जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 339, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ेंमान्द्यब्दादिफलाध्यायः ॥९॥ ३१३ जिसका वृश्चिकके द्वादशांशमें जन्म हो वह मारनेकी इच्छा रखनेवाला, धूर्त्त-चोरोंका स्वामी हो। धनुके द्वादशांशमें उत्पन्न हो तो पिता-देवता-ब्राह्मणका भक्त हो। मकरके द्वादशांशमें जन्म हो तो सख्यादि युक्त और दूतवाला हो। कुम्भके द्वादशांशवाला खल हो। मीनके द्वादशांशवाला धनी, और पण्डित होवे ॥ १२२ ॥ अथ त्रिंशांशफलम् । त्रिंशांशे धरणीसुतस्य चपलः काठिन्यवाक् क्रूरधी- र्मन्दस्याटनतत्परो मलिनधीर्जीवांशके वित्तवान् । सौम्यांशे गुरुदेवभक्तिनिरतः साधुप्रियो बन्धुमान् कामी कान्तवपुः सुखी च भृगुजत्रिंशांशके जायते ॥ १२३ ॥ इदानीं त्रिंशांशफलमुच्यते। तत्काललग्ने यस्य ग्रहस्य त्रिंशांशे जन्म भवेत्तदुक्तं फलं तस्य जातकस्य वाच्यमिति । श्लोकः स्पष्टार्थ एव । होरा-द्रेष्काण-नवांश-द्वादशांश-त्रिं- शांशानां ज्ञानप्रकारस्तु पूर्वमेव दशवर्गनिरूपणे प्रोक्त इति ॥ १२३ ॥ मङ्गलके त्रिंशांशमें जन्म हो तो चपल, कठिन वचन बोलनेवाला, क्रूरबुद्धि हो । शनिके त्रिंशांशमें घूमनेवाला और मलिनबुद्धि हो। वृहस्पतिके त्रिंशांशवाला धनी हो। बुधके त्रिंशांशवाला गुरु-देवभक्तिमें निरत, साधुप्रिय और बन्धुमान् हो। शुक्रके त्रिंशांशमें उत्पन्न हो तो कामी, सुन्दरशरीर और सुखी होवे ॥ १२३ ॥ अथ वेलाफलम् । वाग्मी शिष्टाचारधर्मस्तपस्वी नित्योत्साही निर्मलो दानशीलः । तेजोविचारूपवान् सत्यवादी वीतारातिः सत्त्ववेलाप्रजातः ॥ १२४ ॥ रजोवेलाजातः सुखधनयशोरूपबलवान् जितारातिः कामातुरमतिरबन्धुप्रियमनाः । तमोवेलाजातः परधनवधूको गतसुखः शठस्वामी बन्धुद्विजगुरुविरोधी चपलधीः ॥ १२५ ॥ तमः सत्त्वरजोवेलास्तमः सत्त्वं रजस्तमः । भवन्त्यर्कदिनादीनामर्धयामैरनुक्रमात् ॥ १२६ ॥ इदानीं वेलाफलानुच्यन्ते । तत्र का नाम वेलेत्युच्यते । अर्कदिनादीनां = सूर्यादिवा- सराणामर्द्धयामैरर्द्धप्रहरप्रमितैरनुक्रमात् = क्रमेण तमः, सत्त्वं, रजः, तमः, सत्त्वं, रजः, तमः इति वेला भवन्ति । प्रतिदिनं षोडश षोडश । रविवासरे तम आरभ्य तमः, सत्त्वं, रजः, तमः, सत्त्वं, रज इत्येवं प्रकारेण षोडश । चन्द्रवासरे सत्त्वं, रजः, तमः, सत्त्वमेवं क्रमेण षोडश । एवं प्रतिवारमुक्तक्रमेण ज्ञेयाः । प्रतिखण्डं प्रहरार्द्धमितमेवमष्टप्रहरेषु षोडश भवन्ति । यथा चक्रम्—
| वाराः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रविः | तमः | सत्त्व | रजः | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. |
| चन्द्रः | सत्त्वं | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. |
| मङ्गलः | रजः | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. |
| बुधः | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. |
| वृह. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. |
| शु. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. |
| श. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. | स. | र. | त. |
| जन्मकाले या वेला भवेत्तदुक्तं फलं तस्य वाच्यमिति । फलं सर्वं स्पष्टमेव ॥ १२४-१२६ ॥ | ||||||||||||||||
| २७ जा० |