भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 588 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 353

अष्टकवर्गाध्यायः ॥ १० ॥ ३२७ राश्यष्टभागप्रथमांशकाले शनिर्द्वितीये तु गुरुः फलाय । कक्षाक्रमेणैवमिहान्त्यभागकाले त्रिलग्नं फलदं प्रदिष्टम् ॥ सर्वग्रहाणां प्रहितेऽष्टवर्गे तत्कालराशिस्थितबिन्दुयोगे । अष्टाक्षि २८ संख्याधिकबिन्दवश्चेच्छुभं तदूने व्यसनं क्रमेण ॥ इति ॥३३-३५॥ पूर्व पश्चिम नव रेखा और उत्तर दक्षिण १३ रेखा लिखकर ८ पंक्तिके अष्टवर्गके ९६ कोष्ठका प्रस्तार चक्र बनावे ॥ ३३ ॥ दक्षिणादि पंक्तिके लग्न-चन्द्रमा-बुध-शुक्र-सूर्य-मङ्गल-गुरु और शनि क्रमसे स्वामी और उनके बिन्दुफलको देनेवाले होते हैं ॥ ३४ ॥ बिन्दुसे युक्त सब फल देते हैं। यदि बिन्दु-रहित हों तो अफल (अनिष्ट फल) देते हैं। शत्रुगृहीका और अस्त ग्रह बिन्दुसे युक्त होनेपर भी विशेष फल विलोप करते हैं ॥ ३५ ॥ अथ त्रिकोणशोधनम् । पञ्च प्राचीरालिखेद्रा