जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ सटीकजातकपारिजाते- शूले कोपरसान्वितो धनरुचिः शूरः क्षतो निर्धनी भिक्षाशी युगयोगजोऽतिचपलः पाषण्डको मद्यपः । गोले निर्द्धनकोऽलसोऽटनपरः स्वल्पायुरज्ञानधी- र्द्वात्रिंशत् कथिता वराहमिहिराचार्येण योगा इमे ॥ १८० ॥ इदानीं श्लोकषट्केन पूर्वोक्तद्वात्रिंशद् ( विंशत्याकृतित्रयाश्रयद्विदलसप्तसङ्ख्येतिद्वा- त्रिंशत्-) योगानां फलानि कथ्यन्ते । श्लोकार्थ स्पष्टार्था एवेत्यलमतिविस्तरेण ॥ १७४-१८०॥ रज्जु योगोत्पन्न जातक पराई भलाईसे जलनेवाला तथा निरंतर परदेश में रहने वाला और हमेशा मार्ग पर चलने में रुचि रखने वाला होता है । जो मुसल योगमें उत्पन्न हो वह मानी, धनी और विशेष नौकर वाला होता है । जो मनुष्य नल योगमें उत्पन्न हो वह अङ्गहीन, दृढ़ निश्चयवाला, धनी और समस्त कार्यमें सूक्ष्म दृष्टिसे विचारनेवाला होता है । ये तीनों आश्रययोगके फल हैं । माला योगमें उत्पन्न होनेवाला भोगी होता है । सर्प योगोत्पन्न मनुष्य अनेक प्रकार का दुःख भोगता है ॥ १७४ ॥ गदा योगवाला मनुष्य यज्ञ करने वाला और धन भोगने वाला तथा धनसंग्रहमें उद्यमी होता है । शकट योगोद्भव मनुष्यकी जीविका गाड़ी रथ आदिसे होती है, नित्य रोगी और उसकी स्त्री कुरूपा होती है । विहंग योगवाला मनुष्य दूत का काम करता है और झगड़ालु होता है । शृङ्गाटक योगवाला मनुष्य बहुत काल तक सुखी रहता है । हलयोग वाला मनुष्य खेती का काम और पशुपालन आदि बहुत उत्तम जानता है ॥ १७५॥ वज्र योगमें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य प्रथम और अन्त्य अवस्था में सुखी, मध्यममें दुःखी और सबका प्यारा तथा अत्यन्त पराक्रमी होता है । यव योग वाला मनुष्य बलवान् और मध्य अवस्था में सुखी रहता है । पद्म योगोद्भव मनुष्य विख्यात कीर्तिवाला और अत्यन्त सुख, गुण तथा विद्यावाला होता है । वापी योगवाला मनुष्य बहुत काल पर्यन्त थोड़े सुख पाता और धन बढ़ाने वाला तथा कृपण होता है ॥ १७६ ॥ यूप योगमें उत्पन्न मनुष्य दानी, अहंकारी और यज्ञ करनेवाला होता है । शर (इषु) योग में हिंसक, बंधे हुयेको पालनेवाला और शर बनानेवाला होता है । शक्ति योगमें नीच कर्म करनेवाला, आलसी, दुःखी और दरिद्र होता है । दण्ड योगमें प्रिय (पुत्रादि) से रहित और शूद्रकी वृत्तिवाला (टहलुआ) होता है । छत्र-योगोद्भव जातक आदि और अन्त्य अवस्था में सुखी, अतुल धनवाला तथा बली होता है । नौ योगोत्पन्न जातक जलकी जीविकावाला होता है । चक्र योगका जातक यशस्वी राजा होता है । जलधि (समुद्र) योगवाला मनुष्य जलवृत्तिवाला राजा होता है । अर्धेन्दु योगमें जायमान मनुष्य भोगशाली होता है । कूट योगमें उत्पन्न नर पहाड़ और जंगलका रहनेवाला तथा क्रूर कर्म करनेवाला होता है। चाप योगमें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य जंगली, चोरी कर्म करनेवाला और निकृष्ट होता है ॥ १७८ ॥ वीणा योगमें उत्पन्न मनुष्य सकल क्रियामें चतुर, संगीत नृत्यका प्रिय होता है । दा- मिनी योगमें उत्पन्न मनुष्य उपकारी, पटु बुद्धिवाला, विद्यामें विख्यात और धनी होता है । पाश योगमें उत्पन्न जातक शीलवान्, धनोपार्जनमें चतुर, वाचाल और पुत्रवान् होता है । केदार योगमें उत्पन्न होनेवाला जातक कृषि-कार्य परायण, धनवान्, आलसी बुद्धिवाला और बन्धुजनोंका उपकारी होता है ॥ १७९ ॥