भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

राजयोगाध्यायः ॥ ७ ॥ २०६ मूलत्रिकोणोच्चगे=मूलत्रिकोणे कुम्भे, वा स्वोच्चे ( तुलायाम् ) गतवति, लाभेशेन=एकाद- शेशेन, निरीक्षिते=दृष्टे, बलयुते च जातो भूपालतुल्यो नृपसमो भवेत् ॥ १७ ॥ जिसके जन्म-समय लग्नमें गुरु हो, केन्द्रमें बुध स्थित हो, उसको नवमेश देखता हो तो वह मनुष्य राजाओंके समान धनी होता है। यदि शनि केन्द्र या कोणमें मूलत्रिकोण या उच्चका हो, बली हो, उसको लाभेश देखता हो तो वह राजाके सदृश धनाढ्य होता है॥ लग्ने शीतकरे गुरौ सुखंगते कर्मस्थिते भार्गवे तुङ्गस्वर्क्षगते दिवाकरसुते राजाऽथवा तत्समः । अन्त्यो¹²पान्त्य¹¹विलग्न¹वित्त²सहजं³व्यापार¹⁰गेहेषु वा सौम्यव्योमचरेषु भूपतिसमो राजाधिराजप्रियः ॥ १८ ॥ लग्न इति । स्पष्टार्थः श्लोकः ॥ उक्तयोगद्वये सर्वार्थचिन्तामणिकारः— ( १ ) लग्ने चन्द्रे गुरौ सौख्ये कर्मस्थे भृगुनन्दने । स्वोच्चस्वर्क्षस्थिते मन्दे नृपतुल्यो भवेन्नरः ॥ ( २ ) दशमैकादशे रिःफलग्नवित्तसहोत्यमे । ग्रहास्तिष्ठन्ति चेत्सौम्या नृपतुल्यो भवेन्नरः ॥ इति ॥ १८ ॥ जिस मनुष्यके जन्म समयमें लग्नमें चन्द्रमा हो, बृहस्पति सुख (४) में हो, दशवें शुक्र हो, शनि अपनी उच्चराशिमें (७) वा अपने गृह (१०।११) में हो तो वह राजा हो, वा राजाके समान हो । १२, ११, १, २, ३, १०, भावोंमें यदि शुभ ग्रह हों तो राजाधिराजका प्रिय, वा राजाके समान होवे । ( सु० शा० कार ) ॥ १८ ॥

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| \           / चं. १ \           / | \   चं.     /       \           / |
|   \       /           \       /   |   \       /  ल. वृ.  \       /   |
|     \   /               \   /     |     \   /           \   /  शु.  |
|       X                   X       |       X               X       |
|     /   \               /   \     |     /   \           /   \     |
|   /  बृ.  \       ।     /  शु.  \   |   /       \   ॥     /     \  बु. |
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+               X                   +               X               +
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|     \   /   श. ७    \ /         \     |     \   /       X           /     |
|       X                   X       |       X   /       \       X       |
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मन्दे चोत्तमवर्गगे बलयुते नीचांशवर्ज्ये गुरौ भानौ शोभनदृष्टिभागसहिते राजप्रियस्तत्समः । राहौ कर्मणि लाभगे रविसुते भाग्याधिपेनेक्षिते लग्नेशे यदि नीचखेटरहिते पृथ्वीशतुल्यो भवेत् ॥ १९ ॥ मन्द इति । बलयुते=स्ववर्गादिगते मन्दे = शनैश्चरे यत्र तत्र उत्तमवर्गे = स्वकीया- धिकारत्रये ( उत्तमं तु त्रिवर्गैक्यमित्युक्तेः ) च गतवति, गुरौ = बृहस्पतौ, नीचांशवर्ज्ये= यत्र कुत्रापि भावे नीचराशेः ( मकरस्य ) नवांशरहिते स्थिते, भानौ = सूर्ये, शोभनदृष्टिभा- गसहिते = शुभग्रहदृष्ट्या शुभग्रहनवांशेन च सहिते सति जातो राजप्रियो वा तत्समः = राजतुल्यो भवेत् । राहाविति । राहौ, कर्मणि = दशमे भावे, रविसुते = शनौ, लाभगे = एकादशभावे, तस्मिन् , भाग्याधिपेन = नवमेशेन, ईक्षिते = दृष्टे, लग्नेशे = जन्मलग्नपतौ,