जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ सटीकजातकपारिजाते- पितामहश्चतुर्थे तु माता नश्यति पञ्चमे । षष्ठे तु मातृभगिनी सप्तमे मातुलस्तथा ॥ ५३ ॥ अष्टमांशे पितृव्यस्त्री निखिलं तु नवांशके । दशमे पशुसंघातो भृत्यस्त्वेकादशांशके ॥ ५४ ॥ द्वादशे तु स्वयं जातस्तज्ज्येष्ठस्तु त्रयोदशे । चतुर्दशे तद्भगिनी त्वन्ते मातामहस्तथा ॥ ५५ ॥ अथ मूलनक्षत्रे जातस्य चरणपरत्वेन फलम् । मूलनक्षत्रमानं (अभोगः) चतुर्धा विभजेत् । तत्र प्रथमे पादे जातः पितरं निहन्यात् । द्वितीये जातो मातरमाशु=त्वरितमेव निहन्यात् । तृतीयचरणजो वित्तानां=स्वधनानां विनाशको भवति । तथाऽस्य मूलस्य चतुर्थे पादे जायमानः सौख्यं समुपैति । चतुर्थपादो न दोषावह इति । तथा रामाचार्यः- आद्ये पिता नाशमुपैति मूलपादे, द्वितीये जननी, तृतीये । धनं, चतुर्थोऽस्य शुभोऽथ शान्त्या सर्वत्र तत्स्यादहिथे विलोमम् ॥ इति ॥ अथ च मूलर्क्षस्य=मूलनक्षत्रस्य निखिलाः (अभोग-) नाड्यः तिथिसंख्यया (१५) पञ्चदशसंख्यया विभाजिताः कार्याः । तदा पञ्चदश खण्डानि जायन्ते । तेषु क्रमेण जातस्य फलान्यत्रोक्तानि । श्लोकाः स्पष्टार्था इति ॥ ५१-५५ ॥ मूलके प्रथमचरणमें पिताका, २ रेंमें माताका, ३ रेंमें धनका नाश होता है और ४ था चरण शुभ है ॥ ५१ ॥ मूल नक्षत्रकी सम्पूर्ण नाड़ीमें १५ का भाग देकर १५ खण्ड बनावे, उसके एक २ अंशका फल कहते हैं-प्रथम अंशमें पिताका नाश, दूसरेमें चाचाका, तीसरेमें भगिनीपति (बहनोई) का, चौथेमें पितामहका, पांचवें अंशमें माताका नाश होता है, छठे अंशमें मौसीका, सातवे अंशमें मामाका, आठवें अंशमें चाचीका, नववें अंशमें सबका, दसवें अंशमें पशुका, ग्यारह- वें अंशमें नौकरका नाश होता है । बारहवें अंशमें स्वयं जातकका नाश होता है । तेरहवें अंशमें उसके ज्येष्ठ भाईका संहार होता है । चौदहवें अंशमें उस जातककी बहिन का नाश होता है और १५ वें अंशमें नाना का नाश होता है ॥ ५२-५५ ॥
| अंश | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | | फल | पिता का नाश | पितृव्य (चाचा) का नाश | बहनोई का नाश | मातामह का नाश | माता का नाश | मौसी का नाश | मामा का नाश | चाची का नाश | सर्वनाश | पशु का नाश | नौकर का नाश | स्वयं नष्ट होय | ज्येष्ठ भाई का नाश | बहिन का नाश | नाना का नाश |
उदाहरण-मूलका सर्व भोग ६४ दं० १५ प० है इसमें १५ का भाग देनेसे लब्ध १ खंड में ४ दण्ड १७ पल हुआ । जन्म कालमें भयात ३५।२ है, अयातमें ८ वां अंश ३४ दं० १६ पल तक है नववां अंश ३८ दं० ३३ प० पर्यन्त है इसी बीचका भयात ३५। घ० ५ पल होता है । इससे निश्चय हुआ कि ९ वें अंशमें जन्म है । ९ वें अंशका फल-सर्व नाश है । इदानीं श्लेपानक्षत्रे गण्डान्तमुच्यते— आश्लेषाद्ये न गण्डं स्याद्धनगण्डं द्वितीयके । तृतीये मातृगण्डं तु पितृगण्डं चतुर्थके ॥ ५६ ॥ आश्लेषाद्ये = श्लेषानक्षत्रस्य प्रथमे चरणे गण्डं न स्यात् । तस्य प्रथमपादं शुभम् । द्वितीयके = श्लेषाद्वितीयचरणे धनगण्डं, तत्र जातस्य धननाशं ब्रूयात् । तृतीये चरणे