जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १५७ पापेषु = सूर्यभौमशनिषु, आज्ञाबन्धु- राशिस्थितेषु = लग्नाद्दशमचतुर्थभावगतेषु, क्षीणे = कृष्णे तारानायके=चन्द्रे शत्रुराशौ= लग्नात्षष्ठे भावे स्थिते, वा लग्नात् छिद्र- स्थानराशि गतेऽष्टमभावे यो राशिस्तद्गते (अष्टमभावगत इत्यर्थः) जातस्य यात्राकाले शत्रुदोषार्द्धरिविद्वेषान्मृत्युः स्यात् ॥ १०८ ॥
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| \ | ल. | / |
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| मं. श X X सू. |
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| | चं. | |
| | छं. | |
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(टिप्पणी: प्रथम कुण्डली-चक्र: लग्न (१) में 'ल.', दशम में 'मं. श', चतुर्थ में 'सू.', सप्तम में 'छं.' एवं षष्ठ/अष्टम में 'चं.')
पापग्रह दशम और चतुर्थ स्थानमें स्थित हों, क्षीण-चन्द्रमा छठे भावमें हो वा ८ वें भावमें हो तो यात्रा समयमें शत्रुके दोषसे मृत्यु होती है ॥ १०८ ॥ लग्नान्त्यगौ भानुधराकुमारौ दिनेशचन्द्रेन्दुसुता मदस्थाः ॥ सुरालयोद्यानवनप्रदेशे प्रवासभूमौ म्रियते तु जातः ॥ १०६ ॥ भानुधराकुमारौ=शनिभौमौ लग्नान्त्यगौ=शनिर्लग्ने, भौमोऽन्त्ये=द्वादशे, तथा दिनेश- चन्द्रेन्दुसुताः=सूर्यचन्द्रबुधाः, मदस्थाः=सप्तमभागवता भवेयुस्तदा जातस्तु सुरालये= देवमन्दिरे उद्याने = आरामे, वनप्रदेशेऽरण्ये, प्रवासभूमौ = स्वनिवासभूमौ वा म्रियते। अत्र होरासारे- अर्ककुजौ व्ययसंस्थौ, राहुः शशी सप्तमे, गुरुः केन्द्रे । जातस्य मृतिं विन्द्यात्प्रवासभूमौ सुरालयोद्याने । इति ॥ १०६ ॥ सूर्य और मङ्गल लग्न और द्वादशमें हों और सप्तम स्थानमें सूर्य, चन्द्र और बुध हों तो जातक देवगृहमें, या बागमें, या जङ्गलमें मरता है ॥ १०९ ॥ लग्नाष्टमे पापयुतेऽष्टमेशे रिःफोपयाते यदि केन्द्रगे वा ॥ लग्नेश्वरे हीनबलेन युक्ते दुर्मार्गदोषात्प्रवदन्ति मृत्युम् ॥११०॥
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| \ ३ | २ | १ शु. |
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| \ | | / |
| ४ \ | | / १२ |
| X शु. ५ रवे. X |
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| ६ र. / | ८ | \ ११ |
| / | | \ |
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| \ | | / |
| \ | ७ | / १० |
| \ | | / |
| \ | | / ६ मं. |
| X X |
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(टिप्पणी: द्वितीय कुण्डली-चक्र: लग्न २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२, १ राशियों में '१ शु.', 'शु. ५ रवे.', '६ मं.', '६ र.' आदि ग्रह-अङ्कन दर्शित हैं)
लग्नाष्टमे=लग्नादष्टमे भावे पापग्रहेण युते, अष्टमेशे रिःफोपयाते = द्वादशभावगते अथवा लग्नेश्वरे हीनबलेन=दुर्बलेन केन चिद्ग्रहेण युक्ते केन्द्र-( १।४।७।१० ) गते यदि जन्म भवेत्तदा जातस्य दुर्मार्गदोषात् मृत्युर्भवेत् । उपलक्षणे योगे जातो नरः कुपथे गच्छन्मृ- त्युमुपैतीति भावः ॥ ११० ॥ यदि लग्नसे अष्टम भाव पापग्रहसे युक्त हो, अष्टमेश बारहवें हो, वा केन्द्रमें होकर लग्नेश हीनबली ग्रहसे युक्त हो तो खराब रास्ताके दोषसे मृत्यु होना आचार्यों ने कहा है ॥ भौमार्कजर्क्षोपगते शशाङ्के पापेक्षिते पापखगान्तरस्थे ॥ कन्यागृहे वा हिबुकोपयाते मृतिं वदेदग्निशशस्त्रपातैः ॥ १११ ॥ शशाङ्के=चन्द्रे भौमार्कजक्षेत्रगते=मङ्गलशनैश्चरयोः क्षेत्राणा-( १।८।१०।११ ) मन्यतमे याते, पापेक्षिते = केनचित्पापग्रहेणावलोकिते, तथा पापखगयोरन्तरे मध्ये स्थिते, अथवा शशाङ्के कन्यागृहे हिबुके = चतुर्थभावे चोपगते जातस्याग्निजशस्त्रपातैः = अग्निदाहेन शस्त्रा- दिपातेन वा मृतिं = मरणं वदेत्प्राज्ञः इति ॥ होरासारे- भौमार्कजभवनेऽब्जे पापद्वयमध्यगे न सौम्ययुते । कन्यायां हिमगौ वा ज्वरारिमिसम्पातशस्त्रदोषैर्वा ॥ इति ॥ १११ ॥ १४ जा०