जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० सटीकजातकपारिजाते-
संवत्में उत्पन्न हो तो श्रीमान्, विप्रजनका आश्रित, फलका परित्यागी हो। विकारी संवत्में जन्म हो तो रोगी, डरपोक, गरीब, चलबुद्धि वाला हो। शर्वरी संवत्में जन्म हो तो विशेष धनी, अतिभोगी, सुन्दरचित्त, सत्यव्रत और आचारवान् हो ॥ १८ ॥ प्लव संवत्में जायमान शान्त, उदार, कृपालु, पराक्रमी और धर्मात्मा हो, शुभकृत् संवत् में उत्पन्न हो तो चीजोंसे वंचित, प्राज्ञ, शुभांग, पंडित हो। शोभकृत् संवत्में उत्पन्न हो तो ज्ञानी, राजा, गुणवान्, विद्याविनोदका प्रिय हो। क्रोधी संवत्में पैदा हो तो दुर्भोगी, परस्त्रीगामी, शठबुद्धि और क्रोधी हो ॥ १९ ॥ विश्वावसु संवत्में उत्पन्न हो तो मानी, हास्यरसका प्रिय, गुणधनकी श्लाघा करने वाला हो। पराभव संवत्में उत्पन्न हो तो दुष्ट आचरणवाला, कुलनाशक हो। प्लवंग संवत्में जायमान कामी, बन्धुरत, बालकप्रिय और मंदबुद्धि हो। कील संवत्में पैदा हो तो देवताकी पूजा करनेमें तत्पर, अतिसुन्दर पराक्रमसे युक्त हो ॥ २० ॥ सौम्य संवत्में जायमान हो तो शान्त, सर्वजनका प्रिय, विशेष धनवान् और धैर्य धारण करनेवाला हो। साधारण संवत्में उत्पन्न हो तो मनुष्य नाना प्रकारके शास्त्रका ज्ञाता, विकल बुद्धि हो। विरोधी संवत्का उत्पन्न मनुष्य आज्ञापर रहने वाला, क्रोधी, दरिद्र, भ्रमणशील हो। परिधावी संवत्का जन्मा बालक दुःशील, कडुवा वचन बोलने वाला धनवान् हो ॥ २१ ॥ प्रमादीसंवत् का पैदा हुआ मनुष्य बन्धुओंसे विराग करनेवाला, पराई स्त्रीको भोगने वाला होवे। आनन्द संवत्का जायमान नर प्रसन्नचित्त, सब शास्त्र-वेदमें युक्त, तत्त्वज्ञानी होवे। राक्षस संवत्में उत्पन्न मनुष्य पापी, वृथा बकवादी, अच्छे लोगों का अपकारी होता है। अनल संवत्का उत्पन्न मनुष्य दानी, गुणी, शान्त और सदाचारी होता है ॥ २२ ॥ पिंगल संवत्में उत्पन्न हो तो योगी, मनको जीतने वाला और तपस्वी हो। काल संवत् में जन्म हो तो कालज्ञ, लक्ष्मी (धन) का उपयोगी, सत्कर्मी हो। सिद्धार्थी संवत्में उत्पन्न हो तो सिद्धार्थ, गुरुका-देवताका भक्त, और विद्वान हो। रौद्र संवत्में उत्पन्न हो तो परस्त्रीगामी, कुटिल, मानी और दुराचारी हो ॥ २३ ॥ दुर्मति संवत्में उत्पन्न हो तो कामी, जड़बुद्धि, शोकसे संतप्त और खल हो। दुंदुभि संवत्में जायमान हो तो स्थूल जंघा, स्थूल बाहु, स्थूल मस्तक, स्थूल शरीर हो तथा भोगवान् हो। रुधिरोद्गारी संवत्में पैदा हुआ हो तो बुद्धिमान्, सत्यवक्ता, सुखी, और धनवान् हो। रक्ताक्षि संवत्में उत्पन्न हो तो शान्त, बन्धुजनका प्रिय, अतिसुन्दर और शीलवान् हो ॥ २४ ॥ क्रोध संवत्में उत्पन्न हो तो परस्त्रीगामी, कुमार्गी, बन्धुवैरी, चोरीमें निरत हो। क्षयसंवत्में जायमान हो तो शिष्टाचारवाला, सुन्दर, प्रसन्न, स्वरूपवान्, मानी, शत्रु तथा रोग से रहित होवे ॥ २५ ॥ अथायनफलम् । उत्तरायणसमुद्भवः पुमान् ज्ञानयोगनिरतश्च नैष्ठिकः । दक्षिणायनभवः प्रगल्भवाग् भेदबुद्धिरभिमानतत्परः ॥ २६ ॥ इदानीमयनफलमुच्यते । तत्र प्रथमं किमायनमित्यत्रोच्यते । “......सौम्या- न्त्यायनं मकरकर्कटयोर्निरुक्तम्” इति रामाचार्यवचनात् , “मकरकर्कटसङ्क्रमतोऽयनम्” इति भास्करवचनाच्च मकरादिराशिषट्के सञ्चरति सूर्ये सौम्यायनं, कर्कादिराशिषट्के च याम्यायनमिति विज्ञेयम् । तस्मिन्सौम्यायने ( उत्तरायणे ) याम्यायने ( दक्षिणायने ) च जातस्य फलमत्रोक्तम् । श्लोकस्तु सरलार्थ एवेति ॥ २६ ॥ उत्तरायणमें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य ज्ञान योगमें निरत और नैष्ठिक होता है। दक्षि-
- णायनमें उत्पन्न होनेवाला बोलनेमें चतुर, भेदबुद्धि और अभिमानी होता है ॥ २६ ॥