भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

चौदह यमका वर्णन व ग्रंथसमाप्ति

कबीरकृष्णगीता ।

१५१

इंद्र सप्त दीप भुवलोके नाभी स्थानी । नामके वाम दहिने भै जानी ॥ रवर्गलोक हृदय अस्थापी । अमर लोक तन दोउ सुज दापी ॥ कंठ स्थान आहि जनलोक । हे पतलोक खिलोट विसोका ॥ कीतम सत्यलोक नर माथा । आद सतलोक अमरपुर ताका ॥ कुल अंगुष्ठ बुढ़ा पगु पाहीं । नाडि सकल सेस परवाहीं ॥ निज सुख देखहु तीनों लोका । रसना उर्ध सरम पंथ मोका ॥ रसना मृत्युलोक कोई थिर नाहीं । जिदा जग प्रगट रहाकोइ न माहीं रसना अरध पतालके सो साता । अष्ट घात पिंजरा जिवराता ॥ निराकार प्रबल मंजारा । सत्यनाम विन तेहि दै मारा ॥ अष्टंगी मंजारी खोटी । तीन लोक जिव खायसि घोटी ॥ कहै कबीर जिन सुमरो मोही । यम सिर भंजन बचायेउ बोही ॥ चौदह यम तन जीवहि घेरा । चौदह यमका करो निवेरा ॥ प्रथमहि धर्म करे यम घाता । धर्मराय यम इस मन माता ॥ दुतिय काम त्रितय यम कोधा । चौथे लोभ पंचये भ्रम सोधा ॥ छठयै यम लक्ष बुध विकारा । सतयै परधन हर सत हारा ॥ अठयै अहंकार नौमै मोहा । दसयै दस इंद्दी सुख जोहा ॥ इकादसे आप तन पोषा । अश्यागत तज खाय न मोषा ॥ द्वादसयै लेय विश्वास घाती । त्रियदस तृष्णा लोभ जमाती ॥ चतुर्दश चिंता तन बन आगी । चिंताहि डाह कोई वैरागी ॥ चिंता सोइ जो सट्टर सेवा । सट्टर सब देवनकर देवा ॥

कृष्णवचन ।

कहै कृष्ण निरने निरवारा । सत्यकबीर औ तारनहारा ॥ हम सब मगन कबीरके पाछे । हमार निवाह कबीरकृत आछे ॥

१५२

कबीरकृष्णगीता ।

चारों युग कबीर मोहि रासा । कहैं कृष्ण व्यास सत भाषा ॥ पूछहिं तारा अकाश घर स्वामी । कहैं सदुरु नखत निधायी ॥ केतिक तारा आहिं अकाश । कौन वरण तारागण भाषा ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर तारा यम रोवा । प्रबल निरंजन यम जिव हुवा ॥ उतरो याही यमकी काया । दिये छिटकाय रैन नम याया ॥ होत प्रात फिर सुन्य समाई । सात तबकके पार सो जाई ॥ सुन्य समाय रहा धर ध्याना । दिन गत बहुरि रैन प्रगटना ॥ रैन निरंजन दिवस कबीरं । सूर निरंजन शशि सत धीरं ॥ अनंत कोट उडगण तनवारा । चौदह योजन गोछ निराकार ॥ गोछ वीर जीवहिं दे सूरि । कबीरके भक्त करे भौभूरी ॥

दोहा-श्रीकृष्ण त्रिय देव मिल, स्तुति कराहिं अपार ।

सुखदेव व्यास सब विनवहीं, जै जै कबीर विचार ॥

कबीर काल सिर भंजन, और मुक्त देहिं जीव ।

विष्णु व्यास सत कहत हैं, सत्यकबीर निज पीव ।

इति श्रीकबीरकृष्णगीता समाप्ता ।

This image shows a blank, aged, cream-colored page, likely an endpaper or flyleaf from an old book. The paper has a slightly textured appearance with some minor creases and discoloration, particularly along the right edge and bottom. There is no text or other markings on the page.

हमारे प्रकाशनों की अधिक जानकारी व खरीद के लिये हमारे निजी स्थान :

खेमराज श्रीकृष्णदास

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

११/१०९, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

७ वी खेतवाडी बॅक रोड कार्नर,

मुंबई - ४०० ००४.

दूरभाष/फैक्स-०२२-२३८५७४५६.

खेमराज श्रीकृष्णदास

६६, हडपसर इण्डस्ट्रियल इस्टेट,

पुणे - ४११ ०१३.

दूरभाष-०२०-२६८७१,०२५,

फैक्स -०२०-२६८७४९,०७.

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,

लक्ष्मी वेंकटेश्वर प्रेस व बुक डिपो

श्रीलक्ष्मीवेंकटेश्वर प्रेस विल्डिंग,

जुना छापाखाना गली, अहिल्याबाई चौक,

कल्याण, जि. ठाणे, महाराष्ट्र - ४२१ ३०१

दूरभाष/फैक्स-०२५१-२२०९०६१.

खेमराज श्रीकृष्णदास

चौक, वाराणसी (उ.प्र.) २२१ ००१.

दूरभाष - ०५४२-२४२००७८

KHEMRAJ SHRIKRISHNADASS