जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० सटीकजातकपारिजाते- ग्रहैरष्टधा अर्द्धचन्द्रयोगः स्यादिति । तथा हि- परस्परं द्वयादष्टौ तृतीयान्नवमान्तिकम् । पञ्चमैकादशः षष्ठाद् द्वादशं त्वष्टधा शशी ॥ इति ज्ञा. मु. ॥ १७१ ॥
(कुण्डली चक्र १ - नौयोगः एवं कूटयोगः):
| २ बु. | १ ल. वृ. | ल. | |||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ र. | नौयोगः | १० मं. | |||||
| ४ शु. | ४ बु. | कूटयोगः | श. | ||||
| ५ श. | ६ मं. | ७ चं. | र. | शु. | चं. | वृ. |
(कुण्डली चक्र २ - छत्रयोगः, चापयोगः एवं अर्द्धचन्द्रस्य त्रयो भेदाः):
| १ ल. श. | वृ. | मं. | शु. | र. ल. | बु. | मं. | मं. | ल. | च" | ||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चं. | श. | चापयोगः | १० चं. | बु. म' | अर्द्धचन्द्रस्य त्रयो भेदाः | वृ". | |||||
| छत्रयोगः | बु. | ४ वृ. | र. बु'. | श" च'. | |||||||
| ७ शु. | र. | शु. र' म" | श. शु'. बु". | वृ. श. र". | चं. शु". वृ'. |
लग्नसे सप्तम भाव तक प्रत्येक भाव में एक एक ग्रह हों तो "नौ" योग, चतुर्थसे दशम पर्यन्त सब ग्रह हों तो "कूट" योग, और सप्तमसे लग्न तक सब ग्रह हों तो "छत्र" योग, और इसी प्रकार दशमसे चतुर्थ पर्यन्त प्रत्येक भावमें एक एक ग्रह हों तो "चाप" योग, होता है। इसके अतिरिक्त स्थानोंमें ग्रह हों तो "अर्ध चन्द्र" योग होता है वह आठ प्रकार का है। द्वितीय भावसे अष्टम भाव तक सब ग्रह हों तो १ भेद, ३ से ९ तक हों तो २ भेद, ५ से ११ तक हों तो ३ भेद, ६ से १२ तक हों तो ४ भेद, ८ से २ तक हों तो ५ वाँ भेद, ९ से ३ तक हों तो ६ भेद, ११ से ५ तक ७ भेद, और बारहसे छः पर्यन्त ८ वां भेद है ॥ इदानीं समुद्र-चक्रयोगावाह- एकान्तरगतैरित्थत्समुद्रः षड्गृहाश्रितैः । विलग्नादिस्थितैश्चक्रमित्याकृतिजसङ्ग्रहः ॥ १७२ ॥ एकान्तरगतैरिति । अर्थात् = द्वितीयभावात्, एकान्तरगतैः = एकस्मात्परमेकं परित्य- ज्यैवं यथावासनभावगैः षड्गृहाश्रितैः समुद्रो योगः स्यात् । एतदुक्तं भवति-द्वितीय-चतुर्थ- षष्ठा-ष्टम-दशम-द्वादशेति-भावषट्के सप्त ग्रहा भवेयुस्तदा समुद्रो नाम योगो भवति । चक्रमाह-विलग्नादिस्थितैः = लग्नप्रभृतिषड् । श्ष्विकान्तरगतेषु सर्वैर्ग्रहैर्व्यवस्थितैः चक्रं नाम योगः। लग्न-तृतीय-पञ्चम-सप्तम-नवम-लाभेष्विति-भावषट्के सप्त ग्रहा भवेयुस्तदा चक्रयोगो भवति । इत्येतावानाकृतिजानां योगानां सङ्ग्रहो जात इति । सारावल्यां समुद्र- चक्रयोर्लक्षणं च तथा- राश्यन्तरितैर्लग्नात् षड्भवनगतैर्भवेच्चक्रम् । अर्थात् तथैव यातैश्चक्राकारो भवेज्जलधिः ॥ १७२ ॥
(कुण्डली चक्र ३ - समुद्र-योगः एवं चक्रयोगः):
| मं. २ | ल. | श. | मं. ल. १ | ११ श. | ||
|---|---|---|---|---|---|---|
| समुद्र-योगः | १० चं | र. बु. ३ | चक्रयोगः | |||
| र. शु. ४ | वृ. ९ | |||||
| बु. | वृ. ८ | शु. ५ | चं. ७ |