मकाले सूर्ये बलवति (सर्वापेक्षया बलिनि) पिण्डायुः। चन्द्रे बलिनि निसर्गायुुरेवं बुधे रश्मिजा- युः। भौमेऽष्टकवर्गायुः (वक्ष्यमाणम्) शुक्रे कालचक्रायुः। देवाचार्ये दशायुः। शनौ समु- दायजम्। लग्ने बलवति अंशायुर्भवति। इति प्राचीना आचार्यप्रवरा आहुः ॥ २९-३३ ॥ सुधाशालिनीकर्त्ता, पूर्वकथित आयुर्दायोंमें कौनसी आयु लेनी चाहिये इसका निर्णय करते हैं। जन्मसमयमें लग्नेश, सूर्य और चन्द्रमा इन तीनोंमें यदि लग्नेश सबसे बली हो और शुभग्रहसे दृष्ट हो तो अंशायु लेनी चाहिये। यदि सूर्य बली हो तो पिण्डायु, चन्द्रमाके बली होनेपर निसर्गायु लेनी चाहिये। यदि दो ग्रहोंकी तुल्यता हो तो दोनोंकी आयुका योगार्द्ध याने सूर्य और लग्नेशके तुल्य बल होनेपर अंशायु तथा पिण्डायुका योगार्द्ध। सूर्य, चन्द्रमाके तुल्य होनेपर पिण्डायु तथा निसर्गायुका योगार्द्ध। लग्नेश और चन्द्रमाके तुल्य बलमें अंशायु-निसर्गायुका योगार्द्ध लेना चाहिये। यदि तीनों तुल्यबल हों तो तीनों आयुर्दायोंके योगका तृतीयांश ग्रहण करना चाहिये ॥ २८ ॥ सूर्य उच्चमें हो, अन्य ग्रह बलयुक्त हों, केन्द्र (१।४।७।१०) या कोण (५।९) में हों या सभी ग्रह उत्तमभावमें हों, या बलयुक्त, शशयोग और हंसयोग हो, तथा दीर्घायु योगोंके अनेक भेदोंमें, चन्द्रयोगों (सुनफा, अनफा, दुरधुरा) में, तथा चौथे चन्द्रयोग (केमद्रुम) में, चन्द्रमाके बली होनेपर, महापुरुषयोगोंमें, प्रत्येक राजयोगोंमें पराशर ने पिण्डायु लेनेको कहा है॥ २९-३१॥ गुरु लग्नमें हो, सूर्य १० वें भावमें हो, चन्द्रमा ४ थे, या ७ वेंमें बली हो, शुभग्रह केन्द्र (१।४।७।१०) त्रिकोण (५।९) उपचय (३।६।११।१०) में हों, पापग्रह आपोक्लिम (३।६।९।१२) में हों तो पिण्डायु लेनी चाहिये ॥ ३२ ॥ और भी प्रकारान्तर देखिये-जन्मसमय यदि सूर्य बली हो तो पिण्डायु, चन्द्रमा बली हो तो निसर्गायु, बुध बली हो तो रश्मिजायु, मङ्गल बली हो तो अष्टकवर्गायु, शुक्र बली हो तो अंशायु लेनी चाहिये। यहां आठों में सबसे बली ग्रहकी आयु ग्रहण करनी चाहिये। बलकी समतामें उनके योगमें उतनेसे भाग देकर आयु लेनी चाहिये। ऐसा आचार्यों ने कहा है ॥ ३३ ॥ अथायुषः स्पष्टीकरणम्। आयुरब्दादिकं सर्वं निश्छलेन गुणीकृतम्। मातङ्गेन हृतं लब्धं सौरमानायुरुच्यते ॥ ३४ ॥ इदानीं पूर्वानीतस्य क्षेत्रात्मकस्यायुषः सौरमानेन वर्षादिकरणमुच्यते। पूर्वमानीतमायुः क्षेत्रात्मकं राश्यादिवशादानीतत्त्वात्। अपेक्षितं तु सौरकालात्मकम्। वर्षायनर्तुयुगपूर्वक- मत्र सौरादित्युक्तत्वात्। अतोऽब्दादिकं सर्वमायुः निश्छलेन गुणीकृतम्। अत्र 'क ट प य वर्गैर्भवेरिह, इति पूर्वोक्तसंख्याबोधकसङ्केतेन निश्छल = ३६०, तेन गुणितं कृत्वा, मातङ्गेन = (३६५) हृतं = भक्तं च कुर्यात् तदा लब्धं सौरमानेन वर्षाद्यमायुर्भवेदित्युच्यते विद्भिः। अत्र द्वादशराश्यात्मके (सौरे) एकस्मिन्वर्षे ३६० भवन्ति। तथैकस्मिन्सौरवर्षे ३६५ दिनानि सावनानि भवन्ति। अर्थात् ३६० अंशाः सूर्येण ३६५ दिनैर्भुज्यन्ते। तेनायुर्वर्ष- सङ्ख्याः ३६० गुणिताः, ३६५ भक्ताश्च सौरवर्षाणि भवन्तीत्युपपन्नं यथोक्तम्। परश्चैत- त्स्थूलं, प्रत्यब्दं १५।३०।२२।३० घट्यादेस्त्यागात् ॥ ३४ ॥ आयुके वर्षादिको ३६० से गुणाकर उसमें ३६५ से भाग देनेसे जो लब्धि मिले वह सौरमान आयु होती है ॥ ३४ ॥ आयुषोऽधिकारिणः । ये धर्ममार्गनिरता द्विजदेवभक्ता ये पथ्यभोजनरता विजितेन्द्रियाश्च।