जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 356, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ें३३० सटीकजातकपारिजाते- पत्यशोधनानन्तरमष्टकवर्गः शुद्धो भवतीति चिन्त्यम् । एवमेवाह पराशर एकाधिपत्य- शोधनम्— एवं त्रिकोणं संशोध्य पश्चादेकाधिपत्यता । क्षेत्रद्वयं फलानि स्युस्तदा संशोषयेद् बुधः ॥ क्षीणेन सह चान्यस्मिन् शोधयेद्ग्रहवर्जिते । ग्रहयुक्ते फले हीने ग्रहाभावे फलाधिके ॥ अनेन सह चान्यस्मिन् शोधयेद्ग्रहवर्जिते । फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् ॥ उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यः कदाचन । उभयोर्ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् ॥ समग्रहाग्रहतुल्यत्वात् सर्वं संशोध्यमग्रहात । कुलीरसिंहयो राश्योः पृथक्क्षेत्रं पृथक् फलम् ॥ बारह राशिमें सिंह और कर्क राशिके एक २ स्वामी है, अन्य १० राशियोंमें दो दो राशिके एक २ स्वामी हैं। अतः सिंह कर्कके अतिरिक्त राशि मंगलादि ग्रहोंकी राशि हैं। एक ग्रह की दो दो जो राशि हैं उन में दोनों राशिकी बिन्दुसंख्या उसके समान शून्य विषम अग्रह सहग्रहादि को एकाधिपत्य शोधनकर शोषित करे ॥ ३९ ॥ दोनों राशिमें ग्रह हों तो शोधन नहीं करे। यदि दोनोंमें एक राशि फलरहित हो तो भी शोधन न करे। यदि एकराशिमें अधिक फल और ग्रह भी हो तो दूसरेका फल उसमें घटावे। यदि दोनोंमें फल बराबर और ग्रह नहीं हों तो दोनोंको घटावे, दोनोंको शून्य कर दे ॥ ४० ॥ एक राशिमें ग्रह हो दूसरी राशि ग्रहहीन हो दोनोंमें फल बराबर हो तो ग्रहहीन राशिको शून्य बनावे। यदि दोनों राशि ग्रह हीन और न्यूनाधिक बिन्दुवाली हों तो न्यूनके समान अधिकमें से घटावे ॥ ४१ ॥ एकराशिमें थोड़े फल और ग्रह भी हो दूसरीमें अधिक फल और ग्रह न हो तो थोड़े फलके बराबर अधिक फलमें घटावे। पहले त्रिकोण शोधन करके पीछे एकाधिपत्य शोधन करे ॥ ४२ ॥ Notes—पूर्वोदाहतभौमाष्टकवर्गे त्रिकोणशोधनावशेषमेव फलमेकाधिपत्यशोधनादपि भवतीति विविच्य प्रतीतिः कर्त्तव्या ॥ ३६-४२ ॥ भौमाष्टकवर्गोदाहरणम् ।
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| ११ | | ९ | |
| ०००।।।। | मं. १० | ००।।।।।। | ८ |
| १२ ल. | ०००००।।। | | ०।।।।।।|
| ०००।।।। | | | |
| शु. \ | / | \ | |
|----------\-------+------/--------+---------\-------+--------|
| \ १ सू. / \ ७ श. / |
| \ ०००।।।। / \०००००।।/ |
| \ / \ / |
| \ / ४ बृ. \ / ६ |
| २ बु. चं. \ / ००००।।।। \ / ००।।।।।।|
| ०००।।।। \ / X |
| \/ / \ |
| \ ३ / \ ५ |
| \ ०००।।।। / \०००००।।|
| \ / \ |
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त्रिकोणैकाधिपत्यशोधनोदाहरणम् ।
| राशयः | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कु. | मी. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग्रहाः | सू. | बु. चं. | • | बृ. | • | • | श. | • | • | मं. | • | ल. शु. |
| बिन्दवः | ३ | ३ | ३ | ४ | ५ | २ | ५ | १ | २ | ५ | ३ | ३ |
| त्रि. शो. वि. | १ | १ | ० | ३ | ३ | ० | २ | ० | ० | ३ | ० | २ |
| ए.अ.शो.वि. | १ | १ | ० | ३ | ३ | ० | २ | ० | ० | ३ | ० | २ |