कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पन्न हुए । (२) दूसरे द्वापरमें प्रजापति नाम हुआ । (३) कृष्ण (४) बृहस्पति (५) सिवता (६) सविता (६) भूत (७) मध्वा (८) वसिष्ठ (९) सारस्वत (१०) धाता (११) भारद्वाज (१२) तृवृष (१३) अन्तर्यक्ष (१४) धर्म (१५) त्रिपुरारणी (१६) धनञ्जय (१७) मेधातिथि (१८) व्रती (१९) अत्रि (२०) गौतम (२१) उत्तम (२२) बाजश्रवा (२३) त्रोतलवेदव्यास (२४) भार्गव (२५) आग्नेय (२६) मुक्ति (२७) महामति (२८) कृष्णद्वैपायन व्यास ।
ये सब वेदव्यास जीवन्मुक्त हैं । पहले भी जीवन्मुक्त थे अब भी जीवन्मुक्त हैं और भविष्यमें जब उत्पन्न होंगे, तब भी श्रद्धेय जीवन्मुक्तिके पदको प्राप्त प्राप्त होंगे । कबीर साहबने इन्हें अपने प्रेम मदिराके दीवानोंमें मानकर वही श्रद्धा प्रकट की है ।
जैनके तीर्थंकर ।
ऐसेही जैनके चौबीस समस्त तीर्थंकर हैं, पहले तीर्थंकर ऋषभनाथजी थे, इनका विवरण देखनेसे जान पड़ेगा । कबीर साहबका कथन है कि वनमें आग लगी निर्मही आप जल मरे । येही परमहंसचर्याके प्रवर्तक हैं । जबलों ये तीर्थंकर जीवित रहते हैं तबही आपके दिव्य ज्ञानका निर्णय हो जाता है । जैसे वेदधर्मके केवल ज्ञानियोंकी दशा है वैसेहीवही जैनधर्मके केवल ज्ञानियोंका विवरण है । तनिक भी विभिन्नता नहीं । ये केवल ज्ञानी चाहें जीवन्मुक्त है, नाम मात्रके निमित्त है प्रारब्धसे करते रहते हैं । केवल ज्ञानी कहलाते हैं । यथार्थमें हैं भी । अन्तके तीर्थंकर महावीर हैं महावीरनाथका यह विवरण है कि, कशाला नामक एक मनुष्यके शापसे आपको छः मासपर्यन्त बराबर रक्त पड़ता रहा, बड़ा कष्ट पाया, पर उन्हें कुछ भी पता न चला क्योंकि शरीर-राध्यास नहीं था और व्यवहारसूत्रके चूलकामें लिखा है कि, पाँचवें कालमें मुक्ति नहीं । दूसरे उत्तरार्धसूत्रमें भी यही लिखा है कि, पाँचवें कालमें किसी मनुष्यकी मुक्ति नहीं होगी । इनके उपदेशकी शैली मनोहर है ।
चौबीस तीर्थंकरसे लेकर जितने तिरसठ शलाका पुरुष हैं सबके वृत्तान्तकी जाँच करनेसे समस्त विवरण भली प्रकार मालूम हो जावेगा कि, प्रत्येक संप्रदायके विशिष्ट पुरुषमें कुछ सार अवश्यही होता है । मुक्तिका विचार करते २ एक जगह आपने कह डाला है कि, मुक्तिपथमें किसी संप्रदायका नियम नहीं हैं कि, इसके मुक्त हों इसके न हों किन्तु, यही नियम है कि, चाहें कोई हो “सम-