भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1209

जान बखश तेरा पानी पाशोबः पीर ।
पाक हो इससे नहाकर दिल दीवाना मेरा ॥
सुखरूहो बदो कौनैन कदम उसकी पकड़ ।
फ़रमान उसकाही बाज कर दिल दीवाना मेरा ॥
यही तदबीर नहीं और छूटे तब आजिज ।
इसकीही गीतको गाकर दिल दिवाना मेरा ॥

ग़ज़ल—साहब जो कुल जहान, है साधुओंके बीचमें ।
वह आप बे गुमान, है साधुओंके बीचमें ॥
जावै जिधरको संत, सो जाहिर वहांही है ।
इस घरकी निरदबान, है साधुओंके बीचमें ॥
कहने व सुननेमें कभी, जो आता ही नहीं ।
उस लाबयां बयान, है साधुओंके बीचमें ॥
हर तरफ़ जाके देख, जहां साधु मण्डली ।
इस लामकां मकान, है साधुओंके बीचमें ॥
आजिज न जान फर्क, साहब व सन्तमें ।
जो कुल पै मिहरबान, है साधुओंके बीचमें ॥

ग़ज़ल—कलियुगका ऐसा जोर है, वेद और कुतुब ख्वां शोर है ।
हर दिलमें पैटा चोर है, साधुकी पूजा उठ गई ॥
हुक्काम और शाहे जमां, पूछे नहीं आंबिद कहां ।
अन्धेर फैलै दर जहां, साधूकी पूजा उठ गई ॥
कोई कहता हम आलिम बड़े, मेरे हाथमें सब हत्यकड़े ।
सब दूर हकसे यों पड़े, साधूकी पूजा उठ गई ॥
दुनियामें सब अन्धेर है, यमराज सबको घेर है ।
फिर मौतमें क्या देर है, साधूकी पूजा उठ गई ॥
कोई दस किताबें पढ़ गया, अर्शबरी पर चढ़ गया ।
वह ज्ञान अपना गढ़ गया, साधूकी पूजा उठ गई ।
अरबी व तुर्की फ़ारसी, अंग्रेजी सो सब खारसी ॥
देखै कोई न आरसी, साधूकी पूजा उठ गई ।
जब हकसे अपने ऐठना, किया फिक्र हुजरे बैठना ॥
राजे निहां न पैठना, साधूकी पूजा उठ गई ॥