जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 281, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजयोगाध्यायः ॥७॥ २५५ योगानाश्रयजान् सत्याचार्यो जगाद। अत्रैतदुक्तं भवति। एकस्मिन् चरराशौ, द्वयोर्वा वा चतुर्षु चरराशिषु यदा सर्वे ग्रहा भवेयुर्न स्थिरे द्वन्द्वे च कश्चिद् ग्रहः स्यात्तदा रज्जुः योगः। एकस्मिन् द्वयोस्त्रिषु वा चतुर्षु स्थिरराशिषु सर्वे ग्रहाः स्युर्न कश्चिचरे द्वन्द्वे च भवेत्तदा मुसलः योगः। एवं द्विस्वभावेऽपि सर्वैः ग्रहैः नलो योगो ज्ञेयः। उक्तञ्च— एको द्वौ वा त्रयः सर्वे चरा युक्ता यदा ग्रहैः। चरयोगस्तदा रज्जुः दुःखिनां जन्मदो भवेत्॥ स्थिराश्चेन्मुसले नाम मानिनां जन्मकृन्नृणाम्। द्विस्वभावो नलाख्यस्तु धनिनां परिकीर्तितः॥ इति। दलयोगावाह—केन्द्रैरिति। यदि शुभग्रहाः केन्द्रेषु भवेयुर्न कश्चित्पापः केन्द्रवर्ती स्यात्तदा स्रक् ( माला ) योगो भवति। यदि पापग्रहाः केन्द्रेषु भवेयुर्न कश्चिच्छुभः केन्द्र- गस्तदा सर्पयोगो ज्ञेयः इति स्रक्सर्पौ योगौ पराशरेण कथितौ। Notes—चन्द्रो हि शुक्लकृष्णपक्षभेदेन शुभत्वं पापत्वं चाप्नोति। तेन शुक्ले सचन्द्रा बुधगुरुशुक्राश्चतुर्षु केन्द्रेषु शुभा इति। कृष्णे सचन्द्रा भौमरविशनयश्चत्वारः पापा- श्चतुर्षु केन्द्रेषु भवेयुरन्यथा त्रयः शुभाः पापाश्च त्रिषु केन्द्रेष्विति विवेचनीयमिति ॥ १६६ ॥
सभी ग्रह चर राशिमें हों तो रज्जु योग होता है। सभी ग्रह स्थिर राशिमें हों तो "मुसल" योग होता है और सभी ग्रह द्विस्वभाव राशिमें हों तो "नल" योग होता है। ये तीन आश्रयज योग सत्याचार्य कहे हैं। स्रक् और सर्प ये दलयोग दो प्रकारके होते हैं। सब शुभ- ग्रह केन्द्रमें हों पापग्रह केन्द्रमें न हों तो "माला" योग होता है। केन्द्रमें सब पापग्रह हों केन्द्रमें शुभग्रह न हों तो "सर्प" योग होता है। ऐसा पराशर ने कहा है॥ १६६॥
१. रज्जुयोगोदाहरणम्।
\ उ.सू. १।गु.बु. /
\ /
\ /
वृ. ४ चं. > < मं. १० श.
/ \
/ \
/ \
२. मुसलयोगोदाहरणम्।
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| शु.बु.र. | १ ड. | वं. |
| ३ | | ११ |
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| २ | | १० |
| | | |
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| ५।गु.मं. | व. ८ | |
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३. नलयोगोदाहरणम्।
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| ल. | १ | १२ |
| गु. | | |
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| | | |
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| | ३ | वृ.मं. |
| | | ९ |
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| | चं.श. ६ | |
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४. स्रक-योगोदाहरणम्।
\ बु. /
\ /
श. \ / शु.
> <
गु. / \ वृ.
/ \
/ चं. \
मं. १२
५. सर्पयोगोदाहरणम्।
च. \ श. / वृ.
\ /
मं. के. \ / रा.
> <
/ \
/ सू. \
बु. / \ शु.
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