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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

( १०१ ) [ल]भग सोलह मील की दूरी पर स्थित धर्मराज ने बिना दूत के अभिषेककालीन शब्द को कैसे सुना ? साथ ही जब सायंकाल मरे हुए कर्ण को कौरव-पाण्डव दीपों के प्रकाश में देख रहे थे, तब उसके कई घंटे बाद हिमालयान् पर होने वाले शब्द सुन कर भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्मराज को शल्य वध के लिए सायंकाल प्रेरित कैसे किया ? अतः : एतावदुक्त्वा वचनं केशवः परवीरहा । जगाम शिबिरं सायं पूज्यमानोऽथ पाण्डवैः ॥ ( शल्य० ७।४२ ) 'शत्रुवीरों का संहार करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण यह बात कह कर सायं- काल पाण्डवों से सम्मानित हो अपने शिबिर में चले गये ।' इन श्लोक में प्रयुक्त 'सायं' का अर्थ कर्णवध के दूसरे दिन सायंकाल ही संभव है । अतः कर्ण वध के बाद शल्याभिषेक के उपलक्ष में एक दिन का अवकाश मानना चाहिये । क्योंकि इसका यह उत्तर स्पष्ट हैं कि जिस तरह दुर्योधन वध में दुर्योधन के भगने, संजय का उससे मिलने, उसका

( १०२ ) इसी तरह श्रीव्यासजी द्वारा की गयी भविष्य वाणी का रहस्योद्घाटन पहले ही किया जा चुका है । कर्ण वध के दिन पहले ही भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सावधान करते हुए कहा—आज तुम्हारे हाथों कर्ण का वध होना है । इसी प्रकार दुर्योधन के धराशायी होने पर धर्मराज प्रेरित श्री कृष्ण ने हस्तिनापुर में देवी गान्धारी और राजा धृतराष्ट्र को सान्त्वना देने के अनन्तर सहसा कुरुक्षेत्र के लिये प्रस्थान करना चाहा और उन्होंने श्रीवेद- व्यासजी के सम्मुख कहा—'आज अश्वत्थामा पाण्डवों का नाश करना चाहता है, अतः उनकी रक्षा के लिये मुझे अति शीघ्र चलना है ।' अस्तु ! क्योंकि विधाता के विधान में धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा ही शल्यवध होना था, अतः दिव्यदर्शी धर्मराज ने भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेरणा से हिमाल- यान पर हो रहे शल्याभिषेक का शब्द सुना । स्वयं युधिष्ठिर ने अनुस्मृति विद्या के प्रसङ्ग में उनकी दिव्यदर्शिता का रहस्योद्घाटन किया है— देवर्षिर्लोमशो दृष्टस्ततः प्राप्तोऽस्म्यनुस्मृतिम् । दिव्यं चक्षुरपि प्राप्तम् ज्ञानयोगेन वै पुरा ॥ ( स्त्रीपर्व २६।२० ) 'तीर्थ यात्रा के प्रसङ्ग में देवर्षि लोमश का दर्शन हुआ था । उन्हीं से मैने यह अनुस्मृति विद्या प्राप्त की थी । इसके अतिरिक्त, पूर्वकाल में ज्ञानयोग के प्रभाव से मुझे दिव्य दृष्टि भी प्राप्त हो गयी थी ।' जब द्रोणाचार्य दिव्यवपु ब्रह्मलोक के लिए उत्क्रमण कर रहे थे, तब दिव्य- दर्शी धर्मराज ने भी उनका दर्शन किया— ब्रह्मलोकगते द्रोणे धृष्टद्युम्ने च मोहिते । वयमेव तदाद्राक्ष्म पञ्च मानुषयोनयः ॥ योगयुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् । अहं धनंजयः पार्थो कृपः शारद्वतस्तथा ॥ वासुदेवश्च वार्ष्णेयो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः । अन्ये तु सर्वे नापश्यन् भारद्वाजस्य धीमतः । महिमानं महाराज योगयुक्तस्य गच्छतः ॥ ( द्रोण० १९२।५५½—५८½ )

