जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयचतुर्थभावफलाध्यायः ॥१२॥ ३८६ जीवे वा सुखपे शुभग्रहयुते लग्नात्तपःस्थानगे सौम्यर्क्षे नरवाहनं चिरतरं राजप्रतापान्वितम् ॥ दुःस्थे पापयुतेऽस्तनीचरिपुगे यानादिभाग्यं नहि स्वर्क्षे सर्वबलाधिके चिरसुखं चान्दोलिकारोहणम् ॥ ११५ ॥ बन्धुकर्मगुहाधीशौ लाभस्थानगतेक्षकौ । बलवन्तौ यदि स्यातां सर्वभाग्यफलप्रदौ ॥ ११६ ॥ लाभस्थौ सुखभाग्येशौ पश्यन्तौ वा सुखस्थलम् । वाहिनीसर्वभाग्याढ्यो राजप्रीतिकरो भवेत् ॥ ११७ ॥ धर्मवाहनराशीशौ लग्नसम्वन्धिनौ यदि । जीवदृष्टियुतौ तस्य राजवश्यादिभूषणम् ॥ ११८ ॥ शुभवाहनराशीशौ शुभखेचरसंयुतौ । बहुसेनाधिपः श्रीमान् बलिनौ यदि जायते ॥ ११९ ॥ भाग्यस्थिते वाहनराशिनाथे सशुक्रजीवे शुभखेटराशौ । भाग्याधिपे कोणचतुष्टये वा बहुत्वदेशाभरणार्थयानम् ॥ १२० ॥ कामारीयानसहजतपोलग्नव्ययेश्वराः । सुखाधिपेन संयुक्तास्त्वसंख्याकरदेशभाक् ॥ १२१ ॥ सुखाधिपो देवगुरुः सितो वा बली विलग्नान्नवमोपयात: । त्रिकोणकेन्द्रोपगतः शुभेशः समेति जातो बहुवाहनानि ॥ १२२ ॥ सशुक्रजीवो गेहेशो भाग्यस्थो भाग्यपे सुखे । केन्द्रत्रिकोणयोर्वाऽपि बहुवाहनदेशभाक् ॥ १२३ ॥ स्पष्टार्थाः किलैते नव श्लोका अतो न व्याख्याता इति ॥ ११५-१२३ ॥ वृहस्पति वा चतुर्थेश शुभग्रहसे युक्त लग्नसे नववें भावमें हो और सौम्यर्क्षमें हो तो बहुत काल पर्यन्त राजप्रतापसे युक्त नरवाहन प्राप्त हो । यदि गुरु या चतुर्थेश दुष्टस्थान, पापग्रह युक्त, अस्त, नीच या शत्रु गृहमें हो तो सवारी आदि भाग्यमें नहीं है। यदि स्वगृहमें अति बलवान् हो तो बहुत काल तक सुख आन्दोलिका पर निवास करे ॥ ११५ ॥ यदि चतुर्थेश और दशमेश बलवान् होकर लाभ स्थानमें हों वा लाभस्थानको देखते हों तो सर्वभाग्यके दाता होते हैं ॥ ११६ ॥ चतुर्थेश और नवमेश लाभ स्थानमें. हों वा चतुर्थ स्थानको देखते हों तो सैन्ययुक्त सर्व- भाग्यसे युक्त और राजाको प्रसन्न करनेवाला हो ॥ ११७ ॥ यदि धर्मेश और सुखेश लग्नके सम्बन्धी हों और उन्हें वृहस्पति देखता हो तो जातक को राजासे मान और भूषण प्राप्त हो ॥ ११८ ॥ नवमेश और वाहनेश ( चतुर्थेश ) यदि बलवान् हों शुभग्रहसे युक्त हों तो बहुत सेना का मालिक और श्रीमान् होवे ॥ ११९ ॥ वाहनेश भाग्यस्थानमें प्राप्त हो, शुक्र और वृहस्पतिके साथ हो और वह शुभग्रहकी राशि हो वा नवमेश कोण या केन्द्रमें हो तो उसे बहुत देश, आभरण, सवारी और धन प्राप्त हो ॥ १२० ॥ सप्तम, षष्ठ, चतुर्थ, तृतीय-नवम लग्न और व्यय ( १-३-४-६-७-९-१२ ) के स्वामी सुखेशके साथ हों तो जातक असंख्य देशोंको प्राप्त करे ॥ १२१ ॥ सुखेश वृहस्पति, वा शुक्र बलवान् होकर लग्नसे नववें भावमें प्राप्त हो, नवमेश त्रिकोण वा केन्द्रमें हो तो जातक बहुत वाहनसे युक्त होवे ॥ १२२ ॥