( १०३ ) ‘अपमान से धृष्टद्युम्न के मोहित हो जाने पर द्रोणाचार्य के ब्रह्मलोक जाते समय मैं ( संजय ), कुन्तीपुत्र अर्जुन, शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य, वृष्णिवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर—इन पांच मनुष्यों ने ही योगयुक्त महात्मा द्रोण को परम धाम की ओर जाते देखा था। अन्य सब लोगों ने योगयुक्त हो ऊर्ध्वगति को जाते हुए बुद्धिमान् द्रोणाचार्य की महिमा का साक्षात्कार नहीं किया ॥' इस तरह कवीश्वरजी ने जो अवकाश की सिद्धि में प्रमाण प्रस्तुत किये हैं, वे सब अवकाश न होने में वज्रहेतु हैं। पन्द्रहवें दिन के बाद एक-एक दिन अवकाश और शल्यवध के दूसरे दिन दुर्योधनवध की बात कौन कहे, केवल एक अवकाश मानने पर भी—‘पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति' द्रो० प० १८३।६५, यह व्यास वचन सर्वथा खण्डित होता है। इतना ही नहीं, चित्रा नक्षत्र में मार्गशीर्ष की अमावास्या मानने के कारण आद्योपान्त तिथि और नक्षत्र का योग असन्तुलित होता है। पुष्य में मार्गशीर्ष कृष्ण सप्तमी मानने के कारण कार्तिकी पूर्णिमा अश्विनी में सिद्ध होती है । इसी तरह कृत्तिका में मार्गशीर्ष की पूर्णिमा मानना भी अनुचित है । इतना ही नहीं, एक ओर तो मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष में दो तिथियों का क्षय माना है, दूसरी ओर एक नक्षत्र की वृद्धि भी मानी है। यह सब अनर्थ चित्रा को ऐन्द्र नक्षत्र मानने से हुआ है । कवीश्वर ने भीष्म निर्वाण सम्बन्धी दो वचनों की सार्थकता पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है। इनके मत में भीष्माचार्य के पास श्रीकृष्ण सहित पाण्डव माघ शुक्ला नवमी को पहुँचते हैं। ऐसा मानने पर ‘पञ्चाशतं षट्' का अर्थ--नवमी सहित पूर्णिमा तक सात दिन अथवा दशमी से पूर्णिमा तक छह दिन सिद्ध होता है। ये दशमी से पूर्णिमा तक उपदेश मानते हैं। परन्तु ऐसी स्थिति में तो ‘उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे' के अनुसार उपदेश श्रवण के पश्चात् पाण्डवों के हस्तिनापुर में निवास सम्बन्धी वचन ही निरर्थक सिद्ध हो जाता है। यहाँ यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि श्रीभगवान् के 'सप्तमा- च्छापिदिवसादमावास्या भविष्यति' ( उद्योग० १४९।१८ ) इस वचन को

( १०४ ) अक्षरशः सत्य सिद्ध करने के लिए ही श्रीकवीश्वर ने अवकाशयुक्त सिद्ध करने की असम्भव कल्पनाएँ करने का साहस किया है, उन्हीं भगवान् के 'पञ्चाशतं षट् च' ( शान्ति० ५१।१४ ) इस वचन पर मौन धारण कर लिया है । साथ ही कवीश्वर पूर्णिमा की उत्तर रात्रि में तीन मुहूर्त रात्रि शेष रहने पर भीष्म जी का देहत्याग मानते हैं । परन्तु ऐसा मानने पर 'त्रिभागशेषः' का प्रसंगानुसार प्राप्त महत्त्व ही लुप्त होता है । डाक्टर काणे एवं दफ्तरी आदि ने मार्गशीर्ष अमावास्या से पौषकृष्ण द्वितीया तक लगातार युद्ध माना है। परन्तु ऐसा मानने पर भी श्रवण को युद्धान्त संभव नहीं । साथ ही आठवें, नवें, ग्यारहवें दिन के युद्ध में शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और दशमी सिद्ध होती है। परन्तु महाभारत में इन दिनों सायंकाल अन्धकार का वर्णन है। चौदहवें दिन शुक्ल त्रयोदशी होने के कारण उत्तर रात्रि में चन्द्रोदय वाला वचन भी निष्फल जाता है । फिर भी इन विचारकों के प्रयास की सराहना है । किन्तु हैं सारे-के-सारे विचार तथ्यहीन ही । उपसंहार महाभारत में समग्र सृष्टि का रस और रहस्य सन्निहित है । इसमें अनेक प्राचीनतम इतिहास भी सन्निहित हैं । साथ ही रचयिता—महर्षि श्रीकृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने निज बन्धु-बान्धवों और सगे-सम्बन्धियों ( कौरव-पाण्डवों ) का मार्मिक इतिहास भी इसमें ग्रथित किया है । अभिप्राय यह कि महाभारत में वर्णित कौरव-पाण्डव का इतिहास एक दृष्टि से श्रीवेदव्यास के निज परिवार का ही इतिहास समझना चाहिये । अतः इस पारिवारिक इतिहास को इतिहास न समझ कर आधुनिक उपन्यासों की तरह काल्पनिक मानना सर्वथा अनुचित है । ऐसा मानने पर तो लेखक के जन्म-कर्म और उससे संबद्ध चरित्र सभी मिथ्या सिद्ध होते हैं। इस प्रकार की अनर्गल कल्पना सर्वथा अशोभनीय है । महाभारत को प्रमाण मानकर ही इस पर प्रामाणिक विचार कर्तव्य है । ॥ इति शम् ॥